आपको बहुत कुछ बताना चाहते हैं बच्चे, ऐसे समझें उनकी ​फीलिंग्स: Children Feeling
Understanding Children Feeling

Overview:

छोटे बच्चे अक्सर बोलकर अपनी फीलिंग एक्सप्रेस नहीं कर पाते हैं। ऐसे में पेरेंट्स को बच्चों के इशारे समझने की कोशिश करनी चाहिए। इसमें बहुत ही धैर्य की जरूरत होती है।

Children Feeling: पेरेंटिंग एक बहुत ही मुश्किल काम है। कोई भी इसमें पहले से ट्रेंड या परफेक्ट नहीं होता है। एक अबोध बच्चे को बड़ा करने में न सिर्फ पेरेंट्स, बल्कि बच्चे को भी कई पड़ाव से गुजरना पड़ता है। यह एक टफ टास्क इसलिए भी है क्योंकि छोटे बच्चे अक्सर बोलकर अपनी फीलिंग एक्सप्रेस नहीं कर पाते हैं। ऐसे में पेरेंट्स को बच्चों के इशारे समझने की कोशिश करनी चाहिए। इसमें बहुत ही धैर्य की जरूरत होती है। साथ ही कुछ बातों को समझने का गुण भी हर पेरेंट में होना चाहिए। पेरेंट्स को बच्चों की हरकतों से उनकी मन की बात का अंदाजा लगा लेना चाहिए। यह एक दिन में नहीं आता, लेकिन धीरे-धीरे आप इस काम को आसान बना सकते हैं।

Children Feeling
According to experts, every child is emotionally dependent on his parents.

विशेषज्ञों के अनुसार हर बच्चा इमोशनली अपने पेरेंट्स पर निर्भर होता है। वह उन्हें पहचानता है, उसके टच से कंफर्टेबल फील करता है, उनके दूर जाने पर डरता है। दरअसल, किसी भी बच्चे का सबसे बड़ा डर ये होता है कि कहीं उसके पेरेंट्स उससे दूर न हो जाएं। यही कारण है कि जब वे पेरेंट्स को अपने आस-पास नहीं देखते हैं तो असुरक्षित महसूस करने लगते हैं। लेकिन कई बार पेरेंट्स इसलिए परेशान हो जाते हैं कि उनका बच्चा किसी के पास जाता नहीं है।  हालांकि यहां उसकी फीलिंग समझने की जरूरत है।  

कई पेरेंट्स इस बात से परेशान रहते हैं कि उनका बच्चा रोता बहुत है। लेकिन यहां आप सिर्फ अपने पक्ष की बात ही सोच रहे हैं, बच्चे की नहीं। दरअसल, मासूम बच्चों के लिए रोना ही उनकी कम्यूनिकेशन का माध्यम है। वे अपनी फीलिंग्स या परेशानी किसी और तरीके से नहीं बता सकते हैं। ऐसे में उनके रोने पर परेशान होने की जगह आपको उसके पीछे का कारण जानने की कोशिश करनी चाहिए। हो सकता है कि बच्चा तकलीफ में हो और आपको इसके बारे में बताना चाहता हो।

बच्चे जितने मासूम होते हैं, उतने ही अच्छे ऑब्जर्वर भी होते हैं। उन्हें पता है कि उन्हें कौन प्यार करता है, कौन नहीं। वे अपनी सीमाएं अच्छी तरह से जानते हैं। ऐसे में कभी भी उन्हें पनिशमेंट देने की कोशिश न करें। इससे वे अंदर से टूट जाते हैं। आगे चलकर उनका कॉन्फिडेंस भी कम हो सकता है। इसलिए हमेशा उन्हें प्यार से ही समझाएं।

कई बार पेरेंट्स बहुत छोटे बच्चों को भी समझाने की कोशिश में जुटे रहते हैं और फिर परेशान होते हैं कि ये कुछ समझता ही नहीं है। जबकि यहां आपको ये बात समझनी होगी कि बच्चे आमतौर पर इमोशनली मैच्योर नहीं होते हैं। उन्हें अपनी ​फीलिंग एक्सप्रेस करना भी नहीं आता। ऐसे में आप ये न ​समझें कि आप जो भी बात समझाओगे, वे आसानी से समझ कर मानने लगेंगे। आपको बच्चों को भावनात्मक रूप से परिपक्व होने का समय देना होगा। 

मैं अंकिता शर्मा। मुझे मीडिया के तीनों माध्यम प्रिंट, डिजिटल और टीवी का करीब 18 साल का लंबा अनुभव है। मैंने राजस्थान के प्रतिष्ठित पत्रकारिता संस्थानों के साथ काम किया है। इसी के साथ मैं कई प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबों की एडिटर भी...