Gaban novel by Munshi Premchand: चैत्र की शीतल, सुहावनी, स्फूर्तिमयी संध्या, गंगा का तट, टेसुओं से लहलहाता हुआ ढाक का मैदान, बरगद का छायादार वृक्ष, उसके नीचे बंधी हुई गाएं, भैंसें, कद्दू और लौकी की बेलों से लहराती हुई झोंपड़ियां, न कहीं गर्द न गुबार, न शोर न गुल, सुख और शांति के लिए क्या […]
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ग़बन – मुंशी प्रेमचंद भाग-38
Gaban novel by Munshi Premchand: उसी बंगले में ठीक दस बजे मुक़द्दमा पेश हुआ। सावन की झड़ी लगी हुई थी। कलकत्ता दलदल हो रहा था, लेकिन दर्शकों का एक अपार समूह सामने मैदान में खड़ा था। महिलाओं में दिनेश की पत्नी और माता भी आई हुई थीं। पेशी से दस-पंद्रह मिनट पहले जालपा और ज़ोहरा […]
ग़बन – मुंशी प्रेमचंद भाग-37
Gaban novel by Munshi Premchand: दारोग़ा को भला कहां चैन? रमा के जाने के बाद एक घंटे तक उसका इंतज़ार करते रहे, फिर घोड़े पर सवार हुए और देवीदीन के घर जा पहुंचे । वहां मालूम हुआ कि रमा को यहां से गए आधा घंटे से ऊपर हो गया। फिर थाने लौटे। वहां रमा का […]
ग़बन – मुंशी प्रेमचंद भाग-36
Gaban novel by Munshi Premchand: सारे दिन रमा उद्वेग के जंगलों में भटकता रहा। कभी निराशा की अंधकारमय घाटियां सामने आ जातीं, कभी आशा की लहराती हुई हरियाली । ज़ोहरा गई भी होगी ? यहां से तो बड़े लंबे-चौड़े वादे करके गई थी। उसे क्या ग़रज़ है? आकर कह देगी, मुलाकात ही नहीं हुई। कहीं […]
ग़बन – मुंशी प्रेमचंद भाग-35
Gaban novel by Munshi Premchand: एक महीना और निकल गया। मुक़द्दमे के हाईकोर्ट में पेश होने की तिथि नियत हो गई है। रमा के स्वभाव में फिर वही पहले की-सी भीरूता और ख़ुशामद आ गई है। अफसरों के इशारे पर नाचता है। शराब की मात्रा पहले से बढ़ गई है, विलासिता ने मानो पंजे में […]
ग़बन – मुंशी प्रेमचंद भाग-34
Gaban novel by Munshi Premchand: रमा मोटर पर चला, तो उसे कुछ सूझता न था, कुछ समझ में न आता था, कहां जा रहा है। जाने हुए रास्ते उसके लिए अनजाने हो गए थे। उसे जालपा पर क्रोध न था, ज़रा भी नहीं। जग्गो पर भी उसे क्रोध न था। क्रोध था अपनी दुर्बलता पर, […]
ग़बन – मुंशी प्रेमचंद भाग-33
Gaban novel by Munshi Premchand: एक महीना गुज़र गया। जालपा कई दिन तक बहुत विकल रही। कई बार उन्माद – सा हुआ कि अभी सारी कथा किसी पत्र में छपवा दूं, सारी कलई खोल दूं, सारे हवाई किले ढा दूं। पर यह सभी उद्वेग शांत हो गए। आत्मा की गहराइयों में छिपी हुई कोई शक्ति […]
ग़बन – मुंशी प्रेमचंद भाग-32
Gaban novel by Munshi Premchand: ठीक दस बजे जालपा और देवीदीन कचहरी पहुंच गए। दर्शकों की काफ़ी भीड़ थी। ऊपर की गैलरी दर्शकों से भरी हुई थी। कितने ही आदमी बरामदों में और सामने के मैदान में खड़े थे। जालपा ऊपर गैलरी में जा बैठी । देवीदीन बरामदे में खड़ा हो गया। ग़बन नॉवेल भाग […]
ग़बन – मुंशी प्रेमचंद भाग-31
Gaban novel by Munshi Premchand: रतन पत्रों में जालपा को तो ढाढ़स देती रहती थी पर अपने विषय में कुछ न लिखती थी। जो आप ही व्यथित हो रही हो, उसे अपनी व्यथाओं की कथा क्या सुनाती! वही रतन जिसने रुपयों की कभी कोई हकीक़त न समझी, इस एक ही महीने में रोटियों को भी […]
ग़बन – मुंशी प्रेमचंद भाग-30
Gaban novel by Munshi Premchand: वियोगियों के मिलन की रात बटोहियों के पड़ाव की रात है, जो बातों में कट जाती है। रमा और जालपा,दोनों ही को अपनी छः महीने की कथा कहनी थी। रमा ने अपना गौरव बढ़ाने के लिए अपने कष्टों को ख़ूब बढ़ा-चढ़ाकर बयान किया। जालपा ने अपनी कथा में कष्टों की […]
