अर्धकुंभ, पूर्णकुंभ और महाकुंभ में क्या है अंतर? जानें ग्रहों के गोचर से इसका संबंध: Kumb Mela Prayagraj
Kumb Mela Prayagraj

धार्मिक आस्था और आध्यात्मिकता का प्रतीक

कुंभ मेले का आयोजन खगोलीय घटनाओं और ग्रहों की विशेष स्थिति के आधार पर होता है। कुंभ मेले को तीन प्रकारों में बांटा गया है। अर्धकुंभ, पूर्णकुंभ और महाकुंभ।

Kumb Mela Prayagraj: भारत में कुंभ मेला धार्मिक आस्था और आध्यात्मिकता का प्रतीक माना जाता है। यह आयोजन हर 12 वर्षों में एक बार चार पवित्र स्थानों प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में होता है। कुंभ मेले का आयोजन खगोलीय घटनाओं और ग्रहों की विशेष स्थिति के आधार पर होता है। कुंभ मेले को तीन प्रकारों में बांटा गया है। अर्धकुंभ, पूर्णकुंभ और महाकुंभ। हर एक का आयोजन और महत्व अलग-अलग है और इनका संबंध ग्रहों के गोचर से जुड़ा हुआ है। इस लेख के माध्यम से हम आपको इनके बीच के अंतर और इनके ज्योतिषीय महत्व के बारे में बता रहे हैं।

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Kumb Mela Prayagraj
Kumb Mela Pryagraj

अर्धकुंभ मेले का आयोजन हर छह वर्षों में होता है और इसे केवल हरिद्वार और प्रयागराज में ही मनाया जाता है। यह आयोजन कुंभ मेले का एक छोटा संस्करण है लेकिन इसकी धार्मिक महत्ता कम नहीं है। श्रद्धालु बड़ी संख्या में पवित्र नदियों में स्नान करने आते हैं। अर्धकुंभ का आयोजन तब होता है जब सूर्य और चंद्रमा मकर राशि में और बृहस्पति वृषभ राशि में होते हैं। यह खगोलीय संयोग इसे विशेष बनाता है और इस दौरान संगम या गंगा स्नान को अत्यंत पवित्र माना जाता है।

पूर्णकुंभ मेला हर 12 वर्षों में चार स्थानों प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में आयोजित होता है। यह कुंभ मेले का सबसे व्यापक और महत्वपूर्ण आयोजन है। पूर्णकुंभ मेले में अमृत मंथन की पौराणिक कथा का महत्व अधिक जुड़ा हुआ है। इसमें करोड़ों श्रद्धालु भाग लेते हैं और इस आयोजन को आत्मा की शुद्धि और मोक्ष प्राप्ति का मुख्य साधन माना जाता है। पूर्णकुंभ का आयोजन तब होता है जब बृहस्पति कुंभ राशि में और सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं। यह खगोलीय स्थिति हर 12 वर्षों में बनती है और इसे आध्यात्मिक ऊर्जा का समय माना जाता है।

Pryagraj Kumb Mela
Pryagraj Kumb Mela

महाकुंभ का आयोजन हर 144 वर्षों में केवल प्रयागराज में होता है। यह सबसे दुर्लभ और महान धार्मिक आयोजन है। महाकुंभ को हिंदू धर्म में सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन माना जाता है। इसे सदी का सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पर्व कहा जा सकता है। इसमें असंख्य श्रद्धालु, साधु-संत और विदेशी भक्त भी शामिल होते हैं। महाकुंभ तब आयोजित होता है जब बृहस्पति, सूर्य और चंद्रमा एक विशिष्ट खगोलीय स्थिति में आते हैं। इस दौरान संगम में स्नान करना सभी प्रकार के पापों से मुक्ति और मोक्ष का द्वार खोलता है।

कुंभ मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है यह ज्योतिष से भी जुड़ा हुआ है। यह खगोलीय घटनाओं के अनुसार आयोजित होता है। हिंदू ज्योतिष के अनुसार, ग्रहों की स्थिति मानव जीवन पर गहरा प्रभाव डालती है। बृहस्पति, सूर्य और चंद्रमा की विशेष स्थितियां ऊर्जा और पवित्रता का समय बनाती हैं। कुंभ मेला तब आयोजित होता है जब बृहस्पति कुंभ राशि में गोचर करता है, सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है और चंद्रमा की विशिष्ट स्थिति बनती है। इस संयोग को ‘कुंभ योग’ कहा जाता है। इन विशेष दिनों में इन पवित्र नदियों में स्नान करने से आत्मा के सारे पाप धुल जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

संजय शेफर्ड एक लेखक और घुमक्कड़ हैं, जिनका जन्म उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में हुआ। पढ़ाई-लिखाई दिल्ली और मुंबई में हुई। 2016 से परस्पर घूम और लिख रहे हैं। वर्तमान में स्वतंत्र रूप से लेखन एवं टोयटा, महेन्द्रा एडवेंचर और पर्यटन मंत्रालय...