प्रीक्लैंपसिया
यह क्या है? यह अक्सर गर्भावस्था में 20 वें सप्ताह के बाद होता है इसमें रक्तचाप काफी ऊँचा हो जाता है, जरूरत से ज्यादा सूजन हो जाती है व यूरीन में प्रोटीन आने लगता है।
आप जानना चाहेंगी-
सही देखभाल से प्रीक्लैंपसिया का इलाज हो सकता है। गर्भवती का रक्तचाप भी सामान्य स्तर का बना रहता है। यदि इलाज न हो तो स्थिति और भी गंभीर हो सकती है। इसकी वजह से गर्भावस्था की अन्य जटिलताएं भी सामने आ सकती हैं।
यह कितना सामान्य है? तकरीबन 8 प्रतिशत महिलाएँ इससे ग्रस्त होती हैं। 40 वर्ष से ऊपर की महिलाएँ, मल्टीपल शिशुओं की माँ व मधुमेह या रक्तचाप के रोग से ग्रस्त महिला को प्रीक्लैंपसिया का खतरा ज्यादा होता है। यदि आपको पहले भी गर्भावस्था में ऐसा हो चुका हो तो इस गर्भावस्था में होने की संभावना भी बढ़ जाती है।
इसके संकेत व लक्षण क्या हैं? इसमें निम्नलिखित लक्षण शामिल हो सकते हैं‒
- हाथों व पैरों में गंभीर सूजन
- टखनों की सूजन, जो 12 घंटे आराम के बाद भी न जाए।
- अचानक वजन बढ़ना
- सिर दर्द, जो दर्द निवारक दवा से ठीक न हो।
- पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द
- नजर धुंधलाना
- रक्तचाप बढ़ना
- मूत्र में प्रोटीन
- दिल की धड़कन तेज होना
- मूत्र में दुर्गंध
- किडनी के कार्य में अनियमितता
- रिलैक्स रिएक्शन में वृद्धि
आप व आपका डॉक्टर क्या कर सकते हैं शुरूआती दौर में बढ़िया मेडिकल देखभाल जरूरी है। यदि पहले से इस रोग की हिस्ट्री रही है, तो आपको और भी सावधान रहना होगा। आपको बैडरेस्ट लेना होगा व घर में रक्तचाप की जांच करनी होगी। यदि हालत ज्यादा खराब हो तो पता लगने के तीन दिन के भीतर डिलीवरी करनी पड़ती है। हालांकि
प्रीक्लैंपसिया के कारण
- कोई जेनेटिक संबंध, अनुवांशिक कारणों से भी प्रीक्लैंपसिया हो सकता है।
- रक्तनलिका में विकृति! इस वजह से भी कुछ महिलाओं को प्रीक्लैंपसिया हो जाता है।
- यदि गर्भवती महिला को मसूड़ों के रोग हों तो उनके संक्रमण की वजह से भी प्रीक्लैंपसिया हो सकता है। हालांकि इसे पक्के सबूत के तौर पर नहीं कह सकते।
- कई बार माँ का शरीर शिशु व प्लेसेंटा के लिए एलर्निक हो जाता है। इस वजह से माँ के शरीर में प्रतिक्रिया होती है। इसकी रक्त नलिकाओं को नुकसान पहुँचता है।
- कुछ समय के लिए दवा तो दी जा सकती है लेकिन इसका आखिरी इलाज डिलीवरी ही है। शिशु के शारीरिक रूप से परिपक्व होते ही डिलीवरी की सलाह दी जाती है।डिलीवरी के बाद 97 प्रतिशत महिलाओं का रक्तचाप सामान्य हो जाता है।
- कई वैज्ञानिक व अध्ययनकर्ता मूत्र व रक्त की जांच के ऐसे प्रयोग कर रहे हैं, जिनसे पहले ही रोग का अंदाजा हो सके। इस तरह प्रीक्लैंपसिया के इलाज में और भी आसानी होगी।
क्या इससे बचाव हो सकता है? अध्ययन से पता चलता है कि इस मामले में एंटीक्लॉटिंग दवाओं से फर्क पड़ सकता है। इसके अलावा भरपूर मात्रा में पोषण लिया जाए, जिसमें एंटीऑक्सीडेंट, मैग्नीशियम, विटामिन व खनिज आदि शामिल हों। दांतों से जुड़ी देखभाल भी इसमें शामिल है।
हेल्लप सिंड्रोम
यह क्या है? यह अवस्था व्यक्तिगत रूप से या प्रीक्लैंपसिया के साथ मिल कर, आखिरी तिमाही में पैदा हो सकती है। इसमें लाल रक्त कणों की मात्रा घटती है तथा लीवर के एंजाइम बढ़ जाते हैं। रक्त में थक्के नहीं बन पाते और लीवर की कार्यक्षमता पर भी बुरा असर पड़ता है। इस सिंड्रोम से माँ व शिशु, दोनों की जान को खतरा हो सकता है। यदि सही समय पर इलाज न हो तो गंभीर जटिलताएँ पैदा हो सकती हैं। लीवर भी नष्ट हो सकता है।
यह कितना सामान्य है? यह प्रीक्लैंपसिया के साथ 10 में से 1 मामले व आम गर्भावस्था के 500 मामलों में से 1 मामले में होता है।
इसके संकेत व लक्षण क्या हैं? तीसरी तिमाही में इसके निम्नलिखित लक्षण हो सकते हैं‒
- जी मिचलाना
- उल्टी आना
- सिर दर्द
- पेट में ऊपरी दाएँ हिस्से में दर्द
वायरल जैसे संक्रमण के लक्षण रक्त की जांच में रक्त कणों की कमी का पता चलता है। इस अवस्था में लीवर तेजी से नष्ट होता है इसलिए इलाज में देरी नहीं करनी चाहिए।
आप व आपके डॉक्टर क्या कर सकते हैं? सबसे सही इलाज है, शिशु की डिलीवरी।लक्षणों का अंदाजा होते ही डॉक्टर से मिलें।आपको इलाज में स्टीरॉयड व मैग्नीशियम सल्फेट दिया जाएगा।
क्या इससे बचाव हो सकता है? यदि पहले भी यह हो चुका हो तो मेडिकल देखरेख बहुत जरूरी हो जाती है। बदकिस्मती से इस अवस्था से बचाव का कोई उपाय नहीं है।
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