Posted inहिंदी कहानियाँ

घर में सार्थक बदलाव – गृहलक्ष्मी कहानियां

जीवन की आपाधापी में सीमा भूल सी गई थी खुद को। सुबह से कब शाम होती ,शाम से कब रात ,अपनी तमाम व्यस्तताओं में उसको पता ही न चलता , लेकिन जब घर में वो सुनतीं कि तुम्हें काम ही क्या है दिन भर घर में ही तो पड़ी रहती हो , इतना सुनते ही वह परेशान हो जाती और अपनी उपेक्षा से भीतर ही भीतर आहत हो जाती , बार-बार उसके मन में ख्याल आता कि वह भी बाहर जाकर नौकरी करना शुरू कर दे परन्तु घर की परिस्थितियों और जिम्मेदारियों ने उसके पैरों में बेड़ियां डाल रखी थी।

Gift this article