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Satsang Religion: सत्संग का अर्थ
Satsang Religion

Satsang Religion: मुझसे लोग पूछते हैं कि आप परमात्मा के मिलन की, मोक्ष की, निर्वाण की ऐसी बात करते हैं, इतनी बात करते हैं, क्यों? सिर्फ विधि की बात करें कि उस तक हम कैसे पहुंचे। पहुंचेंगे तब हम देख लेंगे कि क्या होगा? यह विधि ही है। तुम्हें पता भी नहीं चल रहा है। यह परमात्मा के मिलन की, निर्वाण की, मुक्ति की, यह जो रस की बात कर रहा हूं, यह तुम्हारे भीतर विरह जगे, इसलिए। मिलन में जब रस जगेगा, तो ही तो विरह में अग्नि पैदा होगी। जब तुम दीवाने होने लगोगे उसे पाने को, जितने तुम दीवाने होने लगोगे उतने ही तुम्हारे भीतर दिनरात एक सतत् अंतर्धारा बहने लगेगी, आंसू बहने लगेंगे। बिरहिण बिहरे रैनदिन, बिन देखे दीदार। खूब उसकी तस्वीर खींचता हूं, जानते हुए कि उसकी
कोई तस्वीर नहीं बन सकती; खूब उसके रूप-रंग और सौंदर्य और आनंद का वर्णन करता हूं, जानते हुए कि कोई भी शब्द उसके साथ न्याय नहीं कर सकते, पर इसी कारण करता हूं-तुम्हारे भीतर उसके दीदार का भाव पैदा हो; तुम्हारे भीतर यह महत्त्वाकांक्षा पैदा हो, यह अभीप्सा जगे कि देखना है, कि सब भी दांव पर लगता हो तो भी देखना है; कि परमात्मा को बिना देखे इस संसार से नहीं जाना है; ये आंखे उसे देखकर ही बंद होंगी, ऐसी उत्कंठा जगे।

दिल की दूरी तो है खेल तकदीर का फासले क्या नजर के भी होंगे न कम दीदार का अर्थ होता है, कम-से-कम नजर का फासला तो उठे, कम-से-कम नजर से नजर तो मिले। अनंत रहा आए
फासला कोई बात नहीं, एक बार यह भरोसा तो आ जाए, यह अनुभव तो आ जाए कि परमात्मा है। परमात्मा शब्द ही न रह जाए, कहीं छोटी-सी किरण कौंध जाए, अनुभव बन जाए।

‘आप दिल के करीब है फिर भी, आंख दीदार को तरसती है। और परमात्मा पास है, पास-से-भी पास, तुम भी अपने इतने पास नहीं हो जितना परमात्मा तुम्हारे पास है, लेकिन फिर भी आंख दीदार को तरसती है। देखना चाहते हैं, पहचानना चाहते हैं, छूना चाहते है, उसकी सुगंध लेना चाहते हैं, उसका
स्वाद लेना चाहते हैं। यह स्वाद कैसे जगेगा? यह स्वाद की अभीप्सा कैसे पैदा होगी?

सत्संग का एक ही प्रयोजन है, जिसने पा लिया है उसे, वह कुछ-कुछ उसकी कहानी तुमसे कहे, उसका गुणगान करे; उसको पाकर जो उसे मिल गया और जो खोया है वह तुमसे कहे कि व्यर्थ खोया है, सार्थक पाया है, अपना दिल तुम्हारे सामने खोल कर रखे। मगर दिल तो उन्हीं के सामने खोल कर रखे जा सकते हैं जो झुक गए हों। शिष्य के अतिरिक्त सत्संग नहीं हो सकता। सुनने वालों से सत्संग नहीं होता, सत्संग कोई मनोरंजन नहीं है, सत्संग कोई सभा नहीं है, कोई व्याख्यान इत्यादि नहीं है, सत्संग तो जो खोज रहा है उसके बीच और जिसे मिल गया है उसकेबीच एक नृत्य है ऊर्जा का। एक अंतर्मिलन है, एक भांति का अंतर्संभोग है-आत्मा से आत्मा का, अस्तित्व का।

बिरहिण बिहरे रैनदिन, बिन देखे दीदार। जन रज्जब जलती रहै, जाग्या बिरह अपार॥

सत्संग में विरह जगना शुरू होता है। आग जलती है फिर, ऐसी आग जो फिर बुझाए नहीं बुझती, ऐसी आग फिर जिसे कोई और जल नहीं बुझा सकता जब तक कि परमात्मा का जल ही न बरसे। तो सदï्गुरु पर नाराजगी भी होती है। शिष्य क्रुद्घ भी होता है। कई बार लगता है, पहले ही अच्छे थे, चल तो रहे थे, अपनी जिंदगी एक ढांचे में बंधी जाती थी, न ज्यादा होश था, न ज्यादा फिकिर थी, सब ठीक-ठाक था, औरों जैसे ही थे, यह नयी अभीप्सा जगा दी, यह नयी आग पैदा कर दी। और एक ऐसी प्यास को बुझा दे। सत्संग में तुम्हें याद दिलायी जाती है कि तुम हंस हो और मानसरोवर चलना है। उड़ चल हंस होना, सोचते थे, मैं भी बगुला हूं, बगुलों के साथ बगुला भगत होकर खड़े हो गए थे, पूजा भी कर लेते थे, प्रार्थना भी कर लेते थे, मंदिर- मस्जिद भी आते थे, गुरुद्वारा भी हो आते थे, सब कर लेते थे, मगर थे बगुला भगत! ऊपर-ऊपर सब था, भीतर आकांक्षा मछली को पकड़ने की थी। ऊंची-ऊंची उड़ानें भी भरते थे, लेकिन नजर नीचे ही लगी रहती थी। रामकृष्ण कहते थे, चील बड़ी ऊंची उड़ती है, मगर नजर नीचे लगी रहती है; कहीं कूड़ा-करकट के ढेर पर कोई चूहा मरा पड़ा हो, नजर वहां लगी रहती है। बड़ी ऊंची उड़ती है और नजर बड़ी नीची लगी रहती है। लोग मंदिरों में बैठे होते हैं, नजर दुकानों पर लगी होती है। हाथ में माला जपते रहते हैं, भीतर राम का कोई पता ही नहीं होता, सब तरह की कामनाएं उठती रहती हैं।

सत्संग का अर्थ है, तुम्हें झकझोर कर जगा देना कि तुम क्या कर रहे हो? यह तुम्हारे योग्य नहीं। तुम मानसरोवर के लिए बने हो। तुम हंस हो। मगर तब अड़चन शुरू होती है। अड़चन यह शुरू होती है, अगर हम हंस हैं, मानसरोवर कहां है? मानसरोवर तो बहुत दूर लंबी यात्रा है, दुर्गम यात्रा है, पहुंच पाओ न पहुच पाओ। मानसरोवर की प्यास जग गयी, अब यह ताल-तलैयों के पास रस नहीं आता, हंसों की जमघट में बैठने का ख्याल आ गया, अब ये बगुले जंचते नहीं, अब बड़ी मुश्किल हो गयी। अब बड़ी फांसी लग गयी। शिष्य की यही फांसी है। जीसस ने कहा है, जो अपनी सूली को अपने कंधे पर लेकर चलेंगे, वे ही पहुंच पाएंगे। इसी फांसी की चर्चा की है, इसी सूली की चर्चा की है।

जन रज्जब जलती रहै, जाग्या बिरह अपार॥

ऐसा विरह जगता है जिसका कोई पार नहीं है। अपार को पाने चले तो अपार विरह से कीमत चुकानी पड़ती है। ‘बिरहिण बिहरै रैनदिन। जब यह समझ में आए, तो फिर न दिन है न रात है, फिर तो विरह-ही-विरह है बड़ी कठिनाई होती है विरह के इन क्षणों में। बड़े अनूठे अनुभव होते हैं। पल भर, घड़ी भर नींद भी नहीं लग पाती कि विरह जगा जाता है।

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