गांधी जी की नजर में नारी
gandhi ji ki nazar mein naari

Gandhi Jayanti: गांधी जी महिलाओं की मुक्ति में विश्वास रखते थे। फिर चाहे उन्हें समाज में समान भागीदारी दिए जानें की बात हो या उन्हें शिक्षित किए जानें की। गांधी जी ने हमेशा महिलाओं को अधिकार दिए जानें की बात की।

पेइचिंग में संपन्न चौथे विश्व महिला सम्मेलन ने एक बार फिर महिलाओं की स्थिति पर विश्व का ध्यान अपनी ओर खींचा है, लेकिन हम आज के क्रांतिकारी महिलावादी विचारों के युग में अक्सर गांधी जी और उनके विचारों की अनदेखी करते हैं, जबकि अनेक लोग गांधी जी और उनके विचारों को महिलाओं का सबसे प्रबल पक्षधर मानते हैं।

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महिलाओं और अन्य मामलों में गांधी जी के विचार काफी दूरगामी एवं समय की धारा से आगे बढ़-चढ़ कर रहे हैं। आजादी के आंदोलन में महिलाओं की भारी संख्या में भागीदारी के लिए महिलाओं को प्रेरित करने का श्रेय अगर किसी को जाता है तो वे गांधी जी ही थे। उनके नेतृत्व में महिलाएं आजादी की लड़ाई में एक जुट होकर टूट पड़ीं और शहीद हो अमर हो गईं। उन्होंने नारी को अबला नहीं माना। अगर वे भी नारी को निरीह एवं असहाय समझते तो आज नारी-गौरव का इतिहास अधूरा रह जाता।
मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित श्रीमती इला भट्ïट स्वीकार करती हंै कि उन्होंने गांधी जी से अपार प्रेरणा प्राप्त की हैं। ऐसी प्रेरणा से ही उन्होंने अपने कार्य का विस्तार किया। वे कहती हैं कि ‘गांधी जी के नेतृत्व में आजादी की लड़ाई में महिलाओं की भागीदारी बड़ी ही स्वाभाविक थी। इस भागीदारी से भारतीय महिलाओं के जीवन में भारी बदलाव आया है। वे भरोसा करती हैं कि वे आज जो कुछ भी हैं वह सब गांधी जी की प्रेरणा से ही संभव हुआ है। महिला शक्ति में गांधी का विश्वास अपनी माता, अपनी पत्नी के साथ उनके अनुभवों पर आधारित है।
उनकी शादी कस्तूरबा के साथ हुई जो उनसे उम्र में छह माह बड़ी थीं। वे पढ़ी-लिखी भी नहीं थीं बापू ने उन्हें साक्षर बना अपने संघर्षी जीवन का साथी बनाया। कस्तूरबा ने भी बापू के हर छोटे-बड़े कामों में हाथ बटाकर अपनी भागीदारी का परिचय देते हुए बड़े ही सादगी एवं सुचारू रूप से जीवन बिताते हुए अंतिम सांस जेल में तोड़ दी।
गांधी जी अपनी पत्नी को ‘बा’ कहकर पुकारते थे। बा का मतलब गुजराती में मां होता है। उन्होंने अपनी डायरी में लिखा है कि ‘बा’ के बिना मैं जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता। गांधी जी को महिलाओं के शोषण का पूरा ज्ञान था। उनका कहना था कि महिलाओं का शोषण खुद महिलाओं द्वारा ही की जाती है। इसका अनुभव उन्हें अपने घर की महिलाओं से हुआ तथा सत्याग्रह का पाठ भी इन्हीं से सीखा।
गांधी जी ने महिलाओं की स्थिति का आकलन अपने घर की महिलाओं के माध्यम से किया, क्योंकि वे उन्हें एक मानवीय दृष्टिï से देखते थे और वे महिलाओं को जीवन के हर क्षेत्र में समान भागीदारी दिए जाने के पक्ष में थे। वे नहीं चाहते थे कि महिलाएं घर के चौखट तक ही सीमित रहें उनका मानना था कि पुरुष एवं महिला का कार्य-क्षेत्र भले ही अलग-अलग है, पर स्वाभिमान पूर्वक जीवन जीने के लिए दोनों को समान अधिकार दिया गया है। बापू स्वयं ‘बा’ के कपड़े धोते पाये गये हैं। इसका मतलब यही होगा कि गृहस्थी और जिन्दगी के कामों में नारी कोई दासी या गुलाम नहीं वह सहचर एवं दोस्त के समान है। नारी की मर्यादा को उन्होंने हमेशा कायम रखा। वे मानते थे कि महिलाएं पुरुषों की सहयोगी हैं जिन्हें प्रकृति ने समान बौद्धिक क्षमताओं का उपहार दिया है। गांधी जी मानते थे कि महिलाओं को पुरुषों के साथ हर छोटे-बड़े काम में हाथ बटाने का तथा उन्हीं की तरह स्वतंत्र एवं स्वच्छ रहने का भी अधिकार है। स्वतंत्रता संग्राम के सर्वश्रेष्ठï संरचनाकार के रूप में ही गांधी जी ने महिलाओं को आजादी की लड़ाई में भाग लेने का आहवान किया था। वास्तव में उन्हें अपने पुरुष सिपहसालारों से अधिक महिला सिपहसालारों पर ज्यादा विश्वास था। आजादी के संघर्ष के दौरान प्रेम और अहिंसा गांधी जी के हथियार थे और वे महिलाओं को इन सबके लिए पुरुषों से श्रेष्ठï मानते थे, क्योंकि मां होने के कारण महिलाओं में प्रेम और शांति के तत्त्व और गुण अधिक होते हंै।
गांधी जी को यह कभी समझ नहीं आया कि लोग हमेशा महिलाओं को पुरुषों से कमजोर क्यों मानते हंै? क्या इसलिए कि वे पुरुषों की तरह हिंसक और क्रूर नहीं हैं, अगर यह बात है तो वे कमजोर ही भली। गांधी जी महिलाओं को त्याग और अहिंसा की मूर्ति मानते थे। वे अपने संघर्ष और एक न्यायप्रिय आधारित समाज की स्थापना में महिलाओं की भागीदारी को अति आवश्यक मानते थे।
गांधी जी को घर और बाहर दोनों ही स्थानों पर महिलाओं के शोषण का पूरा-पूरा अहसास था। वे मानते थे कि समाज में महिलाओं का शोषण महिलाओं की सहमति से ही होता है। इला भट्ïट गांधी जी के इन विचारों को आज के संदर्भों में भी सही मानती हैं। गांधी जी ने महिलाओं के इस प्रकार का शोषण अपने घर में भी देखा था और इस शोषण का शांतिपूर्ण प्रतिकार भी। उन्होंने सत्याग्रह का पाठ अपने घर की महिलाओं से ही सीखा था। बाद में गांधी जी ने इसी सत्याग्रह का प्रयोग ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध किया था।
इला भट्ïट जी आज के संदर्भ में महिलाओं के लिए तत्कालिक संघर्ष की ओर इशारा करती हैं वह हंै, स्वदेशी के लिए संघर्ष। वे आत्मनिर्भरता और स्वरोजगार की पक्षधर हैं। गांधी जी ने निश्चित रूप से महिलाओं की बेरोजगारी के मुद्ïदे को समझा था तभी तो प्रतिकात्मक और व्यवहारिक रूप से उन्होंने खादी को आजादी के संदर्भ के रूप में उजागर किया था। खादी की वकालत उन्होंने गरीब महिलाओं को रोजगार दिलाने के लिए ही की थी।
गांधी के लेखों में कई जगह ऐसे दृष्टïांत हैं जहां पुरुष-महिला समानता को व्यावहारिक ढंग से पेश किया गया है। मसलन महिलाओं को घर की चौखट तक सीमित रखना, पुरुषों का महिलाओं के कामकाज में हाथ बांटना तथा महिलाओं को जीवन के हर क्षेत्र में प्रवेश से संबंधित लेखों में उन्होंने महिलाओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है।
गांधी जी का स्पष्टï मानना था कि महिलाओं की घरेलू दास्ता पुरुषों की उनके प्रति क्रूरता है। इसी तरह उनका मानना था कि बेटियों को भी बेटों की तरह पूरे अधिकार मिलने चाहिए। पति की कमाई पूरे घर की सम्मिलित सम्पत्ति है और उस पर पत्नी का समान अधिकार है। कुल मिलाकर गांधी जी के विचारों से स्पष्टï है कि स्त्री-पुरुष में प्राकृतिक भेद के सिवाय कोई अंतर नहीं है। निस्संदेह गांधी के ये विचार अदम्य साहसी और क्रांतिकारी थे जो वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी एकदम खरे हैं।