Jataka Story in Hindi : बहुत समय पहले की बात है। किसी राज्य में बिजेंद्र नामक भला राजा शासन करता था। उसके राज में प्रजा बड़ी सुखी थी। प्रजा भी अपने राजा को पूरा मान देती।
राजा के पास किसी चीज की कमी न थी किंतु वह निःसंतान था। वह हमेशा इसी चिंता में रहता-‘‘मेरे बाद इस राज्य की देखभाल कौन करेगा?’’
एक दिन उसने अपनी चिंता राजपुरोहित के सामने रखी।
उन्होंने सुझाव दिया कि राजा को यज्ञ करना चाहिए ताकि देवता प्रसन्न हो जाएँ। यज्ञ करने के बाद राजा ने निर्धनों को दान दिया, पुरोहितों को दक्षिणा दी व सबसे आशीर्वाद लिया।

तभी आकाश से एक दिव्य वाणी सुनाई दी- ‘‘हे राजा! तुम्हारे भाग्य में अपनी संतान का सुख नहीं लिखा। इसलिए तुम किसी अच्छे स्वभाव वाले युवक को गोद ले लो। उसे ही अपना पुत्र मानो।’’
तब ऐसे ही युवक की तलाश आरंभ हुई। राजा बिजेंद्र ऐसे युवक को गोद लेना चाहते थे जो प्रजा के दुख-दर्द को पहचान कर, उसे दूर करने का प्रयास करे।
कई महीने बीत गए पर राजपुरोहित व मंत्री उपयुक्त नवयुवक को नहीं खोज सके।

एक दिन उदास व चिंतित राजा अपने कमरे की खिड़की से बाहर झाँक रहा था। अचानक उसे फटे-पुराने कपड़ों में एक नवयुवक दिखा, जो पत्तल पर चावल खा रहा था। तभी वहाँ एक भिखारी आ पहुँचा व भोजन माँगने लगा। उस नवयुवक ने एक भी पल सोचे बिना, चावल की पत्तल भिखारी को दे दी। यह देख राजा ने स्वयं से कहा-‘‘यही वह व्यक्ति है, जिसे मैं जाने कब से तलाश रहा था।’’

वे झट से नीचे उतरे तथा उस युवक को महल में ले आए। उन्होंने युवक को शाही गद्दी पर बैठने को कहा किंतु वह फर्श पर ही बैठ गया। राजा उसके विनय से प्रभावित थे।
उन्होंने पूछा-‘‘तुम कौन हो? मैं तुम्हें गोद लेना चाहता हूँ। मेरे पुत्र बनोगे?’’
‘‘महाराज! मैं आपका पुत्र बन सकता हूँ किंतु कृपया क्षमा करें, मैं आपका राज्य नहीं स्वीकार सकता। मैं तो अपने भोजन तक का ध्यान नहीं रखता। आपके राज्य का क्या करूँगा। मैं तो बस यही चाहता हूँ कि मेरे आसपास के लोग खुश रहें।’’ नवयुवक ने विनम्रता से कहा।

राजा बिजेंद्र उसका उत्तर सुन कर बेहद प्रसन्न हुए। नवयुवक की आँखें बुद्धिमता व स्नेह से छलक रही थी। उन्होंने उसे गले से लगा कर कहा। ‘‘आज से तुम मेरे दत्तक पुत्र हो, मैं काफी लंबे समय से तुम जैसे व्यक्ति की तलाश में था।’’
कुछ समय बाद राजा ने अपने राज्य का सारा भार दत्तक पुत्र को सौंप दिया और फिर तपस्या करने के लिए हिमालय की ओर चल दिए।
शिक्षा:- सच्ची खुशी त्याग में ही छिपी है।

