व्यंग्य
गृहलक्ष्मी फरवरी २०१६
आजकल ‘टेंशन मत लोÓ जैसा छोटा सा वाक्य एक अच्छा-खासा लोकप्रिय जुमला बन चुका है। मगर, इस जुमले को लेकर भी लोगों में काफी टेंशन है। दिन भर में सैकड़ों बार यह बात कही-सुनी जाती है। घर में रहो तो पूरा घर यही सलाह देता है कि ‘टेंशन मत लो।Ó घर से बाहर निकलो तो यार-दोस्त भी बात-बात पर टेंशन न लेने की सलाह देते हैं। बाजार जाओ तो दुकानदार टेंशन न लेने की सलाह देकर अपने माल को चोखा बताते हुए माल बेचता नजर आता है। बीमार पडऩे पर झोला छाप डॉक्टर से लेकर देशी-विदेशी पद्धति के सभी डॉक्टर मरीज को टेंशन न लेने की सलाह पहले देते हैं और दवा बाद में। ये और बात है कि फीस के नाम पर मरीज को सबसे ज्यादा टेंशन देने वाले वही होते हैं। क्रिकेट के खेल में न चाहते हुए भी आखिरी के दो-चार ओव्हरों में टेंशन हो ही जाता है, जबकि कॉमेन्ट्रेटर द्वारा बार-बार यही कहा जाता है कि दर्शक गण कृपया ‘टेंशन न लें।Ó
अब तो बच्चे-बच्चे की जुबान पर है कि टेंशन मत ले। जितना टेंशन से टेशन नहीं होता उससे ज्यादा टेंशन यह सुन कर हो जाता है।
एक दिन तो हद हो गई जब एक भिखारी ने हमें टेंशन न लेने की सलाह दे डाली। हुआ यह कि मंदिर से बाहर निकलते ही उससे हमारा आमना-सामना हो गया। हमने उससे कहा भी कि ‘हमारे पास छुट्टे पैसे नहीं हैं।Ó सुनकर भिखारी झट से बोल पड़ा, ‘टेंशन नहीं लेने का, अपुन के पास छुट्टा है न।Ó देखते ही देखते उसने एक रुपये की खातिर सौ रुपये का छुट्टा कर दिया। यह देख मुझे टेंशन हो गया और मैंने टेंशन में दस रुपये का नोट उसके हाथ पर रख दिया। मेरी हालत देख वह जाते-जाते एक बार फिर कह गया, ‘टेंशन नहीं लेने का।Ó
हमारे एक मित्र हैं। सुबह-सुबह कहीं जाने की तैयारी कर रहे थे। दिमाग उनका टेंशन में था, ऊपर से उनकी पत्नी ने घर से निकलते ही उन्हें घर की टेंशन न लेने की नसीहत दे डाली। नसीहत सुनते ही मित्र महाशय भरपूर टेंशन में आ गए और पत्नी पर बरसते हुए बोले, ‘घर के मुखिया हम हैं लिहाजा टेंशन लेना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है। हम टेंशन नहीं लेंगे तो भला कौन टेंशन लेगा। जिम्मेदारी भी कोई चीज होती है। जहां जिम्मेदारी है वहां टेंशन तो होता ही है।Ó इतना कह कर उन्होंने बाइक पर बैठते ही जोरदार ‘किकÓ लगाया। चार-चार किक में स्टार्ट न होने वाली बाइक एक ही किक में स्टार्ट हो गई और वह टेंशन में ही घर से निकल पड़े।
थोड़ी ही देर बाद वह मुख्य मार्ग पर अपनी रफ्तार से चले जा रहे थे कि सड़क पर घूम रहे दो सांड अचानक किसी बात पर टेंशन में आकर आपस में पिल पड़े। मित्र महोदय को संभलने का मौका नहीं मिला। बेचारे दो सांड़ों की लड़ाई के बीच आ फंसे। फलस्वरूप, ये ईश्वर और बाइक उधर। पल भर में सारा गुस्सा काफूर हो गया। बेचारे दर्द के मारे कराह उठे। एक राहगीर ने हमदर्दी जताई, ‘जाने दो भाई साहब, जो होना था हो गया। अब टेंशन मत लो। आराम से घर जाओ। घर जाकर ही घर वालों को बताना। यहां मोबाइल पर बताओगे तो पूरा घर टेंशन में जाएगा।Ó यह कह कर राहगीर महाशय मुफ्त की सलाह देकर चलते बने। अब मित्र महोदय को टेंशन ही टेंशन! क्या करें, क्या न करें? बेचारे, सड़क पर ही सिर पकड़ कर बैठ गए। कुछ देर बाद किसी परिचित ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया और घरवालों को खबर की। खबर पाते ही सारा घर टेंशन में आ गया। जल्दी ही यह खबर रिश्तेदारों और परिचितों में फैल गई।
परिचित अस्पताल में हाल-चाल पूछने के लिए आने लगे। कुछ समझदार मित्रों ने समझदारी दिखाई और अपना टेंशन दूर करने के लिए घर बैठे ही मोबाइल से उनके हाल-चाल की जानकारी लेना शुरू कर दी। बातचीत के बाद हर कोई उन्हें टेंशन न लेने की सलाह जरूर देता। मित्र महोदय मुस्कराकर बस इतना ही कहते- ‘यार टेंशन तो मैं लेता नहीं। हां, इतनी टेंशन जरूर है कि अब मैं बिस्तर से कब उठूंगा, कब चल-फिर सकूंगा?Ó रात के बारह-एक बजे तक मोबाइल पर हाल-चाल की टेंशन चलती रही।
दूसरे दिन ऑफिस से बॉस महोदय जी का भी आना हुआ। थोड़ी देर तक तो बॉस महोदय, गंभीर मुद्रा में खड़े रहे और घरवालों से दुर्घटना की पूरी जानकारी लेते रहे। उनके सामने टेंशन यह था कि इस टेंशन के मौके पर आखिर वो क्या कहें, कैसे कहें? फिर भी जाते-जाते उनके मुखारबिंदु से यह बोल निकल ही पड़े, ‘देखो टेंशन बिल्कुल मत लेना। हां, दवा वगैरह समय से लेते रहना।Ó बेचारे हमारे मित्र महोदय, ‘यस सरÓ के सिवाय कुछ नहीं कह सके। हालांकि वो बहुत कुछ कहना चाहते थे। मगर, जब मुसीबत और बॉस दोनो ही सामने हों तो भला कौन टेंशन नहीं लेगा? द्य
घर से निकलो तो यार-दोस्त टेंशन न लेने की सलाह देते हैं। बाजार जाओ तो दुकानदार टेंशन न लेने की सलाह देकर माल बेचता है। बीमार पडऩे पर सभी पद्धति के डॉक्टर टेंशन न लेने की सलाह पहले देते हैं, दवा बाद में।
