जिम्मेदारियों ने कब शैली की जिंदगी को बर्फ सा बेजान बना दिया, उसे पता ही नहीं चला। लेकिन अचानक उसकी जिंदगी का मौसम बदला और मन पर जमी बर्फ की परतें पिघलने लगी।
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जब पहियों ने मचाया शोर: ईसप की मनोरंजक कहानियाँ
एक बार एक आदमी बैलगाड़ी में बहुत सारा सामान लादकर ले जा रहा था। जब-जब उसकी बैलगाड़ी के पहिए किसी गड्ढे या दलदल में फँसते, तो वे बड़े जोर की आवाज करने लगते। गाड़ीवान बड़ी देर से यह देख रहा था।आखिर उससे रहा न गया। उसने उन पहियों को फटकारते हुए कहा, “अरे, तुम इतनी […]
कब तक? – गृहलक्ष्मी लघुकथा
उसकी सूनी नज़रें कोने में लगे जाले पर टिकी हुई थीं। तभी एक कीट उस जाले की ओर बढ़ता नज़र आया। वह ध्यान से उसे घूरे जा रही थी।
जादुई चिराग – गृहलक्ष्मी लघुकथा
पिछले कई वर्षो से रत्ना और राजेश की तू-तू, मैं-मैं पर अचानक विराम लग गया आये दिन विवाद, राजेश को रत्ना से कुछ न कुछ शिकायत रहती ही थी जिनकी परस्पर आंख-आंख नही बनती वे अब हाथो में हाथ डाले घूमते नजर आ रहे थे।
लॉटरी – गृहलक्ष्मी प्रेमचंद कहानियां
जल्दी से मालदार हो जाने की हवस किसे नहीं होती? उन दिनों जब लॉटरी के टिकट आए तो मेरे दोस्त विक्रम के पिता, चचा, अम्मा और भाई, सभी ने एक-एक टिकट ख़रीद लिया। कौन जाने किसकी तकदीर ज़ोर करे? किसी के नाम आए रुपया, रहेगा तो घर में ही।
मझे कुछ कहना है…(पहला कविसम्मेलन)
कला आत्मा का आनंद होती है I चाहे उससे आर्थिक संतुष्टि न हो, लेकिन आत्मा को सुकून ज़रुर देती है I”
मुझे कुछ कहना है… मेरी पहली माहवारी
हर लड़की के जीवन में ये समय एक न एक दिन ज़रूर आता है जब उसका मासिक चक्र या मासिक धर्म जैसी क्रिया से सामना होता है
मजदूर दिवस – गृहलक्ष्मी लघुकथा
लॉकडाउन में फैक्ट्री बंद तो थी ही। परिवार के सभी लोग घर में साथ बैठते तो थे किन्तु चिंता की लकीरें सबके चेहरे पर होती थीं, फैक्ट्री नुकसान में जो जा रही थी।
बूढ़ा बच्चा – गृहलक्ष्मी लघुकथा
पुत्र की पुत्रवधु ने बीमार पड़े दादा जी को दूध में ओट्स बनाकर दिया। उन्होंने ओट्स के पूरे कटोरे को खाली कर दिया, तो बहू ने बिस्तर के पास दीवार में ठुकी कील पर लटकते हैंड-टावल से उनका मुंह पोंछा। फिर बोली, ‘दादा जी… अब लेट जाओ… आपका दोपहर का भोजन हो गया है।’
समझौता – गृहलक्ष्मी लघुकथा
पड़ोसी चन्दा के आँगन में खेल रहे बच्चों के शोर को देख उसके चेहरे पर कई दिनों बाद हल्की सी मुस्कुराहट आई और बच्चों को अपने बरामदे से बैठे – बैठे निहारने लगी। कुछ समय पहले की ही बात है जब इन्हीं बच्चों के साथ उसका जग्गू भी खेलता था।
