निम्मा परी से मिलने के बाद सत्ते, बिट्टू और टुन्नू, तीनों को लगा, जैसे उनके पंख उग आए हैं। खुशी के मारे वे बावले से हो गए थे।
तीनों सरपट दौड़े और बाहर खड़े दोस्तों के बीच जाकर बोले, “अरे भई, सुनो, सुनो। हम लोग पता नहीं, क्या-क्या सोच रहे थे। पर निम्मा परी तो अच्छी है, बहुत अच्छी…!”
और अगले दिन से केवल सत्ते, बिटू और टुन्नू ही नहीं, फागुन गाँव की पूरी की पूरी बच्चा पार्टी रात को बुधना और निम्मा के घर जमने लगी।
कोई पंद्रह-बीस बच्चे। सबके सब घोर शरारती। और उनमें सबसे छोटी छुटकी की शैतानियों का तो जवाब ही नहीं। उसे सब कहते, शैतानों की अम्माँ! पर निम्मा परी के आगे सब शांत रहते। और छुटकी तो निम्मा परी की लाडली बिटिया ही बन गई। निम्मा परी कोई काम बताती, तो सबसे पहले वही दौड़कर जाती।
देखकर निम्मा परी का जी खुश हो जाता। वह उसे पास बुलाकर, बड़े प्यार से सिर पर हाथ फेरती।
टुन्नू अकसर निम्मा परी की गोद में ही बैठता था। बड़े अधिकार से। अब उसकी बगल में छुटकी की जगह भी पक्की हो गई थी। और वही सबसे पहले सुर छेड़ती थी, “कहानी…निम्मा परी। कोई नई कहानी सुनाओ न, जो पहले कभी सुनी न हो…!”
और टुन्नू उसी सुर को आगे बढ़ाता, “निम्मा परी, कोई प्यारी-प्यारी कहानी सुनाना। खूब मजेदार…!”
दोनों नन्हे-मुन्नों की नन्ही-मुन्नी फरमाइशों से निम्मा परी रीझ उठती। और उसी रीझ में से निकल पड़ती कोई नई कहानी। सचमुच ऐसी कि सुनने वाले सुध-बुध खोकर, साथ-साथ बहते ही चले जाएँ।
पहली बार जब निम्मा परी ने जुगनी और सुनहरे पंखों वाली चिड़िया की कहानी सुनानी शुरू की, तो सब बच्चे खो गए। जैसे किसी ने जादू कर दिया हो।
कहानी थी जुगनी की। एक छोटी सी लड़की, जिसके जीवन में बहुत दुख, बहुत मुश्किलें थीं। मगर एक दिन जब वह खिड़की के पास उदास बैठी थी, सुनहरे पंखों वाली चिड़िया आई उसके पास। दोनों में खूब बातें हुईं और दोस्ती भी। और फिर शुरू हुई दोनों की अनोखी यात्रा। सात समंदर के पार एक अजब देश में वे पहुँचे, और फिर…!
कहानी सचमुच थी ही ऐसी, जो मन के तार छेड़ती थी। एक के बाद एक कौतुक और रोमांच से भरे प्रसंग।…कहानी सुनते-सुनते कभी सब एक साथ हँसते, कभी उदास हो जाते, कभी दिल थामकर आगे की घटना सुनने लगते। और किसी विशाल नदी की कल-कल, छल-छल की तरह कहानी आगे बढ़ती ही जाती। रास्ते में कभी पहाड़, कभी जंगल, कभी घोर बियाबान…! पल-पल रंग बदलती कहानी, आगे और आगे बढ़ती जाती।…
यह सचमुच अनोखी कहानी थी, जो पहले कभी किसी ने सुनी न थी। कहानी पूरी होते ही सबने एक साथ कहा, “वाह निम्मा परी, वाह…!”
उस दिन से निम्मा परी बन गई गाँव के सब बच्चों की कहानियों वाली निम्मा दीदी।
फिर तो निम्मा परी की कहानियों का पूरा खजाना ही खुल गया। कभी गोगापुर की जादूबाई ढोलक वाली का किस्सा तो कभी तितली दादी के छींटदार स्वेटर बुनने की कहानी। एक बार तो निम्मा परी ने सुयोरानी के सतखंडे महल का किस्सा सुनाया तो वह इतना लंबा खिंचता गया कि पूरी रात बीत गई सुनते-सुनते। सुबह जाकर वह पूरा हुआ।
बीच-बीच में निम्मा परी शेर, हाथी, भालू, लोमड़, मैना और तोतों की ऐसी अजब-गजब आवाजें निकालती कि सुनते-सुनते बच्चे जोर से हँस पड़ते। और किस्सा फिर आगे चल पड़ता। नए-नए रास्तों पर बढ़ता जाता।
खाली बच्चे ही नहीं, अब तो बुधना की माँ सुरसती बाई भी निम्मा के किस्सों की मुरीद हो गई थी। वह निम्मा परी के किस्से सुनती और मन ही मन सोचती, ‘कितनी प्यारी और साफ दिल की है निम्मा। इसे तो लगता है, बुधना का वरदान मिला है। तभी तो सारी दुनिया को खुशियाँ बाँटती फिरती है। अगर यह सुंदर परी बुधना की बहू बनकर इस घर में ही रह जाए तो…!’
अगले ही पल सुरसती बाई के मन में एक नई लहर पैदा हो जाती, ‘सच्ची, जब से निम्मा आई है, इस झोंपड़ी में दीये जल उठे हैं। यों है तो यह टूटी-फूटी सी झोंपड़ी, पर भला कौन सा सुख नहीं है इसमें? सुख तो असल में मन का होता है, प्यार का…! और यही तो इस लाडली परी में है।’
सोचते-सोचते बुधना की माँ के चेहरे पर सुख और आनंद का उजास छा जाता।
और बच्चे तो निम्मा दीदी के इस कदर मुरीद हो गए थे कि सबकी उससे पक्की दोस्ती हो गई थी। फिर टुन्नू और छुटकी से तो इतना ज्यादा प्यार था निम्मा का कि दोनों निम्मा दीदी की गोद में बैठकर ही कहानियाँ सुनते। और सुनते-सुनते अकसर वहीं सो जाते।
निम्मा रात में उन्हें अपने साथ ही सुलाती थी।
सच ही टुन्नू और छुटकी, दोनों इतने चंचल, इतने प्यारे और नटखट बच्चे थे कि उन दोनों ने निम्मा परी का जी मोह लिया था।
वह कभी-कभी हँसकर कहती भी थी, “सच्ची कहूँ, टुन्नू और छुटकी जब मेरी गोद में बैठे होते हैं, तो मुझे इतनी कहानियाँ सूझती हैं, इतनी कहानियाँ कि जैसे यह खजाना कभी खत्म होगा ही नहीं। इन दोनों का भोलापन देखती हूँ तो मैं किसी और ही दुनिया में पहुँच जाती हूँ। सो मेरी कहानियों का सारा खजाना तो टुन्नू और छुटकी में ही है। वहीं से निकलती हैं सारी की सारी कहानियाँ।”
सुनकर टुन्नू तालियाँ बजा-बजाकर हँसता, “हा-हा…ही..ही..ही…!” और छुटकी के टूटे दाँतों के बीच से झरती शरारती हँसी, “खी-खी, खिक-खिक…खिक…!”
मगर इतना भी तय था कि निम्मा परी की कहानी सुनने कोई और पहुँचे या न पहुँचे, पर टुन्नू और छुटकी तो पहुँचते ही थे। उनसे लाड़ करते-करते जाने कब निम्मा परी की कहानी शुरू हो जाती। और फिर तो वह ऐसी चलती, ऐसी चलती कि कुछ पूछो ही मत।
ये उपन्यास ‘बच्चों के 7 रोचक उपन्यास’ किताब से ली गई है, इसकी और उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Bachchon Ke Saat Rochak Upanyaas (बच्चों के 7 रोचक उपन्यास)
