Women celebrating Lathmar Holi in Rajasthan, playfully striking men with sticks amid clouds of colorful powder in a historic town square.
Tradition, Teasing, and Togetherness in Holi

Summary: राजस्थान की लठमार होली परंपरा, नारी शक्ति और रंगों का अनोखा संगम

राजस्थान की लठमार होली में महिलाएं प्रतीकात्मक रूप से पुरुषों को लाठियों से मारती हैं, जो नारी शक्ति और सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक है। यह अनूठा उत्सव प्रेम, हंसी-ठिठोली और लोकगीतों के साथ मनाया जाता है।

Lathmar Holi Rajasthan: भारत के रंग-बिरंगे प्रदेश राजस्थान में होली के उत्सव पर महिलाएं पुरुषों की पिटाई करती नज़र आती हैं। दरअसल ये प्रतीकात्मक पिटाई यहाँ की प्राचीन परंपरा है। इस रिवाज को यहाँ बहुत उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। होली के दिन यहाँ की महिलाएं पारंपरिक कपड़े पहन कर लाठी भी साथ लेती हैं ताकि पुरुषों की पिटाई के रिवाज़ की तैयारी की जा सके। इस उत्सव में फागुन के गीत गाए जाते हैं, ढोल-नगाड़ों की आवाज से माहौल खुशनुमा बन जाता है। इस परंपरा को वास्तविक पिटाई नहीं बल्कि प्यार सौहार्द और हल्का-फुल्का हसी मजाक और नोक-झोक का प्रतीक माना जाता है। इस रिवाज को नारी-शक्ति और रिश्तों के खूबसूरती से जोड़ कर देखा जाता है। इस होली को देखने के लिए लोग अलग-अलग जगहों से यहाँ

आ कर गांवों और कस्बों में इसे देखने के लिए आते हैं।

Women playing Lathmar Holi in Rajasthan, striking men with sticks as colorful powder fills the air in a historic courtyard.
When Women Lead the Festival of Joy

राजस्थान की होली अपनी परंपराओं और लोक-रिवाजों के लिए काफी प्रसिद्ध है। इस उत्सव में हमें राजस्थान का रंगीन और सांस्कृतिक रूप देखने को मिलता है। यहाँ की सभी महिलाएं लाठी लेकर वहां मौजूद सभी पुरुषों को हल्के-फुल्के अंदाज में मारती हैं। बदले में पुरुष एक प्रकार की ढाल से अपना बचाव करते हैं। पुरुषों की ये पिटाई वाली होली हंसी-मजाक, लोकगीतों और पारंपरिक नृत्य का अनोखा संगम है। माना जाता है की इस परंपरा से आपसी प्रेम, बातचीत सामाजिक संतुलन बना रहता है, जो होली के उत्साह को और भी खास बना देता है।

इस परंपरा को राधा और श्रीकृष्ण की लीलाओं से जोड़ कर देखा जाता है। माना जाता है जब श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ गोपियों और राधा को हसी-मजाक में तंग करने के लिए उनके गाँव जाते थे चिढ़ाने के लिए उनके गांव जाते थे, तो गोपियां उन्हें लाठियों से मजाक भरे अंदाज में भगाती थीं। यही किस्सा अब होली की इस अनोखी शैली में बदल गया है। ये किस्सा राजस्थान में लोकगीत और कहानियों के द्वारा हर पीढ़ी को सुनाया जाता है। गाँव में महिलाएं पारंपरिक कपड़े पहनती है और पुरुष पगड़ी और ढाल के साथ इस रस्म को निभाते हैं। यह खेल राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत का अनमोल हिस्सा है।

राजस्थान में होली का माहौल उत्सव की तरह कई दिनों पहले से ही बनना शुरू हो जाता है। ढोल-नगाड़ों की गूँज लोकगीतों की मिठास और रंग-बिरंगे कपड़ों से से पूरा वातावरण झिलमिला उठता है। इस विशेष रस्म को निभाने के लिए लोग मिलजुल कर इकट्ठा होते हैं। महिलाएं लाठियां लेकर पारंपरिक गाने गाती हैं और सभी पुरुष ढाल लेकर उनसे बचने की कोशिश करते हैं। जैसे ही ये रस्म शुरू होती है, महिलाएं हंसी-ठिठोली करती हैं और पुरुषों पर लाठियों से हल्का और मजाक भरा वार करती हैं। आसपास मौजूद सभी लोग इस ठिठोली का आनंद लेते हैं और चारों तरफ हसीं-ठहाकों की गूंज सुनाई देती है। यह परंपरा पूरी तरह सुरक्षित और नियमों के तहत होतीं है, जिससे किसी को चोट न पहुंचे।

Rajasthani women performing a traditional dance during Holi, surrounded by crowds and vibrant clouds of colored powder near a historic fort.
Echoes of Drums and Folk Songs in the Air

महिलाओं द्वारा पुरुषों की पिटाई वाली इस परंपरा को मनोरंजन ही नहीं बल्कि नारी शक्ति का अनोखा उदाहरण माना जाता है। माना जाता है ये दिन महिलाओं को खुलकर अपनी सभी भावनाएं उजागर करने का मौका देता है। इस उल्लास भरे उत्सव में महिलाओं को खुलकर हंसने, गाने और पुरुषों पर पूरा अधिकार जताने का मौका मिलता है। यह परंपरा नारी शक्ति और आपसी सम्मान का हिस्सा बन चुकी है। यह रीति रिश्तों में प्यार और सम्मान के साथ हल्की-फुल्की नोकझोंक के साथ भी जीवन को और भी रंगीन बना देती है।

समय बदला तो परंपरा में भी कुछ बदलाव आना तय है। कई लोग इसे पर्यटन-स्थल से जोड़कर देखते हैं। यहाँ पर प्रशासन की तरफ से सुरक्षा के ख़ास इंतजाम किए जाते है ताकि इस खूबसूरत उत्सव को शांतिप्रिय रूप से संपन्न हो। सोशल मीडिया के दौर में यह अनूठी होली देश-विदेश में चर्चा का बड़ा विषय बन गई है। बदलते समय के साथ इस परंपरा में कुछ आधुनिक रंग भी जुड़ गए हैं। राजस्थान की यह उत्सवमयी होली हमें याद दिलाती है कि भारत के  त्योहार केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता के भी शानदार प्रतीक हैं।

उत्तराखंड से ताल्लुक रखने वाली तरूणा ने 2020 में यूट्यूब चैनल के ज़रिए अपने करियर की शुरुआत की। इसके बाद इंडिया टीवी के लिए आर्टिकल्स लिखे और नीलेश मिश्रा की वेबसाइट पर कहानियाँ प्रकाशित हुईं। वर्तमान में देश की अग्रणी महिला पत्रिका...