एक साधु मृत्यु-शय्या पर पड़ा था। चारों ओर उसके भक्त और शिष्य जमा थे। साधु ने उनसे कहा, “मैं मर रहा हूँ। कुछ पूछना हो मुझसे तो जल्दी से पूछ लो।”
“आप ज्ञानी कब और कैसे बने?” एक शिष्य ने पूछा, “आपके गुरु कौन थे?”
साधु मुस्कराया और बोला, “मेरे जीवन की एक घटना सुन लो। इन सब प्रश्नों के उत्तर उस घटना में तुम्हें मिल जायेंगे। यह उन दिनों की घटना है, जब सारे शास्त्र पढ़कर मुझे यह भ्रम हो गया था कि मैं बहुत ज्ञानी हूँ, सब कुछ जानता हूँ। अकड़ से घूमता-था, और सबको उपदेश देने के लिए तैयार रहता था। एक बार एक गाँव में पहुँचा। वहाँ उपदेश देने के लिए कोई और न मिला, तो मैंने एक छोटे से बच्चे को घेरकर कहा, “तू बहुत नासमझ मालूम होता है। आ, मैं तुझे ज्ञान दूं, समझ दूं।
बच्चे के हाथ में एक दीपक था। उसने कहा, ‘मैं अवश्य आपको गुरु बना लूंगा, पहले मेरे एक प्रश्न का उत्तर दे दें। प्रश्न यह है कि दीपक के बुझने पर उसकी ज्योति कहां चली जाती है?
‘मैं उसका प्रश्न सुनकर हक्का-बक्का रह गया। उसके प्रश्न का कोई उत्तर मेरे पास न था। मैं यह तो जानता था कि दीपक में ज्योति कहाँ से आयी, लेकिन कहां गयी, यह बताना मुझे असंभव लग रहा था।
‘अपनी ओर देखता हुआ वह अज्ञानी बच्चा मुझे परम ज्ञानी लगा। मैंने उसके चरणों में सिर टेककर कहा, ‘तुम मेरे गुरु हो, बच्चे ! तुमने मुझे परम अज्ञान की उस स्थिति पर लाकर खड़ा कर दिया, जहां पहुँचे बिना कोई परम ज्ञानी नहीं बन सकता।
ये कहानी ‘ अनमोल प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं–Anmol Prerak Prasang(अनमोल प्रेरक प्रसंग)
