Hindi Love Story: आज हम मौसम का लुत्फ़ उठाते शहर से थोड़ी दूर आ गए थे। हल्की सी बारिश होने के बाद हसीन मौसम में लगभग खाली रेस्टोरेंट की पहली मंज़िल के एक कोने की टेबल पर मैं और वो एक-दूसरे की आँखों में ज़िंदगी तलाश रहे थे। यूँ तो हम यहाँ तक पहुँचते-पहुँचते दो-दो पेग ले ही चुके थे, पर मेरी हिप फ्लास्क में दो पेग और भी बाकी थे; जिसमें से मैंने एक बड़ा घूँट पीया और वापस जींस की बैक पॉकेट में सरका दिया। पब्लिक प्लेस और ख़ासकर जहाँ ड्रिंक अलाऊ ना हो, वहाँ पीने का अलग मज़ा, वर्जित सेब के आकर्षण की तरह है।
यूँ तो खाना खाए बग़ैर भी मेरा चलता नहीं, पर उस चटोरी की इच्छा पूछते-पूछते इतने स्टॉर्टर खा लिए कि अब पेट में थोड़ी भी जगह थी नहीं।
वेटर ने बिल लाकर मेरी तरफ़ रखा ही था, कि वह भड़क गई- “आपको किसने कहा, कि बिल वे पे करेंगे?”
वेटर ने कुछ कहा नहीं। बस खड़ा रहा और शायद समझने की कोशिश कर रहा था कि इसमें ग़लत क्या हुआ। उसने बिल फोल्डर अपनी तरफ़ सरकाते हुए पूछा- “आप लोगों की ट्रेनिंग का पार्ट है न, कि बिल हमेशा मेल को दिया जाए…?”
“जी मैडम। सॉरी मैडम।” उसने इतना ही कहा और उसके दिए हुए पैसे लेकर, ट्रेनिंग में मिली मुस्कान ख़र्चते हुए चला गया।
मैंने कहा- “उस बेचारे पर क्यों भड़क रही थी, किसी ना किसी के सामने तो बिल रखना ही था उसे।”
“हाँ, तो हर बार तुम्हारे सामने ही क्यों? तुम मेल हो इसलिए? मुझे साफ़-साफ़ पता है, दुनिया में तुम मेल्स ने अपने पक्ष में बहुत से वहम पैदा कर लेने में मास्टरी की हुई है।”
उसकी औरत परस्ती मुझे डसे और आगे बढ़े, इससे पहले ही मैंने आँख मारते हुए कामयाबी का परचम फहराया- “हाँ इसलिए समझ लो, या…ही…ही…ही…”
“क्या हुआ दुष्ट? बात पूरी करो अपनी।” मेरी शरारत भाँप चुकी थी वह।
“पहले प्रॉमिस करो कि मारोगी नहीं मुझे। पिछली बार मज़ाक की सज़ा बहुत ज़ोर से पड़ी थी।”
“मार खाने के काम करोगे तो क्या आरती उतारूँगी तुम्हारी?…अच्छा ठीक है, नहीं मारुंगी। बोलो क्या कह रहे थे?”
“यही कि, हो सकता है वेटर को तुम्हारी शक्ल भिखारियों की तरह दिखी हो…” मैंने अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा।
उसने फटाफट टेबल पर पड़ी फोर्क उठाई और टेबल पर ही रखे मेरे दूसरे हाथ में घोंपने की एक्टिंग करते हुए होठों को भींच कर कहा- “तुम्हारा मर्डर कर दूंगी मैं।” और देखा तो ऐसे, जैसे मैं किसी दुश्मन देश का एजेंट हूँ।
मुझे उसकी झल्लाहट और चिढ़े हुए चेहरे पर भरपूर रस अल्हड़ाता नज़र आया। कितने ही इश्किया क़िस्सों के राज़दार रहे मिर्ज़ा साहब मेरी ज़बान पर थिरकने लगे-
“तू क़ातिल, तेरा चेहरा क़ातिल,
चेहरे का ये काला तिल भी क़ातिल,
भूल कर भी कहीं तुम देख न लेना आईना,
कि कहीं मार न दे, क़ातिल को क़ातिल।”
उसकी हया से भीगी मुस्कान भी क़ातिलों की मेरिट लिस्ट में जगह बनाती हुई बोल पड़ी- “बहुत बड़े वाले दुष्ट हो, सच में…”
मैंने उसे तसल्ली से देखा। आज की तारीख़, मैंने बहस की तारीख़ लिखे जाने से बचा ली। हिप फ्लास्क की ओर मेरा दायाँ हाथ बढ़ा ही था कि मैंने एक और भरपूर नज़र उसके चेहरे पर डाली और देखा कि बहस बुझ नहीं गई, बस चुहलबाजी की राख उसे पसंद आ गई जो उसने अपने चेहरे पर मल ली थी।
ये कहानी ‘हंड्रेड डेट्स ‘ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Hundred dates (हंड्रेड डेट्स)
