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अंतिम संस्कार – गृहलक्ष्मी कहानियां

सुबह के छह बज रहे थे। सारी रात कुर्सी पर बैठे बैठे हो गयी थी।सुषमा को बार-बार नींद के झोंके आ रहे थे।

यह समीर भी जाने कहां रह गया ।वैसे छह बजते न बजते वो आ ही जाता था । शायद क्रॉसिंग पर फंस गया हो। दो दिन पहले जब अम्मा जी का टेस्ट कराया था ,तब यह उम्मीद नहीं थी ,कि बात इतनी सीरियस हो जाएगी ।माना की अम्मा जी अस्सी से ऊपर हो रही थीं और उन्हें ब्लड प्रेशर और डायबिटीज भी थी, लेकिन छोटे-मोटे बुखार खांसी के अलावा उन्हें कोई और बीमारी हुई हो और वह दो दिन बिस्तर पर पड़ी रही हों ऐसा तो कभी नहीं हुआ।

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अनमोल तोहफ़ा – गृहलक्ष्मी लघुकथा

विदाई का वक़्त हो चला था. अनु बारी-बारी से सभी बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद ले रही थी. अब मालती बुआ की बारी थी. बड़ी भाभी ने चुहल की,” अनु तो बुआ जी की फेवरेट है. देखे बुआजी इसे क्या तोहफ़ा देती है?”

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अनोखा दूल्हा – गृहलक्ष्मी कहानियां

कानपुर के छोटे से कस्बे में सुधीर अपनी पांच बेटियों के साथ सुखी थे। धन का उनके घर में कोई अभाव ना था बहुत ही संपन्न परिवार से थे। अपनी चार बेटियों की शादी बहुत धूमधाम से सरकारी नौकरी वाले लड़कों से कर चुके थे। सुधीर को बस एक ही धुन थी उनका दामाद हो तो सरकारी नौकरी वाला।

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कल रात – गृहलक्ष्मी कहानियां

आज शाम से ही ना जाने क्यों….? बारिश थमने का नाम नहीं ले रही है। स्वाति भी बेचैनी से इधर उधर टहल रही है। कभी वह खिड़की के पास जा कर खड़ी हो जाती, तो कभी गैलरी में, बचपन से ही स्वाति को बारिश की फुहारें पसंद है। बारिश की फुहारों से चेहरे को भिगोना और बारिश की बूंदों को हथेलियों पर ले कर खेलना उसे अच्छा लगता है किन्तु आज ना जाने क्यों बारिश की ये फुहारें स्वाति को वो खुशी नहीं दे रही है और ना ही उसे बारिश की बूंदों को अपनी हथेलियों पर लेने का मन कर रहा है।

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उफ! ये मुस्कुराहटें – गृहलक्ष्मी कहानियां

हसीनों की मुस्कुराहटों पर तो ज़माना निसार रहता है, लेकिन कुछ मुस्कुराहटें ऐसी भी होती हैं, जो अच्छे-अच्छों को रुला देती हैं। जानिए, कुछ ऐसी ही मुस्कुराहटों के बारे में।

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नकाब – गृहलक्ष्मी कहानियां

सर्दियों की कोमल और गुनगुनी सुबह थी। दोपहर होने को चली थी पर अभी भी शरीर में कपकपी दौड़ रही थी। जिस प्रकार नई नवेली दुल्हन का घूंघट से चेहरा देखने को सब लालायित रहते हैं उसी प्रकार सूर्य के दर्शन के लिए सभी बहुत तत्पर है। मैं अखबार की ताजा खबरों का आनंद ले ही रहा था कि श्रीमती जी चाय का कप लेने आई और बोली-” क्या आप भी सुबह सुबह अखबार ले बालकनी में बैठे रहते हैं,” और मेरे उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना ही चलती बनी। सुबह-सुबह उन्हें काम ही कितने रहते हैं और यदि वह प्रतीक्षा करती भी तो मैं शायद उन्हें सही सही उत्तर नहीं दे पाता। उन्हें कैसे बताता कि वह यहां किसे देखने के लिए बैठता है, पर आज जैसे उनके दर्शन नहीं होंगे ऐसा ही लगता है ।

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माँ को मिली नई पहचान – गृहलक्ष्मी कहानियां

ऊपर वाले कमरे से जोर की आवाज़ आ रही थी। आज फिर से ओजस्वी ने अपने पापा को कहते सुना, ” एक मामूली हाउसवाइफ हो तुम. तुम्हे क्या पता कि कामकाजी इंसान के ज़िन्दगी में कितनी व्यस्तता होती है. तुम्हे तो दिनभर खा कर घर मे ही पड़े रहना होता है। तुम क्या जानो पैसे कमाने में कितनी मेहनत करनी होती है”. माँ हमेशा की तरह चुप थी और ओजस्वी हतप्रभ।

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आते-जाते यायावर – गृहलक्ष्मी कहानियां

कभी सोचा भी नहीं था महज़ मज़ाक में कही हुई बात ऐसा मोड़ ले लेगी। मोड़, और इस शब्द पर मुझे खुद ही हँसी आने लगी। मेरी जिंदगी में अब न कोई उतार-चढ़ाव आएगा, न मोड़। वह ऐसे ही रहेगी; सीधी, सहज और सपाट।

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क्षय – गृहलक्ष्मी कहानियां

सावित्री के यहाँ से लौटी तो कुंती यों ही बहुत थका हुई महसूस कर रही थी। उस पर टुन्नी के पत्र ने उसके मन को और भी बुरी तरह मथ दिया। पापा को भी दो बार खाँसी का दौरा उठ चुका था। वह जानती थी कि वे बोलेंगे कुछ नहीं, पर उनका मन कर रहा होगा कि टुन्नी को वापस बुला लें। रात में लेटी तो फिर उसी पत्र को खोलकर पढ़ने लगी।

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दरार भरने की दरार – गृहलक्ष्मी कहानियां

मैंने घर में सबको मना कर दिया था कि जब श्रुति दी आएँ तो उस समय कमरे में कोई नहीं आएगा। छोटे भाई-बहनों को इस बात की कतई तमीज़ नहीं है। कोई भी मेरे पास आएगा, तो आनेवाले के आस-पास वे इस प्रकार मँडराएँगे, गोया वह उन लोगों से ही मिलने आया हो।

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