होली की सुबह मुँह अंधेरे एक बकरी अपने दोनों बच्चों को लिए सरपट जंगल की ओर भाग रही थी। सामने एक गुफा देख झट से बच्चों को साथ लिए अंदर घुस गई, मगर अगले ही क्षण थर-थर काँपने लगी क्योंकि सामने बाघ बैठा उसी को देख रहा था।
बकरी सोचने लगी एक तरफ मनुष्य से जान बचाना चाही मगर अब यहाँ भी खैर नहीं, अब मेरे साथ मेरे प्यारे बच्चों की जान चली जायेगी_ अब करे तो क्या करें? तभी बाघ दहाड़ कर बोला- ओ बकरी, तुम मेरे गुफा में क्यों घुस आई हो, क्या मुझसे तुम्हें डर नहीं लगता? बकरी साहस बटोरकर बोली बाघ भैया, आज खुशियों का त्यौहार होली है और ऐसे त्यौहारों में मनुष्य बड़ी संख्या में हम बकरियों को काट-काटकर हमारे माँस खाते हें और खुशियां मनाते हैं। इसलिए चुपके से मुँह अंधेरे एक मनुष्य के घर से रस्सी तुड़ाकर अपने बच्चों को साथ लिए जान बचाने जंगल के तरफ भाग आई लेकिन गलती से आपके गुफा में घुस आई और अब मैं जानती हूँ हम लोग की यहाँ भी खैर नहीं। अतः आपसे विनती करती हूँ, हे बाघ भैया, मुझे मार कर आप खा लो पर मेरे इन बच्चों को मत मारना, इसकी जान बख्श दो और बकरी गिड़गिड़ाने लगी।
बाघ बोला- अरे बकरी बहन, अगर तुम सबको खाना ही होता तो इस गुफा में घुसते ही झपट्टा मारकर अब तक खा चुका होता लेकिन मैं ऐसा नहीं करूंगा।
क्योंकि कल रात मैंने स्वप्न में भगवान का दर्शन किया, भगवान कह रहे थे- अरे ओ दुष्ट बाघ, तुम जीवन में आज तक पशु-पक्षियों की हत्या करते, खाते अपने दिन गुजारते रहे हो, किसी भी दिन कोई भी अच्छा काम नहीं किया आजतक। सचमुच तुम घोर पापी हो। इसी बीच मेरी नींद टूट गई और तब से सपने की बात सोच मेरे मन में आत्मग्लानि होने लगी है और इसी सोच में डूबा- डूबा मैंने दृढ़ निश्चय कर लिया हूँ कि अब कम से कम किसी त्यौहार के दिन किसी भी जीव-जन्तु को हरगिज नहीं मारूंगा, न ही खाऊंगा।
बाघ के इस दृढ़ निश्चय को देख-सुनकर बकरी ने अत्यंत राहत महसूस की, क्योंकि आज तो होली का त्यौहार है अतः अब उसके साथ-साथ उसके दोनों प्यारे बच्चों की जान बच जायेगी और बकरी मुस्करा उठी।
बकरी आगे सोचने लगी कि मनुष्य तो विवेकपूर्ण प्राणी है मगर ये क्या- मानव लोग दुर्गापूजा, कालीपूजा, होली जैसे त्यौहारों में तो और ज्यादा से ज्यादा जानवरों को मारते-काटते हैं तथा नये-नये वस्त्र पहनकर सप्रेम खुशी-खुशी हमारा माँस खाते हैं, जबकि इस बाघ ने तो त्यौहारों में यानि शुभ दिनों में किसी भी जीव-जंतु को हरगिज न मारने-खाने का दृढ़ निर्णय कर लिया है, अतः ये देख सुन अब मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मनुष्य और इस बाघ (जानवर) में कौन विवेकपूर्ण प्राणी है और कौन विवेकहीन?
ये कहानी ‘ अनमोल प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं–Anmol Prerak Prasang(अनमोल प्रेरक प्रसंग)
