बुढ़ापे को लेकर मनुष्य सदा से ही व्यथित रहा है। भृर्तहरि ने अपने नीतिशतकों में बुढ़ापे के बारे में कहा है- ‘बुढ़ापे में दुश्मन की तरह देह पर बीमारियां हमला करती हैं, फूटे मटके से बहते पानी की तरह उम्र लगातार रिसती जाती है, झुरयों से भर जाता है शरीर, आंखें, कान व दांत सब जवाब दे जाते हैं, बात नहीं सुनते बंधुजन, बीवी तक नहीं करती परवाह। कैसा दुखदायी है यह सब, बेटा भी दुश्मन हो जाता है बूढ़े आदमी का।’
सदा जवान बने रहने का सपना देखने वालों को भी एक दिन निराश होना पड़ता है, जब कनपटी के आसपास सफेद बाल उतरने लगते हैं। उम्र के आंकड़े गिनने में कोई तुक या तर्क नहीं है, क्योंकि उम्र सच में एक आंकड़ा ही होता है। जवान बने रहने के लिए ये आंकड़े मदद नहीं कर पाएंगे। अगर दिल बूढ़ा हो चुका है तो फिर पचास का होते ही आदमी मायूसी में घिर जाता है।
आंकड़ों के गणित में उलझने से बचने के लिए यह जरूरी है कि हमारी रुचियां वैविध्यपूर्ण हों और हमारा कार्यक्षेत्र का दायरा व्यापक और उत्साहभरा हो। हममें सीखने की ललक बनी रहे। फिर आपस में बैठकर हम अपनी उम्र के आंकड़े नहीं गिनेंगे कि हम इतने बरस बिता चुके हैं।

बदलाव ही सच है

उम्र के हर पड़ाव पर हम बूढ़े होते जाते हैं, मगर वृद्धावस्था में हमें कुछ खतरों के प्रति सावधान रहना सीखना होगा। बीती बातों पर अफसोस प्रकट करते रहने से सचमुच किसी का फायदा नहीं होने वाला। आगे आने वाले समय पर अपना ध्यान लगाएं। हम हर समय यही अफसोस जताते रहते हैं कि हमारे जमाने में ऐसा होता था। जमाना किसी से पूछ कर नहीं बदलता। बदलाव ही सबसे बड़ा सच है, जिसे जितनी जल्दी स्वीकारा जाए उतना ही लाभप्रद है।

सच को स्वीकारें

अपने से कम उम्र के लोग आपको नकार रहे हैं या आपके साथ समय नहीं बिताना चाहते, ऐसा खेद प्रकट करते रहने से भी बचना आवश्यक है। बड़े होते जाते आपके बच्चे, पोते-पोतियां या रिश्तेदार अपनी स्वाभाविक और बेरोकटोक स्वतंत्रता के साथ अपना समय बिताना पसंद करेंगे, ऐसा सच आपको स्वीकारना ही होगा। नहीं तो उनसे समय की मांग करके आप उन पर बोझ बन जाएंगे। मगर अपने लोगों में रूचि लेना बंद नहीं कर देना चाहिए। उनके बारे में चिंता के वृर्तों को घटाते चले जाने में ही समझदारी है। उनकी उतनी ही फिकर करें जितनी आपको पच जाए और उन्हें भी बुरा न लगे।

डर नहीं

ऐसा सब बुढ़ापे में किसी न किसी अर्थपूर्ण काम में लीन रहकर ही हासिल किया जा सकता है। मृत्यु का एक दिन साक्षात्कार करना ही है तो रोज-रोज उसके डर से क्यों मरना। जवानी में मरने से डरना तो समझ में आता है कि चलो कितना काम बकाया है, अभी कुछ देखा-भोगा नहीं है, मगर बुढ़ापे में तो हम जीवन के सच के करीब होते हैं। जब सभी प्रकार के दुख-सुख से वाकिफ हैं तो फिर मौत के डर की भावना से मुक्त हो जाएं। जिस आदमी ने अपने जीवन में लगभग सब कुछ पा लिया है उसके मन में अगर मौत को लेकर डर है तो यह बिल्कुल बच्चों जैसी हंसी के योग्य बात है।

दायरे बढ़ते हैं

एक झरना पहाड़ से निकलता है तो बेहद चंचल और उन्मुक्त होता है, फिर मैदान मिलते ही नदी बनती है तो उसके आकार में वृद्धि हो जाती है। आगे चलकर यह दरिया शांत बनकर समुद्र में जा मिलता है। मानवीय जीवन भी एक नदी की तरह है। बचपन में बच्चा एक निर्मल झरने की तरह बेपरवाह और उन्मुक्त होता है। युवा होते ही नदी के आकार की तरह उसके दायरे बढ़ते हैं और फिर बुढ़ापे में शांत दरिया सरीखा वह अंत में समुद्र में विलीन हो जाता है।
जीवन के चारों चरणों अर्थात बचपन, जवानी, बुढ़ापा और मृत्यु के पीछे एक स्नेहमयी मां की तरह ईश्वर की मंशा साफ है। मां बच्चे को पालती है, खाना खिलाती है और शाम को उसे खेलने बाहर भेज देती है। अंधेरा होते ही मां को चिंता हो जाती है कि अब उसका बेटा थक गया होगा। वह उसे घर लाने के लिए व्याकुल हो जाती है। ठ्ठ

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