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छोटी भाभी आपने मेरा मायका लौटा दिया – गृहलक्ष्मी कहानियां

दीदी स्टेशन पे आ गया हूँ मैं, तुम अपने सीट पे ही रहना मैं आ जाऊंगा… “|

“हाँ ठीक है वीनू.., मैंने कहा और फ़ोन वापस अपने पर्स में रख मैंने नज़रे खिड़की के बाहर टिका दी ” |

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मेहमान बन कर आएंगे – गृहलक्ष्मी कहानियां

कलेक्टर के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद वसुधा ने अपने पति से कहा, “अशोक हम दोनों सेवानिवृत्त हो चुके हैं, क्यों ना अब हम राहुल के साथ रहें। उन्हें सहारा मिल जाएगा और हमारे लिए भी कितना अच्छा होगा, इकट्ठे होकर रहना।”

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दहेज – गृहलक्ष्मी लघुकथा

शिवांश एक कम्पनी में इंजीनियर था। उसके साथ कम्पनी में अक्षिता भी कार्य करती थी, दोनों एक दूसरे को पसन्द करते थे परन्तु डरते थे कि कहीं दोनों के माता-पिता जाति -भेद के कारण मना न कर दें।

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बहू, जरा भल्ले लाना!

शादी के बाद मैं पहली बार अपने पति के साथ पंजाब गई थी। मेरी छोट ननद का पूरा परिवार वहीं रहता है। मेरे जाने के दो-चार दिन के बाद ही मेरे भांजे का जन्मदिन पड़ा। मैं मेहमानों को खाना परोस रही थी, वहां पर दही-बड़ों को भल्ले कहा जाता है। खाना खाने बैठी तो कुछ […]

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सच्चा प्रेम – गृहलक्ष्मी कहानियां

प्रताप की जि़ंदगी से अनुपमा जा चुकी थी और अब उसकी जि़ंदगी में ल्युसी ही सब कुछ थी। और एक दिन अचानक अनुपमा और ल्युसी दोनों ही संसार से विदा हो गए। अपनी पत्नी की मौत की खबर पर वह लाख कोशिशों के बावजूद एक आंसू न बहा सका, लेकिन अपने पालतू जानवर की मौत पर उसके आंसू रोके न रुके।

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घर में सार्थक बदलाव – गृहलक्ष्मी कहानियां

जीवन की आपाधापी में सीमा भूल सी गई थी खुद को। सुबह से कब शाम होती ,शाम से कब रात ,अपनी तमाम व्यस्तताओं में उसको पता ही न चलता , लेकिन जब घर में वो सुनतीं कि तुम्हें काम ही क्या है दिन भर घर में ही तो पड़ी रहती हो , इतना सुनते ही वह परेशान हो जाती और अपनी उपेक्षा से भीतर ही भीतर आहत हो जाती , बार-बार उसके मन में ख्याल आता कि वह भी बाहर जाकर नौकरी करना शुरू कर दे परन्तु घर की परिस्थितियों और जिम्मेदारियों ने उसके पैरों में बेड़ियां डाल रखी थी।

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जीने का यही तरीका है अब – गृहलक्ष्मी कविता

अब जीने का यही तरीका है

बच्चे विदेश में

बुजुर्ग वृद्धाश्रम में

बच्चे की अपनी मजबूरी है

पैदा करने वालों की देखभाल

नहीं कर सकते।

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कुंठित भूख – गृहलक्ष्मी कहानियां

वो सड़क पर लापरवाह उद्देश्यहीन इधर-उधर यूं ही भटक रहा था। काम की तलाश में था मगर काम मिलने की कोई संभावना नहीं थी, दूर-दूर तक न थी, मास्क लगा ये वक्त है कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा। उसने कुंठित हो अपना मास्क नोंच फेंका, हालांकि बड़े कष्ट सहने के बाद पूर्वजन्म के सद्कर्मों के पुण्य से या कह लो देवयोग से कल ही उसे यह मास्क मिला था।

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अपरिग्रह – गृहलक्ष्मी कहानियां

‘बस से उतर कर मैं घर की तरफ चल पड़ा। परसों ही छोटे भाई का फोन आया था कि भैया एक बार घर आ जाओ, पिताजी-माँ आपको बहुत याद करते हैं।’ मैं समझ गया था, ज़रूर पैसों की ज़रूरत होगी।

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प्रेम की दीवार – गृहलक्ष्मी कहानियां

नदी के किनारे छोटे-छोटे कंकड़ों को लेकर फिर नदी में फेंकना और उनकी डुबुक-डुबुक लहराती कई जगह कूदती चाल देखना ये भी अपने आप में इंतज़ार का समय बिताने का एक कतिपय साधन है। रोहित आज अपनी प्रेमिका सुधा का इंतज़ार ऐसे ही कर रहा था।

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