kala ki keemat
kala ki keemat

एक किसान अपने किशोर बेटे से बहुत दुखी रहता था। इस दुख की वजह यह थी कि वह खेती-बाड़ी के बजाय जमीन पर, दीवार पर चित्र बनाता रहता था। एक बार उसे कहीं से लकड़ी की एक सुराही पड़ी मिल गई। लड़के ने उसकी धूल-मिट्टी साफ की और फिर उसे खूबसूरत चित्रें से सजा दिया और अपने घर के बाहर सजा दिया। एक दिन उधर से एक व्यापारी गुजर रहा था। वह राजा से मिलने जा रहा था।

उसकी नजर सुराही पर पड़ी तो उसे लगा कि राजा को उपहार देने के लिए यह एक अच्छी वस्तु हो सकती है और उसने अच्छी कीमत देकर वह सुराही खरीद ली। जब राजा को यह सुराही मिली तो उसे बहुत पसंद आई। उसने व्यापारी से कहा कि अगले महीने उसका जन्मदिन आने वाला है।

वह चाहता है कि अपने मेहमानों को ऐसी ही कोई सुंदर वस्तु भेंट में दे। व्यापारी ने राजा को उस लड़के के बारे में बताया। राजा ने ससम्मान उसे बुलाया और अपने दरबार में राजकीय चित्रकार के रूप में रख लिया। किसान को जब यह पता चला तो उसने बेटे से माफी माँगी कि वह अब तक नाहक ही उसकी कला को कोसता रहा।

सारः कोई कला बेकार नहीं जाती।

ये कहानी ‘इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंIndradhanushi Prerak Prasang (इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग)