शादी के पच्चीस साल बाद उसने नफ़ासत के साथ पति से कहा-‘स्वीट हार्ट! इन पच्चीस सालों में हम दोनों ने एक-दूसरे को शिद्दत से प्यार किया और दिया। आज एक काम करते हैं, कुछ ऐसा एक-दूसरे से शेयर करते हैं, जो हमने आपस में छिपाया हो, मेरा मतलब एक-दूसरे के सामने कन्फेस। लेकिन शर्त ये है कि कोई भी किसी तरह का गिला-शिकवा नहीं करेगा।
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एक नई शुरुआत – गृहलक्ष्मी कहानियां
पापा का स्वेटर और शाल उसकी ताकत बन गए थे। पापा के पास होने का अहसास उसके मन में अजीब सी शक्ति और जीवन भर गया था और वो धीमे से मुस्कुराते हुए भीगी पलकें लेकर ना जाने कब सो गया। आनेवाली सुबह निश्चिन्त ही उसके लिए नयी सुबह होने वाली थी…
ये ग्रुप के अंदर की बात है – गृहलक्ष्मी कहानियां
मेरे मोबाइल में भी व्हाट्सएप्प है और व्हाट्सएप्प में कई ग्रुप हैं। इनमें से कुछ ग्रुप में मैं अपनी इच्छा से जुड़ा हूं, किसी में जबरन जोड़ लिया गया हूं, किसी में हाथ-पैर जोड़ कर जुड़ा हूं, क्योंकि किसी व्हाट्सएप्प ग्रुप का सदस्य या एडमिन न होना मतलब किसी के पास आधार कार्ड न होने जैसा है।
शादी के बाद मेकअप करना
बात उन दिनों की है जब मेरी उम्र 6 साल की थी। उस समय मुझे मेकअप करने का बहुत शौक होता था। अक्सर मम्मी की लिपस्टिक, काजल यहां तक की सिंदूर भी लगा देती थी। मम्मी से बहुत डांट पड़ती, अक्सर मम्मी मुझे समझाने के लिए यह कहती हैं की शादीशुदा औरतें मेकअप करती हैं। […]
शक – गृहलक्ष्मी लघुकथा
जिस समय धर्मेंद्र दफ्तर से घर लौटा उस समय तेज वर्षा हो रही थी। उसने देखा कि घर के मुख्य द्वार के बाहर मिट्टी से सने पदचिन्हों के निशान थे। उसने घर में घुसते ही पत्नी से पूछा, ‘क्या घर पर कोई आया था?’ ‘नहीं, सुबह से घर पर कोई नहीं आया।’
भिखारी – गृहलक्ष्मी लघुकथा
सरकारी दफ्तर में अपना काम निपटा, मैं जल्दी-जल्दी स्टेशन आया। गाड़ी एक घंटे बिलम्ब से आ रही थी। मैंने घर से लाये पराठें निकाले और खाने लगा। तभी एक भिखारी जो हड्डियों का ढांचा मात्र था मेरे पास आकर, हाथ फैला कर चुपचाप खड़ा हो गया।
प्रेम पगे रिश्ते – गृहलक्ष्मी लघुकथा
रोहन को ऑफिस के काम से अक्सर टूर पर रहना पड़ता। उसका पूरा ध्यान पापा की ओर ही लगा रहता। दिन में तीन-चार बार फोन कर हाल-चाल पूछ लेता, पर कभी-कभी काम इतना होता कि दिन भर बात ही न हो पाती।
आज की शबरी – गृहलक्ष्मी लघुकथा
अपनी मित्र कजरी के घर के मेन गेट की घंटी बजाते बजाते मेरी नजर बेर के उस पेड़ पर अटक गई, जो लगा तो बाजू वाले घर में था पर उसका पूरा हिस्सा बाउंड्री वॉल के इस तरफ याने कजरी के आंगन में था गेट खोलते कजरी बोली, क्या सोचने लगी।
उसके बिना – गृहलक्ष्मी लघुकथा
आज तीन दिन हो गये थे, वो ना जाने कहाँ गायब हो गया था!
एक अजीब सी तड़प महसूस हो रही थी मुझे, उसकी ग़ैर-मौजूदगी से।
मिसाल – गृहलक्ष्मी लघुकथा
शांतिनगर मोहल्ले का माहौल शोरमय हो गया। ढोल नगाड़े के शोर में लोगों की ऊंची आवाजें ‘हरी बाबू- जिंदाबाद’ गूंज रही थीं।
घर के अंदर सभी सदस्य एक दूसरे को बधाई देते हुए आगत की तैयारी में जुट गये थे।
