जीवन की आपाधापी में सीमा भूल सी गई थी खुद को। सुबह से कब शाम होती ,शाम से कब रात ,अपनी तमाम व्यस्तताओं में उसको पता ही न चलता , लेकिन जब घर में वो सुनतीं कि तुम्हें काम ही क्या है दिन भर घर में ही तो पड़ी रहती हो , इतना सुनते ही वह परेशान हो जाती और अपनी उपेक्षा से भीतर ही भीतर आहत हो जाती , बार-बार उसके मन में ख्याल आता कि वह भी बाहर जाकर नौकरी करना शुरू कर दे परन्तु घर की परिस्थितियों और जिम्मेदारियों ने उसके पैरों में बेड़ियां डाल रखी थी।
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इस ऐप के जरिए सुनाएं बच्चों को ‘पंचतंत्र की कहानियां’
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