बहुत सी नारियों का मानना है कि अगर सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष अनाड़ी जी को बनाया जाए, तो आज की नई पीढ़ी को भटकने से रोका जा सकता है। इस पर आप क्या कहते हैं?
– गीता ढाका, गुरुग्राम (हरियाणा)
माफ करना गीता,
सैंसर बोर्ड है एक फजीता।
हम क्यों अपनी मिट्टी कुटवाएंगे,
निमाता-निर्देशकों से सिर फुटवाएंगे,
जब आपने नई पीढ़ी के हाथों में
स्वयं मोबाइल थमाया है,
अब उनके पास थोक में
अनसैंसर्ड सरमाया है।
लेकिन इंटरनेट के मायावी इंद्रजाल में
निन्यानवै प्रतिशत बालक उलझे नहीं हैं,
उल्टे आपके प्रश्न अभी सुलझे नहीं हैं।
मुझसे कोई रोक मत लगवाइए,
बच्चों से बात करके अपना ज्ञान बढ़ाइए।
अनाड़ी जी! कहते हैं, लाडी, हांडी, बाड़ी और गाड़ी, भाग्यशाली को ही मिलती हैं, ऐसा क्यों?
– अंकिता शर्मा, हुगली
लाडी, हांडी, बाड़ी और गाड़ी,
इन चारों से सम्पन्न है अनाड़ी।
इसका मतलब कि
सारे अनाड़ी भाग्यशाली होते हैं,
न सुख में बहुत प्रसन्न
न दुख में अधिक रोते हैं।
अपने दुश्मन को भी समझते हैं याड़ी,
इतिहास गवाह है कि
अनाडिय़ों ने कभी किसी की
किस्मत नहीं बिगाड़ी।
लेकिन जो पल-पल रहते हैं
गुंताड़ी या जुगाड़ी,
भाग्य को दोष देते हुए
हर वक़्त देखते हैं अगाड़ी-पिछाड़ी,
झूठ के झंझटों की झाड़ी में फंस कर
रुक जाती है उनकी ऊंटगाड़ी,
चित्त की चिंताओं के कारण
तेज़ चला करती है उनकी नाड़ी।
घर-परिवार में कोई दुविधा आ खड़ी हो तो अनाड़ी जी किसकी बात सुननी चाहिए, दिल की या दिमाग की?
– तन्वी कौशिक रुद्राक्ष, बीकानेर
घर-परिवार में दुविधा हो तो
सबसे पहले करिए
अनावश्यक तनाव का त्याग,
फिर याद रखिए कि
दिमाग में एक दिल होता है
और दिल में एक दिमाग।
दोनों का सहयोग लेकर
आत्मीयता से सोचिए,
क्रोध के नाखूनों से
संबंधों को मत खंरोंचिए।
आप अगर जागरूक और जि़म्मेदार हैं,
तो आपको क्या समझाऊं
आप स्वयं समझदार हैं।
आदमी सभ्य हुआ तो कपड़े पहनना सीखा, अब असभ्यता की ओर क्यों जाने लगा है?
– कैलाशी शर्मा, पश्चिम बंगाल
सभ्यताएं तो सदा बदलती हैं
हां, संस्कृतियां कभी खुश होती हैं
कभी हाथ मलती हैं।
हर परिवर्तन पर आदमी
ज़रूरत से ज़्यादा चीख लिया है,
पहले आदमी कपड़े पहनता था
क्या हुआ जो अब कपड़ों ने
आदमी को पहनना सीख लिया है।
वस्त्ता अंदर रहते हैं
आदमी उनके बाहर है।
नारी सिंहनी है और नर नाहर है।
अनाड़ीजी, तांबे की थाली में खाना सही है या स्टील की थाली में?
सारिका वोहरा, मंडी (हि.प्र.)
अब न तो तांबे की कोई शान है
न स्टील में कोई जान है,
थाली वही अच्छी
जिसे मांजना आसान है।
खाने वाले को तो भरपेट चाहिए,
और आधुनिक नारियों को
थाली नहीं प्लेट चाहिए,
क्योंकि उनके डिशवाशर को
थाली नहीं सुहाती है,
प्लेट में झकास चमक आती है।
अनाड़ीजी, यदि आपका अगला जन्म नारी का हुआ तो क्या होगा?
– दमयंती जगदाले, उज्जैन
मातृत्व पर भरपूर गर्व करेंगे
परिवार को एक पुत्री और एक पुत्तर देंगे,
अभी नारियों के प्रश्नों के उत्तर देते हैं
फिर पुरुषों के प्रश्नों के उत्तर देंगे।
जब से बाहुबली फिल्म आई है, पति स्वयं को बाहुबली समझने लगे हैं। पत्नियां स्वयं को क्या समझें?
कविता जैन, नई दिल्ली
मैं कोई सलाह नहीं दे सकता
क्योंकि वे तो पहले से ही
अपने बाहुबली के सामने
स्वयं को अनारकली समझती हैं।
कैसी भी नारी-मुक्ति वाली हों
बड़े सलीके से सजती हैं।
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