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अब शादी के मंडप के बाद दूल्हा-दुलहन को कोर्ट में जाकर भी अपनी शादी का सबूत देना
होता है। मतलब शादी का रजिस्ट्रेशन करवाना भी जरूरी है ताकि आपकी शादीको कानूनी
मान्यता मिल सके और वक्त आने पर कई तरह की सामाजिक सुरक्षा भी।

हम सबकी जिंदगी में आने वाले बेहद खूबसूरत शब्द शादी या विवाह के अर्थ की बात की जाए, तो यह वह संस्कार विधि है, जिससे पति-पत्नी के स्थायी संबंध का निर्माण होता है, जो पति को पत्नी तथा संतान के भरण-पोषण का दायित्व सौंपता है। संस्कृत में तो पति का अर्थ ही पालन और भार्या अर्थात पत्नी का अर्थ है भरण-पोषण की जाने योग्य नारी। सच पूछा जाए तो पूरे समाज को
व्यवस्थित करने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका विवाह ने ही निभाई है।

अगर ये कहा जाए कि नारी को सुरक्षा और सम्मान देना भी विवाह के मूल में था तो गलत नहीं होगा। नारी की सामाजिक सुरक्षा के इस संस्कार को कानून के स्तर पर बल प्रदान करने के लिए ‘मैरिज रजिस्ट्रेशन ऐक्ट’ अर्थात् विवाह पंजीकरण कानून की रचना हुई। किन्तु इस बेहद महत्त्वपूर्ण कानून पर अभी तक आम आदमी का ध्यान नहीं गया है।

क्या है मैरिज रजिस्ट्रेशन अर्थात विवाह पंजीकरण विवाह पंजीकरण का प्रावधान तो काफी समय से अपने देश में है पर अब तक यह ऐच्छिक ही था और सरकार भी इसके लिए ज्यादा गंभीर नहीं थी। लेकिन अब इसे 2005 और उसके बाद हुए सभी विवाहों के लिए अनिवार्य कर दिया गया है और यह पूरे भारतवर्ष में सभी धर्मावलंबियों के लिए अनिवार्य है। 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे महिलाओं की सुरक्षा के लिए अनिवार्य बताया था।

सवाल यह उठता है कि सदियों से चली आ रही समाज स्वीकृत विवाह परंपरा के बाद भी विवाह पंजीकरण कानून बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? इस कानून का उद्देश्य नारियों का सम्मान, सुरक्षा एवं भरण पोषण से संबंधित समस्याओं में उनका साथ देना है और घरेलू हिंसा, बाल विवाह, शादी में धोखाधड़ी, तलाक, पति की मृत्यु के बाद घर से निकाल दिया जाना जैसी समस्याओं का सामना कर रही संपूर्ण नारी जाति को उसका अधिकार दिलाना है। सामाजिक सुरक्षा एवं नारी सशक्तीकरण की राह पर यह एक बेहद ठोस कदम है।

कैसे होता है पंजीकरण

विवाह पंजीकरण ऑफलाइन भी हो सकता है और ऑनलाइन भी। ऑनलाइन पंजीकरण के लिए राज्य की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर आवेदन करना पड़ता है और इसके लिएनिर्धारित शुल्क है। 21 वर्ष का पुरुष एवं 18 वर्ष की महिला जोभारत की स्थायी निवासी हो, शादी के 1 माह के अंदर पंजीकरण करवा सकता है और यदि उनमें से कोई तलाकशुदा है तो इसमें तलाक का प्रमाण पत्र भी उसे जमा करना पड़ता है।

महत्त्वपूर्ण दस्तावेज

आधार कार्ड, दो-दो पासपोर्ट साइज फोटो, शादी के समय की तस्वीर, निमंत्रण पत्र, आयु प्रमाण पत्र, शादी के समय के दो गवाह, आवास प्रमाण पत्र, पति और पत्नी की ओर से निर्धारित प्रारूप के अलग-अलग विवाह हलफनामे और अगर शादी विदेश में हुई है तो एंबेसी द्वारा नो आब्जेक्शन प्रमाण पत्र वे महत्त्वपूर्ण दस्तावेज हैं, जो पंजीकरण के समय, चाहे वह ऑफलाइन हो या ऑनलाइन जमा करने पड़ते हैं।

कैसे करें ऑफलाइन आवेदन

प्रत्येक नगर में मौजूद सब रजिस्ट्रार ऑफिस से विवाह पंजीकरण फार्म लेकर, उसे अच्छे से भरकर, अपने सभी दस्तावेजों को साथ में लगाकर, निर्धारित फीस के साथ इसी ऑफिस में जमा करने के बाद, एक नंबर मिलता है, जिससे बाद में आप सर्टिफिकेट प्राप्त कर सकते हैं।

ऑनलाइन आवेदन कैसे करें

ऑनलाइन प्रक्रिया भी ऑफलाइन के ही समानहै। अपने राज्य की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर, होम पेज खोलकर, पंजीकरण फार्म पर सारी जानकारी भरकर और महत्त्वपूर्ण दस्तावेजों को अपलोड कर, ऑनलाइन सबमिट किया जा सकता है ।

जुर्माना भी हो सकता है

यदि आप समय पर मतलब शादी के 1 माह के अन्दर रजिस्ट्रेशन नहीं करवाते हैं, तो आपको जुर्माना भी देना पड़ सकता है। इसकी राशि हर राज्य में अलग-अलग है।

विवाह प्रमाण पत्र कितने दिनों में बनता है अगर विवाह हिंदू अधिनियम 1955 के अंतर्गत हुआ है तो 15 दिन और अगर विशेष विवाह अधिनियम 1954 के अंतर्गत हुआ है तो 60 दिनों में यह जारी हो जाता है।

तत्काल विवाह प्रमाण पत्र

अप्रैल 2014 में राजस्व विभाग में इस संदर्भ में तत्काल सेवा भी शुरू की है। इसका शुल्क 10000 है, जिसे जमा करने के बाद, कानूनी रूप से विवाह हो जाता है और प्रमाण पत्र जारी कर दिया जाता है।

प्रमाण पत्र के लाभ शादी के बाद पासपोर्ट या बैंक खाता खुलवाने में इसकी आवश्यकता पड़ती है।

भारत के बाहर कई देश पारंपरिक शादी को नहीं मानते। वहां केवल यह प्रमाण पत्र ही किसी को विवाहित सिद्ध कर सकता है। जीवन बीमा या बैंक में नॉमिनी अंकित ना होने पर भी यह क्लेम में काम आता है।

चूंकि मैरिज रजिस्ट्रेशन करवाने के लिए विवाह की न्यूनतम आयु नारी के लिए 18 वर्ष और पुरुष के लिए 21 वर्ष है, इस कारण इस कानून से बाल विवाह पर रोक स्वाभाविक रूप से ही लग गई है।

यह कानून परोक्ष रूप से दहेज प्रथा पर भी अंकुश लगाने का एक सशक्त माध्यम सिद्ध हुआ है, साथ ही अगर नारी के साथ घरेलू हिंसा जैसी घटनाएं घटती हैं तो नारी को पूर्ण सुरक्षा प्राप्त होती है।

मैरिज रजिस्टर होने के बाद अगर किसी भी वजह से पुरुष विवाह को तोडना चाहता है, तो पुरुष गुजारा भत्ता देने के लिए मजबूर हो जाता है, इस तरह से यह रजिस्ट्रेशन नारी को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करता है।

शादी में किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी से बचने के लिए भी यह बेहद महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि रजिस्ट्रेशन के लिए प्रार्थना पत्र दिए जाते समय, जो सारे कागजात दिए जाते हैं, उनकी पूरी तरह से जांच होती है और जब जांच में कागजात सही पाए जाते हैं, तब ही रजिस्ट्रेशन होता है, जबकि आमतौर पर शादी-ब्याह के मामले में केवल विश्वास पर ही काम चला लिया जाता है।

पति की मृत्यु के बाद नारी को घर से निकाल देने की या जबरदस्ती उसके मायके भेज देने की घटनाओं पर भी मैरिज रजिस्ट्रेशन अंकुश लगाता है। संक्षेप में कहा जाए मैरिज रजिस्ट्रेशन नारी को
सामाजिक, आर्थिक, नैतिक एवं भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करता है।

शुल्क हिंदू विवाह अधिनियम के तहत 100 रु. का और विशेष विवाह नियम के तहत इस प्रमाण पत्र के लिए मात्र डेढ़ सौ रुपये का शुल्क लगता है। तो अब जरूरी है कि अगर अब तक आपने अपनी मैरिज को रजिस्टर नहीं कराया है तो करा लें और अपने घर में या अपने परिवार में होने वाली शादी को कानूनी मान्यता प्रदान कराने में सक्रिय भूमिका अदा करें, क्योंकि अब कानूनी स्तर पर ये आवश्यक हो गया है और मैरिज को रजिस्टर न कराना एक अपराध है।

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