एक राजा था। उसका पुत्र अपने पिता को मनुष्यता का आदर्श मानता था। एक बार उसके राज्य पर पड़ोसी राज्य की सेना ने चढ़ाई कर दी। राजा बीमार था तो उसने राजकुमार को सेना लेकर भेज दिया।
आक्रमणकारी बहुत शक्तिशाली था। कई दिनों तक युद्ध चला। राजकुमार के नेतृत्व में सेना आक्रमणकारी को खदेड़ने में सफल रही। लेकिन, इस जीत की राजकुमार को भारी कीमत चुकानी पड़ी। लड़ते हुए उसका एक हाथ और एक पैर कट गया। अपाहिज होने के बावजूद उसे इस बात की खुशी थी कि वह अपने राज्य को बचाने में सफल रहा। वह घर लौटना चाहता था।
लेकिन वह दया का पात्र बनकर नहीं रहना चाहता था। उसने अपने एक विश्वस्त दूत के हाथों राजा को एक संदेश भिजवाया, जिसमें लिखा था कि उसका एक सैनिक उसके प्राणों की रक्षा करते समय अपना एक हाथ और एक पैर गंवा बैठा है और वह उसे महल में लाकर अपने साथ रखना चाहता है। जब उसे राजा का उत्तर मिला तो वह हतप्रभ रह गया। राजा ने अपने संदेश में लिखा था कि वह अपने प्राणों को बचाने के बदले उसे मुंहमाँगा इनाम दे सकता है। ऐसे अपाहिज व्यक्ति को महल में लाकर रखना अपशकुन ही होगा। और वह तमाम जिंदगी हम पर एक बोझ की तरह ही रहेगा। राजकुमार की आंखों से भ्रम का पर्दा उठ चुका था। वह महल में न जाकर जंगल में चला गया और एक आश्रम में रहने लगा।
सारः मनुष्यता की परख संकट के समय ही होती है।
ये कहानी ‘इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं– Indradhanushi Prerak Prasang (इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग)
