एक बार राजा भोज अपने मित्र कवि माघ के साथ घूमने निकले। अपनी राजधानी धारा नगरी में घूमते हुए उन्हें किसी ने बताया कि अमुक मोहल्ले में कुछ मकानों को आग लग गई है। राजा और कवि माघ ने दिशा बदली और सीधे वहाँ पहुँच गए, जहां मकान आग से जल रहे थे। वे अभी पहुँचे ही थे कि एक मकान के एक कोने से दो बच्चों के रोने और सहायता की पुकार करने की करुण चीखें सुनाई दीं।
इससे पहले कि राजा कुछ सोचते और सहायता का प्रबंध करते, कवि माघ ने आव देखा न ताव, आग से जल रहे मकान में छलांग लगा दी। राजा यह सब देखकर चकित रह गए। बच्चों के साथ-साथ उन्हें कवि की चिंता भी सताने लगी। क्या करें, कुछ सूझ नहीं रहा था।
देखते ही देखते कवि माघ दो बच्चों को लपेटकर उठाए हुए बाहर आ गए। दोनों बच्चे पूरी तरह सुरक्षित बचे, जबकि कवि माघ बुरी तरह झुलस गए। महाराजा भोज ने कवि के सम्मुख नतमस्तक होकर कहा, तुम्हें मेरा नमन। मैं तो अब तक तुम्हें एक अच्छा कवि ही मानता रहा, आज पता चला कि तुम एक बहुत अच्छे इंसान भी हो। दया और करुणा की साक्षात मूर्ति। आज तुमने अपने इस कार्य से मुझे भी गौरवान्वित कर दिया है।
ये कहानी ‘इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं– Indradhanushi Prerak Prasang (इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग)
