हास-परिहास, ठिठोली, चुहलबाजी, छेड़छाड़, मौजमस्ती और मिलने-जुलने का प्रतीक लोकप्रिय पर्व है ‘होली। यह पर्व वास्तव में वैदिक यज्ञ है। वैदिक काल से ही होली का त्योहार भिन्न-भिन्न रूपों में मनाया जाता रहा है। वैदिक काल के लोग तमाम तरह के उत्सव मनाते, जिनमें से ज्यादातर का रिश्ता ऋतु परिवर्तन या प्रकृति के किसी स्वरूप से होता। इन्हीं उत्सवों में एक खास स्थान प्राप्त उत्सव था ‘बसंत पर्व। पौराणिक मान्यता के अनुसार, विधाता ने जब इस सृष्टि की रचना की तो उस समय प्राकृतिक वातावरण बेहद रमणीक तथा मोहक था। इसलिए उस मौसम को ही बसंत का नाम दे दिया गया और तभी से बसंत पर्व मनाया जाने लगा। कालांतर में बसंत के बाद नए अन्न का स्वागत करने के लिए यज्ञ के रूप में एक और उत्सव मनाया जाने लगा- ‘नवषस्येष्टि यज्ञ पर्व। यह उत्सव वसंत पर्व के चालीस दिन बाद मनाया जाता और इसे बसंत पर्व के ही एक अंश के रूप में स्वीकार किया जाता। उत्सव का जो मस्ती भरा वातावरण,बसंत पर्व पर बनता,वह ‘नवषस्येष्टि यज्ञ पर्व तक कायम रहता। यह नवषस्येष्टि यज्ञ पर्व ही होली का आदिम स्वरूप था। प्रारंभ से ही इसका आयोजन फाल्गुन की पूर्णिमा को किया जाता रहा है ।
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, ‘देवताओं का भाग उन्हें न देकर जो स्वयं उसका उपभोग करते हैं, वे वास्तव में चोर हैं। हमारी पौराणिक मान्यता भी यही रही है। प्रकृति से प्राप्त किसी भी नई वस्तु को पहले देवताओं को अर्पित किया जाता है और उसके बाद स्वयं उसका उपभोग करते हैं। फाल्गुन की पूर्णिमा तक खेतों में फसल पकने लगती है। इसलिए उसे देवताओं को अर्पित करना जरूरी है,ताकि बाद में जनसाधारण उसे उपयोग में ला सके।
इसी उद्देश्य से यह यज्ञ प्रारंभ हुआ। नए अनाज से यज्ञ करने के कारण ही इसका नाम ‘नवषस्येष्टि यज्ञ पर्व पड़ा। अनाज के अलावा यज्ञ में घृत और अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियां भी डाली जातीं तथा यह सब व्यर्थ नहीं था। इसके पीछे वैज्ञानिक दृष्टि थी। अनाज, घृत तथा जड़ी-बूटियों का सुगंधित धूम, यज्ञाग्नि से ऊपर उठकर वातावरण को शुद्ध करती और वायु को दूषित होने से बचाती थी। इसी के छोटे कण ऊपर जाकर बादलों से मिलते और वर्षा के साथ वापस नीचे धरा पर आ जाते। इससे वर्षा का जल भी ज्यादा उपयोगी और शक्तिवाली तत्वों से युक्त होता था व खाद्यान्न को भी यह अधिक उपयोगी पौष्टिक बनाता। देवताओं को भेंट करने के उपरांत उनके प्रसाद को ग्रहण करने की परम्परा भी हमारे यहां प्रारंभ से रही है।
कैसे पड़ा नाम होली
सो नए खाद्यान्न को यज्ञाग्नि में देवताओं को अर्पित करने के अलावा उसका कुछ भाग आधा-सा भूनकर लोग उसे स्वयं भी प्रसाद स्वरूप खाया करते थे। आधे भूने हुए अन्न को संस्कृत में ‘होलक कहते हैं। इससे नवषस्येष्टि का यज्ञ पर्व कालांतर में ‘होलिकोत्सव कहलाया जाने लगा। यही शब्द आगे चलकर केवल ‘होली’ रह गया।

डंडा गाडऩे का रिवाज
होलिका दहन के स्थान पर आजकल एक डंडा गाडऩे का रिवाज है। इसे कहीं पर प्रह्लाद का प्रतीक तथा कहीं होली का प्रतीक भी माना जाता है। मनीषियों की मान्यता है कि यह डंडा वास्तव में प्राचीन यज्ञ स्तंभ का ही अवशिष्ट प्रतीक है। भारत में प्राय: सर्वत्र होलिका पूजन की भी परम्परा है। होलिका दहन से पूर्व महिलाएं अक्षत कुमकुम से उसका पूजन करती हैं। यदि होली का रिश्ता, राक्षस हिरण्यकषिपु (हिरण्यकश्यप) की बहन होलिका से जुड़ें तो उसके पूजन का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता। वास्तव में यह पूजन प्राचीन यज्ञ वेदी का ही पूजन है, जिसके स्तंभ के प्रतीक स्वरूप बीच में डंडा गड़ा रहता है। इस प्रकार होलिका दहन भी वास्तव में प्राचीन यज्ञाग्नि का ही प्रतीक है, जिसमें ‘होलक (अधभुना अन्न) तैयार करके प्रसाद स्वरूप उसे हम ग्रहण करते हैं।
होली की पृष्ठभूमि के इस वास्तविक स्वरूप के बावजूद कालांतर में जब हिरण्यकश्यिप, प्रह्लाद और होलिका की घटनाएं इसके साथ आ जुड़ी, तो रोचक कथा तथा सरस भक्ति-भाव के कारण उसका यही स्वरूप उभरकर जनसाधारण में लोकप्रिय हो गया और नवषस्येष्टि यज्ञ वाला स्वरूप धीरे-धीरे धूमिल होता चला गया।
होली के दूसरे दिन जल क्रीड़ा
होली के दूसरे दिन जल क्रीड़ा और आमोद-प्रमोद वाला स्वरूप तो आगे चलकर इतना ज्यादा उभरा कि उत्सव का वही भाग प्रमुख हो गया और पहले वाला भाग गौण रह गया। जल क्रीड़ा और आमोद-प्रमोद का यह उत्सव भी प्रारंभ से ही नवषस्येष्टि यज्ञ से जुड़ा हुआ है। इस यज्ञ में नए अनाज की आहुति देकर अगले दिन आमोद-प्रमोद के लिए जल क्रीड़ा की जाती है तथा मनोरंजन के अन्य कार्यक्रम आयोजित किए जाते और इसके साथ ही पिछले चालीस दिन से चल रहा बसंत पर्व समाप्त हो जाता। बसंत से संबंधित होने के कारण इस उत्सव को ‘बसंतोत्सव या ‘सुबसंतक’ की भी संज्ञा दी जाती है। बसंत के साथ मस्ती तथा मादकता का गहन रिश्ता है।
पिचकारियों को ‘श्रंगक कहा जाता था
प्राचीन भारत में बसंतोत्सव या मदन महोत्सव पर जो जल क्रीड़ा होती, उसका उल्लेख तमाम प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में पढऩे को मिलता है। उस समय पिचकारियों को ‘श्रंगक कहा जाता था और उनका आकार सांप या कीप जैसा होता था। प्राय: टेसू के फूलों के रंग का पानी इन पिचकारियों से एक-दूसरे पर डाला जाता,जो न केवल सुगंधित और देखने में मनोहर ही होता, वरन् कीटाणुनाशक और स्वास्थ्य के लिए लाभकारी भी होता। चंदन, केसर, कुमकुम, गुलाबजल और केवड़े का प्रयोग भी बहुतायत से होता। इस दिन राजा तथा प्रजा सभी मिलकर एक-दूसरे पर रंग डालते।समस्त वातावरण रंगमय, प्रेममय और सुगंधित हो जाता। ‘रघुवंश में कालिदास ने लिखा है कि इस मौके पर संपन्न जन सोने की पिचकारियों से रंग की फुहारें छोड़ते हैं। केशों से कुमकुम मिली लाल बूंदें टपकती रहती हैं।
संस्कृत के एक अन्य ग्रंथ ‘कुमार पाल चरित में जन साधारण वर्णन करते हुए लिखा गया, ‘कोई पिचकारी का प्रयोग करता, कोई मुख में ही जल भरकर अभिन्न प्रियजनों पर छोड़ता। कोलाहल और संगीत से वातावरण मुखरित हो उठता। संस्कृत के विख्यात लेखक सोमेश्वर ने अपने ग्रंथ ‘मानसोल्लास में उत्सव का विवरण इस प्रकार दिया, ‘भोजन के बाद राजा, राजकुमार तथा मंत्रियों के साथ दोपहर के बाद एक मंडप में बैठता था। अतिथि भी आते थे। इसके बाद श्रृंगार मूर्ति नर्तकियां श्वेत वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए, नूपुरों से मन की गति तीव्र करती हुई वहां आतीं। जल में श्रीखंड, कपूर, सुगंध आदि का मिश्रण रहता। राजा पर वह जल डाला जाता। इसके बाद राजा भी कुमकुम, चंदन और हल्दी मिला जल सेवकों पर छोड़ता तथा पुष्प बिखेर कर सम्मानित करता।
प्रह्लाद की कहानी जुड़ी
आगे चलकर इस बसंतोत्सव के साथ जब हिरण्यकषिपु की बहन होलिका द्वारा भक्त प्रह्लाद को अग्नि में जलाने के असफल प्रयत्न की कहानी जुड़ी तथा इस उत्सव को होलिकोत्सव कहा जाने लगा तो ‘ढूंढ़ा नामक एक और राक्षसी की चर्चा इसके साथ जुड़ गई। ‘भविष्योत्तर पुराण में इस राक्षसी तृप्त करने के लिए लोगों से यह अपेक्षा की गई कि इस दिन निर्भीक और नि:शंक होकर हास्य विनोद में एक-दुसरे को गाली दें, हो-हल्ला करें और अपने शरीर पर भस्म लगाकर इधर-उधर उछलकूद करें। भविष्योत्तर पुराण के अनुसार, इस प्रकार की पिशाच क्रिया करने से राक्षसी का डर समाप्त हो जाता है। संभव है उस समय पर इस प्रकार की कोई राक्षसी रही हो, जिससे लोग बेहद आतंकित हों। इसलिए उस ओर से जनता की दृष्टि हटाने के लिए ही यह व्यवस्था की गई हो।
इससे भी ज्यादा संभावना यह प्रतीत होती है कि मनुष्य के अंदर छुपे हुए राक्षस और उसकी उद्दाम भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए होली का दिन निर्धारित कर दिया गया, ताकि शेष दिन वह नियंत्रित तथा संयमित रह सके। इस उच्छंखल व्यवहार को स्वीकृति के बावजूद उसे हास्य विनोद के रूप में ही स्वीकार किया गया, इस रूप में नहीं कि उससे समाज में आपसी झगड़े तथा कलह हों। होली का मूल स्वरूप आपसी प्रेम, मस्ती और हास-विलास का है और उसका यह रूप प्रारंभ से लेकर अब तक ज्यों का त्यों रहा है। अंतर्कथा के साथ जुड़े पात्रों में हुए हेरफेर ने इस स्वरूप को कभी कोई क्षति नहीं पहुंचाई। बाहर से आए लोगों को भी इसने प्रभावित किया और इस देश की परम्पराओं को आत्मसात करने के लिए प्रेरित किया। राजा, रंक, अमीर, गरीब और छोटे-बड़े के भेदभाव को भी इस त्योहार ने, भले ही एक दिन के लिए सही, निर्मूल करने का मंत्र दिया।
मुगल काल की होली
मुगल बादशाहों ने भी इस त्योहार को बड़ी खुशी से अपनाया। सम्राट अकबर के शासनकाल में तो एक माह पहले से ही इसकी तैयारी प्रारंभ हो जाती थी। सम्राट अकबर बिना किसी जातिगत भेदभाव के अपने सभी राजाओं और सामंतों को होली का निमंत्रण देते तथा निश्चित दिन उन सबके साथ प्रेम से होली खेलते। देशी रियासतों में राजा, महाराजा अपनी जनता के साथ जो प्रेमपूर्वक होली खेलते, उसकी स्मृति तो अब तक अनेक लोगों को अब तक आनंद सागर में डुबकी लगवा देती है। हमारे यहां होली खेलने की प्रणाली अनेक प्रकार की है। कहीं रंग से होली खेली जाती है ओर कहीं गुलाल से। कहीं पत्थर मार होली होती है और कहीं लमार। कहीं हास-परिहास के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, तो कहीं गायन और वादन के। होली का आयोजन हम किसी भी तरह करें, यह ध्यान रखना जरूरी है कि वह दूसरे की इच्छा के विरुद्ध और उसे शारीरिक या मानसिक पीड़ा पहुंचाने वाला न हो। इस मौके पर आपस में रूठे हुए व्यक्तियों को मिलाने का प्रयत्न करना चाहिए, मिले हुए लोगों को जुदा करने का नहीं। यदि होली पर ऐसी कोई घटना घटती है जो समाज के सदस्यों में आपसी झगड़े तथा मतभेद पैदा करे, तो निश्चित ही वह घटना हमारे इस सदियों पुराने पवित्र उत्सव पर कलंक है।
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