Dwarka Nagri
Dwarka Nagri

Dwarka Nagri: भगवान कृष्ण को समर्पित द्वारकाधीश मंदिर गुजरात राज्य के द्वारका में स्थित है। गोमती नदी किनारे बसा यह तीर्थ चारों धामों में से एक है। जिसे जगत मंदिर और त्रिलोक सुंदर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।

द्वारका भारत के सबसे प्राचीन नगरों में से एक है। यह तीर्थस्थल आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार धामों व पवित्र सप्तपुरियों में से एक है। द्वारका को देवनगरी के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर के मुख्य देवता भगवान कृष्ण हैं, जो द्वारकाधीश के नाम से जाने जाते हैं, हिन्दू धर्मग्रन्थों के अनुसार, भगवान कृष्ण ने इसे बसाया था। यह श्रीकृष्ण की कर्मभूमि है।

मान्यता है कि यहां की यात्रा करने से जन्मों-जन्मों के पाप कट जाते हैं। द्वारका में प्राचीन इमारते हैं। जो शिल्पकला का बेजोड़ नमूना है। इस मंदिर को जगत मंदिर (सार्वभौमिक मंदिर) या त्रिलोक सुंदर (तीनों लोक में सबसे सुंदर) के रूप में जाना जाता है। पुराणों में वर्णित है कि लीलाधर श्रीकृष्ण ने उत्तरकाल में शांतिपूर्वक एकांत क्षेत्र में रहने के उद्देश्य से सौराष्ट्र में समुद्र तट पर ‘द्वारका पुरी’ नामक नगरी बसा कर आसपास के क्षेत्र में अपना राज्य स्थापित किया था।

आज की द्वारका स्वर्ण मंडित तो नहीं है और न ही अतीतकाल का वैभव है, न ही सागर द्वारा श्रीकृष्ण के पांव धोने की जगह है, न ही हीरे-मोतियों से विभूषित वह भव्य महल है, जहां सुदामा ने अपने बालसखा कृष्ण से मिलने के लिए आंसू बहाए थे। ये सब बीते हुए कल की बातें हैं, मगर आज भी इन्हें स्मरण कर हम आत्मविभोर हो उठते हैं। आज तो यह एक छोटा-सा नगर है, जो द्वारका रेलवे स्टेशन से पांच कि.मी. दूर समुद्र किनारे स्थित है। पुराणों के अनुसार, सागर ने यादव वंश के गौरव और कारुणिक पतन के इतिहास को मूल द्वारका पुरी के साथ ही अपने गर्भ में छिपा लिया था। पृथ्वी पर आज उसका कोई अस्तित्व नहीं है – मगर वहां जाकर विगत की यादें मानस-पटल पर अंकित होने लगती हैं।

युग-प्रवर्तक भगवान श्रीकृष्ण की राजधानी ‘द्वारकाधाम’ की गणना भारत के चार धामों में भी होती है और मोक्षदायिनी सप्तपुरियों में भी। यह एक ऐसा तीर्थ है, जिसे धाम और पुरी दोनों के रूप में मान्यता प्राप्त हैं।
कहते हैं कि भगवान कृष्ण के अंर्तध्यान होते ही द्वारा समुद्र में डूब गई थी, लेकिन श्रीकृष्ण का निजी मंदिर समुद्र में नहीं डूबा था।

युग-प्रवर्तक भगवान श्रीकृष्ण की राजधानी ‘द्वारकाधाम’ की गणना भारत के चार धामों में भी होती है और मोक्षदायिनी सप्तपुरियों में भी। यह एक ऐसा तीर्थ है, जिसे धाम और पुरी दोनों के रूप में मान्यता प्राप्त हैं।
कहते हैं कि भगवान कृष्ण के अंर्तध्यान होते ही द्वारा समुद्र में डूब गई थी, लेकिन श्रीकृष्ण का निजी मंदिर समुद्र में नहीं डूबा था।

ऐसा माना जाता है कि 5000 वर्ष पहले, द्वारका श्री कृष्ण की नगरी थी, जिसे भगवान विश्वकर्मा ने बनाया था, पहले तो मथुरा ही भगवान श्री कृष्ण की राजधानी थी पर मथुरा छोड़ने के बाद उन्होंने द्वारका बसाई थी। जिसका वर्णन महाभारत में भी मिलता है। मान्यता है कि इस स्थान पर मूल मंदिर का निर्माण भगवान श्री कृष्ण के बड़े परपौत्र वज्रनाभ ने करवाया था। कालांतर मे मंदिर का विस्तार एवं जीर्णोद्धार होता रहा। मंदिर को वर्तमान स्वरूप 16वीं शताब्दी में प्राप्त हुआ था। भगवान श्री कृष्ण की द्वारिका वर्तमान मंदिर से 9 किलोमीटर पानी के अंदर 100 मीटर नीचे डुबी हुई हैं । द्वारिका के समुद्र में डूबने पर अर्जुन द्वारिका गए और वज्र तथा शेष बची यादव महिलाओं को हस्तिनापुर ले गए। कृष्ण के प्रपौत्र वज्र को हस्तिनापुर में मथुरा का राजा घोषित
किया। वज्रनाभ के नाम से ही मथुरा क्षेत्र को ब्रजमंडल कहा जाता है।

द्वारका माहात्म्य- स्कंदपुराण के अनुसार ‘द्वारका के प्रभाव से समस्त जीव जंतु एवं प्राणी पापमुक्त हो जाते हैं। जो लोग द्वारका में रहते हैं और जितेंद्रीय होकर भगवान कृष्ण की सेवा में लगे रहते हैं, वे धन्य हैं। द्वारका में रहने वाले समस्त प्राणियों को जो गति प्राप्त होती है, वह उर्ध्वरेता मुनियों को भी दुर्लभ है । ‘द्वारका’ सब तीर्थों में उत्तम कही गई है। द्वारका में जो भी होम, जप, दान और तप किए जाते हैं, वे सब भगवान श्रीकृष्ण के
समीप कोटिगुणा एवं अक्षय होते हैं।

dwarka bhagwan shrikrishna ki rajnadhani
dwarka bhagwan shrikrishna ki rajnadhani

श्री द्वारकाधीश मुख्य मंदिर गोमती नदी के संगम पर बना हुआ है, जो अरब सागर से मिलती है। नगर के एक हिस्से के चारों ओर चहारदीवारी है। जिसके दो मुख्य द्वार है। इसके भीतर ही सारे बड़े-बड़े मन्दिर है।
दक्षिण में स्थित स्वर्ग द्वार, प्रमुख द्वार हैं। जिससे श्रद्धालु अंदर आते हैं। यह द्वार मुख्य बाजार से होते हुए गोमती नदी की ओर जाता है, और उत्तर दिशा में स्थित मोक्ष द्वार दूसरा द्वार हैं। जिससे दर्शन कर बाहर निकलते हैं। पुरातात्त्विक खोज में सामने आया है कि यह मंदिर करीब 2,000 से 2200 साल पुराना है।
इस मंदिर की इमारत 5 मंजिला है और इसकी ऊंचाई 235 मीटर है। यह इमारत 72 स्तंभों पर टिकी हुई है।
भगवान श्रीकृष्ण और यादव साम्राज्य की पौराणिक राजधानी ‘द्वारका’ धार्मिक हिंदुओं और पुरातत्वविदों के लिए एक विशेष महत्त्व रखती है। हर साल सैकड़ों-हजारों की तादाद में श्रद्धालु इस विश्वास के साथ मंदिर में आते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण उन्हें अच्छे स्वास्थ्य और समृद्धि का आशीर्वाद देंगे और उन्हें आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करेंगे।

इस शहर के चारों ओर बहुत ही लंबी दीवार थी जिसमें कई द्वार थे। कई द्वारों का शहर होने के कारण ही इसका नाम द्वारिका पड़ा।
ज्ञात हो कि शब्द द्वारका ‘द्वार’ शब्द से निकला है। क्यों पड़ा बेट द्वारका नाम? मान्यता है, की यहीं पर भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की भेंट हुई थी, इसका नाम तो भेंट द्वारका था पर बाद में कहते-कहते बेट द्वारका पड़ गया।
मंदिर की विशेषता यह मंदिर एक परकोटे से घिरा है जिसमें चारों ओर एक द्वार है। इनमें उत्तर दिशा में
स्थित मोक्ष द्वार तथा दक्षिण में स्थित स्वर्ग द्वार प्रमुख हैं। सात मंजिले मंदिर का शिखर 235 मीटर ऊंचा है। इसकी निर्माण शैली बड़ी आकर्षक है। शिखर पर करीब 84 फुट लम्बी बहुरंगी धर्मध्वजा फहराती रहती है। द्वारकाधीश मंदिर के गर्भगृह में चांदी के सिंहासन पर भगवान कृष्ण की श्यामवर्णी चतुर्भुजी प्रतिमा विराजमान है। यहां इन्हें ‘रणछोड़ जी’ भी कहा जाता है। भगवान ने हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल धारण किए हैं। बहुमूल्य अलंकरणों तथा सुंदर वेशभूषा से सजी प्रतिमा हर किसी का मन मोह लेती है। द्वारकाधीश मंदिर के दक्षिण में गोमती धारा पर चक्रतीर्थ घाट है। उससे कुछ ही दूरी पर अरब सागर है जहां समुद्रनारायण
मंदिर स्थित है। इसके समीप ही पंचतीर्थ है। वहां पांच कुओं के जल से स्नान करने की परम्परा है। बहुत से भक्त गोमती में स्नान करके मंदिर दर्शन के लिए जाते हैं। यहां से 56 सीढ़ियां चढ़ कर स्वर्ग द्वार से मंदिर में प्रवेश कर सकते हैं।

dhvaj pooja ka mahattv
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इस मंदिर में ध्वजा पूजन का विशेष महत्त्व है मंदिर के शिखर पर ध्वज हमेशा पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर लहराता रहता है।
इसलिए इतनी लंबी होती है ध्वज – द्वारकाधीशजी के मंदिर पर लगे ध्वज को कई किलोमीटर दूर से भी देखा जा सकता है। यह ध्वज 52 गज का होता है।

52 गज के ध्वज को लेकर यह कथा है कि द्वारका पर 56 प्रकार के यादवों ने शासन किया। इन सभी के अपने भवन थे। इनमें चार भगवान श्रीकृष्ण, बलराम, अनिरुद्धजी और प्रद्युमनजी देवरूप होने से इनके मंदिर बने हुए हैं, मंदिर के शिखर पर इनके अपने ध्वज लहराते हैं। बाकी 52 प्रकार के यादवों के प्रतीक के रूप में यह 52 गज का ध्वज द्वारकाधीशजी के मंदिर पर लहराता है। मंदिर में प्रवेश के लिए गोमती माता
मंदिर के सामने से 56 सीढ़ियां भी इसी का प्रतीक हैं।

ध्‍वजा पर सूर्य और चंद्रमा का प्रतीक

चिह्न : यह चिह्न इस बात का सूचक माना जाता है कि पृथ्‍वी पर सूर्य और चंद्रमा के मौजूद होने तक द्वारकाधीश का नाम रहेगा। सूर्य-चंद्र श्रीकृष्ण के भी प्रतीक माने जाते हैं। इसलिए उनके मंदिर के शिखर पर सूर्य-चंद्र के चिह्न वाले ध्वज लहराते हैं।

दिन में 3 बार बदला जाता है द्वारकाधीश का ध्वज : द्वारकाधीशजी के मंदिर पर लगा ध्वज दिन में 3 बार सुबह, दोपहर और शाम को बदला जाता है। हर बार अलग-अलग रंग का ध्वज मंदिर के ऊपर लगाया जाता है। यह ध्वज धर्म और आध्यात्मिकता का प्रतीक माना गया है।

द्वारकाधीशजी के ध्वज का रंग 7 रंगी क्यों?
मेघश्यामं पीतकौशेयवासं
श्रीवत्साङ्कं कौस्तुभोद्भासिताङ्गम ।
पुण्योपेतं पुण्डरीकायताक्षं
विष्णुं वन्दे सर्वलोकैकनाथम् ॥

इसका अर्थ है: मेघ समान रंग वाले, पीले रेशमी पीताम्बर धारण किए, श्रीवत्स के चिह्नवाले, कौस्तुभमणि से सुशोभित अंग वाल, पुण्य करने वाले, कमल समान लंबी आंख वाले सर्वलोक के एकमात्र स्वामी भगवान श्रीद्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण को मैं नमस्कार करता हूं।
भगवान श्रीद्वारकाधीशजी के अंग मेघ समान श्यामरंगी होने से, मेघधनुष समान प्रकाशमान, श्रीजी की ध्वजा का वर्ण मेघधनुष के समान सतरंगी जिनमें लाल, हरा, पीला, नीला, सफेद, भगवा और गुलाबी शामिल है। यह सभी रंग शुभ सूचक और विशिष्ट गुण बताते हैं।

ध्वज के रंगों का मतलब : लाल रंग उत्‍साह, स्‍फूर्ति, पराक्रम, धनधान्‍य, विपुल संपत्ति, समृद्धि का प्रतीक है। हरा रंग आध्‍यात्मिक प्रेरणा का प्रतीक माना जाता है। यह शांति और दृष्टि को शीतलता देने वाला है। इसके साथ ही मनुष्‍य की सुख-शांति और आंखों की ज्‍योति बढ़ाने वाला है। पीला रंग ज्ञान, विद्या और बुद्धि का प्रतीक माना जाता है, नीला रंग नीला रंग बल और पौरुष का प्रतीक माना जाता है, सफेद रंग पवित्रता, शुद्धि और विद्या का
प्रतीक माना जाता है, भगवा रंग शूरवीरता, साहस, निडरता और प्रगति का द्योतक माना जाता है, गुलाबी रंग मनुष्‍य के स्‍वभाव को गुलाब जैसा बनाने का सूचक है जो कोमल और आकर्षक होता है यह कांटों के ऊपर
भी मुस्कुराता है। मनुष्य को भी ऐसा ही होना चाहिए।

द्वारका के आसपास अनेक पवित्र मंदिर हैं जो प्रतिवर्ष लाखों पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। यदि
कभी आप द्वारकाधाम आएं तो इन स्थलों पर जाना न भूलें।

द्वारकाधीश मंदिर के दक्षिण में गोमती धारा पर चक्रतीर्थ घाट है। उससे कुछ ही दूरी पर अरब सागर है जहां समुद्रनारायण मंदिर स्थित है। इसके समीप ही पंचतीर्थ है। वहां पांच कुओं के जल से स्नान करने की परम्परा है। बहुत से भक्त गोमती में स्नान करके मंदिर दर्शन के लिए जाते हैं। यहां से 56 सीढ़ियां चढ़ कर स्वर्ग द्वार से मंदिर में प्रवेश कर सकते हैं। मंदिर के पूर्व दिशा में शंकराचार्य द्वार स्थापित शारदा पीठ स्थित है। द्वारका के दक्षिण में एक लम्बा ताल है। इसे ‘गोमती तालाब’ कहते हैं। इसके नाम पर ही द्वारका को गोमती द्वारका कहते हैं।

इनके आगे यात्री कैलाशकुण्ड पर पहुंचते हैं। इस कुण्ड का पानी गुलाबी रंग का है। कैलाशकुण्ड के आगे सूर्यनारायण का मन्दिर है। इसके आगे द्वारका शहर का पूरब की तरफ का दरवाजा पड़ता है। इस दरवाजे
के बाहर जय और विजय की मूर्तियां है। जय और विजय बैकुण्ठ में भगवान के महल के चौकीदार हैं। यहां भी ये द्वारका के दरवाजे पर खड़े उसकी देखभाल करते हैं। यहां से यात्री फिर निष्पाप कुण्ड पहुंचते हैं।

इस गोमती तालाब के ऊपर नौ घाट है। इनमें सरकारी घाट के पास एक कुण्ड है, जिसका नाम निष्पाप कुण्ड है। इसमें गोमती का पानी भरा रहता है। नीचे उतरने के लिए पक्की सीढ़िया बनी है। यात्री सबसे पहले इस निष्पाप कुण्ड में नहाकर अपने को शुद्ध करते हैं। बहुत-से लोग यहां अपने पुरखों के नाम पर पिंड-दान भी करते हैं।
गोमती के दक्षिण में पांच कुंए है। निष्पाप कुण्ड में नहाने के बाद यात्री इन पांच कुंओं के पानी से कुल्ले करते हैं। तब रणछोड़जी के मन्दिर की ओर जाते हैं। इससे बीस मील आगे कच्छ की खाड़ी में एक छोटा सा
टापू है। इस पर बेट-द्वारका बसी है। गोमती द्वारका का तीर्थ करने के बाद यात्री बेटद्वार का जाते है। बेट-द्वारका के दर्शन बिना द्वारका का तीर्थ पूरा नहीं होता। बेट-द्वारका पानी के रास्ते भी जा सकते है और जमीन
के रास्ते भी।

दक्षिण की तरफ बराबर-बराबर दो मंदिर है। एक दुर्वासाजी का और दूसरा मन्दिर त्रिविक्रमजी का जिन्हें टीकमजी कहते हैं। त्रिविक्रमजी के मन्दिर के बाद प्रद्युम्रजी के दर्शन करते हुए यात्री इन कुशेश्वर भगवान
के मन्दिर में जाते हैं। मन्दिर में एक बहुत बड़ा तहखाना है। इसी में शिव का लिंग है और पार्वती की मूर्ति है।

कुशेश्वर शिव मन्दिर के बराबर-बराबर दक्षिण की ओर छ: मन्दिर और है। इनमें अम्बाजी और देवकी माता के मन्दिर खास हैं। रणछोड़जी के मन्दिर के पास ही राधा, रुक्मिणी, सत्यभामा और जाम्बवती के छोटे-छोटे मन्दिर हैं। इनके दक्षिण में भगवान का भण्डारा है और भण्डारे के दक्षिण में शारदा-मठ है।

शारदा-मठ को आदि गुरु शंकराचार्य ने बनवाया था। उन्होंने पूरे देश के चार कोनों में चार मठ बनायें थे। उनमें एक यह शारदा-मठ है। परंपरागत रूप से आज भी शंकराचार्य मठ के अधिपति है। भारत में सनातन धर्म के अनुयायी शंकराचार्य का सम्मान करते हैं।

आगे वासुदेव घाट पर हनुमानजी का मन्दिर है। आखिर में संगम घाट आता है। यहां गोमती समुद्र से मिलती है। इस संगम पर संगम-नारायणजी का बहुत बड़ा मन्दिर है।

संगम-घाट के उत्तर में समुद्र के ऊपर एक ओर घाट है। इसे चक्र तीर्थ कहते हैं। इसी के पास रत्नेश्वर महादेव का मन्दिर है। इसके आगे सिद्धनाथ महादेवजी है, आगे एक बावली है, जिसे ‘ज्ञान-कुण्ड’ कहते हैं। इससे आगे जूनीराम बाड़ी है, जिसमें, राम, लक्ष्मण और सीता की मूर्तियां हैं।

इसके बाद एक और राम का मन्दिर है, जो नया बना है। इसके बाद एक बावली है, जिसे सौमित्री बावली यानी लक्ष्मणजी की बावली कहते हैं। काली माता और आशापुरी माता की मूर्तियां इसके बाद आती है।

Gopi taalaab
Gopi taalaab

जमीन के रास्ते जाते हुए तेरह मील आगे गोपी-तालाब पड़ता है। यहां की आस-पास की जमीन पीली है। तालाब के अन्दर से भी रंग की ही मिट्टी निकलती है। इस मिट्टी को वे गोपीचन्दन कहते हैं।
यहां मोर बहुत होते हैं। कहा जाता है, भगवान कृष्ण के बचपन की कहानियों के साथ इस झील का संबंध
है। वे वृंदावन में गोपीयों के साथ रास नृत्य करते थे। जब वह द्वारका में चले गए, तो गोपी अलग होने का सामना नहीं कर सकी और उनसे मिलने आए। वे अपने कृष्ण के साथ उत्तर द्वारका से 20 किमी गोपी तलाब में, शरद पूर्णिमा की रात में एकजुट हो गए और एक बार फिर उनके साथ रास नृत्य किया। किंवदंती का कहना है कि, कृष्ण से भाग लेने में असमर्थ, गोपी ने अपनी जिंदगी इस भूमि की मिट्टी में दी और अपने प्रिय के साथ विलय कर दिया। ऐसा कहा जाता है कि वे पीली मिट्टी में बदल गए, जिन्हें गोपी चंदन कहा जाता है। आज भी गोपी
तालाब की मिट्टी बहुत चिकनी और पीले रंग की है।

Rukmini mandir
Rukmini mandir

यह मंदिर द्वारका शहर से 2 किमी दूर स्थित है। इससे जुड़ी एक कथा है- एक बार भगवान कृष्ण और उनकी पत्नी रुक्मिणीजी ने ऋषि दुर्वासा को द्वारका में रात के खाने के लिए आमंत्रित किया था। तब ऋषि ने इस शर्त पर सहमति जताई की श्री कृष्ण और रुक्मिणीजी किसी भी जानवर की बजाय अपने रथ को अपने आप खींचना होगा। रथ को खींचते समय, रुक्मिणी ह्रश्वयासी हो जाती हैं, इसलिए भगवान कृष्ण ने पवित्र गंगा जल के वसंत
को आकर्षित करने के लिए धरती पर अपना पैर लगाया वहां पानी निकला ।
तब रुक्मिणी ने बिना ऋषि से पूछकर पानी का एक घूंट लिया। उससे नाराज होकर रुक्मिणी को शाप दिया कि वह अपने प्रिय पति से अलग हो जाएगी। इसलिए रुक्मिणी मंदिर द्वारका के जगत मंदिर से 2 किमी दूर स्थित है। यह मंदिर 2500 साल पुराना है। रुक्मिणी मंदिर के बाहरी रूप से बड़े पैमाने पर नक्काशी की गई है। इसमें मूर्तिकला नारथार (मानवीय आंकड़े) का एक पैनल और आधार पर मशहूर गजथार (हाथियों) का एक पैनल है। नर और मादा के आंकड़ों के साथ-साथ भगवान और देवी-देवताओं की सामान्य मूर्तियां, मंदिर के बाहरी हिस्सों में देखी जाती हैं।
रुक्मिणी मंदिर के पास सात तालाब हैं, ये द्वारका में लोकप्रिय पर्यटक आकर्षण है। इन सात तालाबों को सामूहिक रूप से रुक्मिणी व्याध के रूप में जाना जाता है हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार,
यह जगह सभी मनुष्यों के पापों को दूर कर देती है और मानव जाति को मुक्ति प्रदान करती है।

गोपी तालाब से तीन-मील आगे नागेश्वर नाम का शिवजी और पार्वती का छोटा सा मन्दिर है। यात्री लोग इसका दर्शन भी जरूर करते हैं। कहते हैं, भगवान कृष्ण इस बेट-द्वारका नाम के टापू पर अपने घरवालों के साथ सैर करने आया करते थे। यह कुल सात मील लम्बा है, यह पथरीला है, यहां कई अच्छे और बड़े मन्दिर है। कितने ही तालाब है, कितने ही भंडारे है, धर्मशालाएं है और सदावत्त लगते हैं। मन्दिरों के सिवा समुद्र के किनारे घूमना बड़ा अच्छा लगता है।

गीता मंदिर द्वारका के पश्चिमी घाट की ओर भद्रकेश्वर महादेव मंदिर के नजदीक स्थित गहै। यह मंदिर मार्बल के पत्थर के द्वारा बनाया गया है, जो मंदिर की सुंदरता को जोड़ता है।
इसके अलावा, मंदिर की दीवारों पर हिन्दुओं की पवित्र किताब भगवद गीता मंदिर पर अंकित है। इसके साथ ही, मंदिर की छत को एक विशेष तरीके से बनाया गया है ताकि हॉल में सुनाई जाने वाली हर आवाज प्रतिध्वनित हो। तीर्थयात्रियों को रहने के लिए मंदिर में आवास की सुविधा भी उपलब्ध है। सुंदर नक्काशी
और पेंटिंग मंदिर की सुंदरता को बढ़ाती है। भगवान कृष्ण की एक सुंदर छवि मंदिर के पवित्र स्थान में मौजूद है। गीता स्तंभ भी मंदिर में मौजूद है। जन्माष्टमी और होली के शुभ अवसर पर मंदिर को सुंदरता से सजाया जाता है।

रणछोड़ के मन्दिर से डेढ़ मील चलकर शंख-तालाब आता है। इस जगह भगवान कृष्ण ने शंख नामक राक्षस को मारा था। इसके किनारे पर शंख नारायण का मन्दिर है। ऐसी मान्यता है कि शंख-तालाब में नहाकर
शंख नारायण के दर्शन करने से सभी पाप धुल जाते हैं और पुण्य मिलता है।

द्वारका की यात्रा पर जाने का कोई विशेष समय निर्धारित नहीं है। अत: धर्मप्रेमी व पर्यटन के शौकीन यहां वर्ष
भर आते रहते हैं।

कैसे पहुंचे द्वारका धाम?

हवाई यात्रा द्वारा – द्वारका पहुंचने के लिए कोई भी सीधी फ्लाइट नहीं है। द्वारका से सबसे नजदीक का एयरपोर्ट जामनगर है जो यहां से 47 किलोमीटर दूर है। इसके अलावा आप पोरबंदर एयरपोर्ट तक की फ्लाइट
भी ले सकते हैं। यह एयरपोर्ट द्वारका से करीब 98 किलोमीटर दूर है। एयरपोर्ट से आप कैब ले सकते हैं, जो
आपको सीधे द्वारकाधीश मंदिर पहुंचाएगी। दोनों की एयरपोर्ट्स के लिए देश की बड़े शहरों से आसानी से
फ्लाइट मिल जाएगी।

ट्रेन – द्वारका स्टेशन अहमदाबाद – ओखा ब्रॉड गेज रेलवे लाइन पर स्थित है जहां से राजकोट, अहमदाबाद
और जामनगर के लिए रेल सेवा उपलब्ध है। इसके अलावा कुछ ट्रेन सूरत, वड़ोदरा, गोवा, कर्नाटक, मुंबई
तथा केरल तक भी जाती हैं। द्वारका की रेल देश के कई प्रमुख हिस्सों से जुड़ी हैं। द्वारका ट्रेन पूरे देश में फैली हुई है। द्वारका की रेलवे लाइनें गुजरात और पश्चिम भारत के प्रमुख शहरों को जोड़ती हैं।

सड़क मार्ग – द्वारका सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है। द्वारका और आसपास के शहरों में बसें, राज्य परिवहन सेवाएं प्रदान करती है। द्वारका बस की यात्रा पैकेज के रूप में बुक किया जा सकता है। यहां आसानी से नियमित अंतराल पर बसें मिल जाती हैं।

कहां ठहरें? – द्वारका और बेट – द्वारका में यात्रियों के ठहरने के लिए अनेक धर्मशालाएं हैं, जहां हर प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध हैं। प्राय: यात्री यहां पंडों के पास ही ठहरते हैं। कुछ विश्रामगृह एवं लॉज बन गए हैं।

द्वारकाधीश मंदिर के गर्भगृह में चांदी के सिंहासन पर भगवान कृष्ण की श्यामवर्णी चतुर्भुजी प्रतिमा
विराजमान है। यहां इन्हें ‘रणछोड़ जी’ भी कहा जाता है। भगवान ने हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल
धारण किए हैं। बहुमूल्य अलंकरणों तथा सुंदर वेशभूषा से सजी प्रतिमा हर किसी का मन मोह लेती है।