स्वाभाविक प्रश्न है कि आखिर महिलाओं की इस विशुद्ध पत्रिका में यह लेख क्यों, जो न फैशन, न घरेलू नुस्खे, न रेसिपी व न सौंदर्य के बारे में है। मेरा सीधा सरल उत्तर है कि ‘भारत को आज ‘सामाजिक दायित्व की धारणा को समझना ही होगा। स्त्री को मां बनने के लिए प्रकृति ने मजबूती दी है, स्त्री में विलक्षण क्षमता है, प्रतिभा है, झेलने की ताकत है और इसलिए समाज में क्रांति भी स्त्री ही ला सकती है। अस्तु यह लेख इस पत्रिका में ताकि महिलाएं जानें, समझें, फिर संघर्ष करें।

भारत की आजादी के समय विसेंट चंचल ने कहा था कि ‘दे तो रहे हो आजादी इनको लेकिन बीस साल में ये फिर वही हालात कर लेंगे जो अंग्रेजों से पहले मुगल साम्राज्य में थे कि बाप बेटे को मार रहे थे, बेटा बाप को कैद कर रहा था, एक-एक सेनापति का अपना अलग साम्राज्य था। सारा देश खंड-खंड था। चंचल ने जो कहा था, उसे राजनेता पूरा करने में जी जान से लग गए व यूपी हो या बिहार, सब यही चेष्टा कर रहे हैं कि कहीं चंचल गलत न हो जाए। ठीक वैसे ही जैसे सब चोर मिलकर ये मंत्रणा करें कि चोरी कैसे रोकी जाए, ताकि चोरी करने में और सुविधा हो जाए-यही होता है टीवी डिबेट में।

सभी कहते हैं कि देश में एकता चाहिए किंतु निहित स्वार्थ रहता है कि देश बंटा रहे- धर्म से, जाति, भाषा, प्रांत, आरक्षण के नाम पर, कभी जाट, पटेल कभी गुर्जर आंदोलन। क्यों स्त्रियां ये न जानें कि असल में दंगे करवाता कौन है? क्योंकि लड़वाने पर ताकत, बल मिलता है और अपने वोटर को अपनी भाषा में समझा लिया जाता है कि हमें चुनो, मंत्री बनाओ और हम हिन्दू मुसलमान गुजराती मराठी ब्राह्मण शूद्र अग्रवाल जैन हो बंटते जाते हैं।

दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा है- धर्म, हमारा धर्म 5000 साल पहले उसका अर्थ अवश्य कुछ और रहा होगा। जब आकाश में बिजली चमकती होगी तब डर लगता होगा, और तब इंद्र की पूजा से राहत मिली होगी, तब चैन से सोए होंगे कि अब हम सुरक्षित हैं, वर्षा समय पर होगी, घर सुविधा संपन्न रहेगा। किंतु आज हम जानते हैं, बिजली क्यों चमकती है, यहां तक मौसम का पूर्वानुमान देने में सक्षम हैं, तब भी यज्ञ पूजा करते हैं, मेंढकों का विवाह करवाते हैं कि पानी बरसे तो क्या ये निरी मूर्खता नहीं है? अब दुनिया तेजी से बदल रही है और विज्ञान धर्म से पग-पग पर लड़ाई करके आगे बढ़ा है।

हर पीढ़ी नए उत्तर, नए समाधान खोजती है, किंतु भारत का मानस हर परिस्थितियों में राजी है, बदलने को नहीं। यहां बुद्ध ने महावीर ने अहिंसा सिखाई तो जनमानस ने प्रश्न नहीं किया कि क्यों? गैलीलियो ने जब प्रश्न किया पृथ्वी चपटी है या गोल तो बाइबिल उठा कर पढ़ सकता था, किंतु उसने खोज की, आईन्स्टाईन, एडिसन ने आविष्कार किए किंतु भारत शास्त्रों के विपरीत नहीं गया क्योंकि राजनेता व धर्मगुरु नहीं चाहते कि देश बुद्धिमान हो और आधी आबादी स्त्रियों की अंधविश्वास व पाखंड से इतर कुछ सोचे। 

भारत में यूरोप अमेरिका से बेहतर जमीन है, नदियां हैं, समुद्र पर्वत हैं, सूर्य है, मौसम है, खनिज है, पुरुषार्थ है, सब है किंतु बुद्धि नहीं और सिर्फ वही बाधा है। स्त्री जो मां है, जननी है, आज उसे सिखाना होगा संदेह, प्रश्न कीजिए कि सबसे पुरानी हमारी संस्कृति, तो हमें आज सर्वाधिक समृद्ध व समर्थ राष्ट्र होना चाहिए था। यहां बालक को जब तक मां संदेह करना नहीं सिखाएगी, तब तक कोई प्रतिभा खोज यात्रा पर न चलेगी, तब तक यहां कोई डार्विन, माक्र्स, एडिसन, न्यूटन पैदा नहीं होगा। नहीं पूछेंगे स्वयं से कि क्यों हमारे देश में अशिक्षा के कारण गरीबी है व गरीबी के कारण अशिक्षा?

क्यों हमारे शहर गंदे हैं, क्यों डब्लूएचओ की रिपोर्ट में 1.40 करोड़ से अधिक आबादी वाले शहरों में दिल्ली को सबसे प्रदूषित पाया गया, फिर भी हमने जी खोलकर रावण भी जलाया, पटाखे भी? क्यों हमारे देश से अधिक वर्षा श्रीलंका, मालदीव जैसे छोटे देशों में होती है पर वहां ऐसे रोग नहीं फैलते? क्यों गंगा को मृत्यु के घाट उतार कर उसकी सफाई में सार्थकता है? क्यों पोलिथीन के प्रयोग पर प्रतिबंध हो, उत्पादन पर नहीं? स्त्री को तो इस सबमें केवल इतना करना है कि पहले खुद समझे फिर समझाए अपनी संतान को कि हम ही जिम्मेदार हैं व हमारी ही जवाबदेही है। 

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