Hindi Immortal Story: “यदि आप कष्ट उठा सकते हैं, मेरे बेटे कष्ट झेल सकते हैं, तो फिर भला मैं क्यों पीछे हटूँगी? मैं सत्याग्रह में जरूर भाग लूँगी। यदि मैं जेल के कष्टों से घबराकर माफी माँगने लगूँ, तो आप मुझसे किसी भी प्रकार का संबंध रखने से इनकार कर दें।”
ये साहस और वीरता भरे शब्द हैं भारत की बहादुर स्त्री कस्तूरबा के, जिन्होंने कंधे से कंधा मिलाकर देश की आजादी का व्रत लेकर लड़ रहे अपने पति और भारत के महानायक महात्मा गाँधी का पूरा साथ दिया। स्वयं बापू बड़ी कृतज्ञता से देश की आजादी के संघर्ष में हिम्मती बा के योगदान को स्वीकार करते थे। बा उन्हीं का दिया हुआ शब्द था, जो पूरे भारत में साहस और वीरता की मिसाल बनकर छा गया।
भारत के स्वाधीनता संग्राम में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के त्याग और तपस्या को लोग बहुत आदर से याद करते हैं। पर महात्मा गाँधी देश की आजादी के लिए इतना बड़ा काम इसीलिए कर पाए, क्योंकि उन्हें कस्तूरबा जैसी दृढ़निश्चयी स्त्री का साथ मिला। भारत के स्वाधीनता संग्राम में खुद बा का त्याग-तपस्या भरा योगदान एक मिसाल है। बिल्कुल साधारण दिखने वाली इस स्त्री में इतना बड़ा मन और इतना आत्मविश्वास था कि उसे याद करके आज भी हम हैरान रह जाते हैं। कस्तूरबा का जन्म 1869 में पोरबंदर में हुआ था।
दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गाँधी ने रंग-भेद के खिलाफ जो आंदोलन चलाया, बा ने उसमें पूरी तरह उनका साथ दिया। यहाँ तक कि स्वयं महात्मागाँधी कई बार बा के असाधारण साहस पर चकित रह जाते थे। एक बार की बात है, महात्मा गाँधी दक्षिण अफ्रीका के फीनिक्स आश्रम में स्त्रियों की सभा में भाषण दे रहे थे। वे स्त्रियों को बार-बार समझा रहे थे कि वे चाहें तो सत्याग्रह संग्राम में हिस्सा ले सकती हैं। देशवासियों की भलाई के लिए उन्हें जरूर सत्याग्रह की लड़ाई में शामिल होना चाहिए। कस्तूरबा भी उस सभा में मौजूद थीं। सभा समाप्त हो जाने के बाद उन्होंने बापू से कहा, “आपने सभी स्त्रियों को सत्याग्रह में शामिल होने के लिए कहा, तो फिर मुझे आप सत्याग्रह में शामिल होने के लिए क्यों नहीं कहते?”
सुनकर बापू एक क्षण के लिए मौन रह गए। बा ने फिर पूछा, “बताइए न, मुझमें ऐसी कौन सी कमी है, जिसके कारण मैं जेल जाने योग्य नहीं हूँ?”
इस पर महात्मा गाँधी ने कहा, “तुम जेल जाओ, इसमें मुझे बहुत खुशी होगी। लेकिन अगर तुम जेल में होने वाली तकलीफों से डर गईं तो मेरी हालत क्या होगी, तुम खुद सोच सकती हो। इसलिए तुम्हारे अंदर साहस हो, तभी जेल जाने के बारे में सोचो।”
परंतु बा इस बात से बिल्कुल नहीं डरी। उन्होंने बापू के साथ रहते हुए बड़ी से बड़ी कठिनाइयों को हँसते-हँसते झेलना सीखा था। लिहाजा उन्होंने बापू से कहा, “यदि आप कष्ट उठा सकते हैं, मेरे बेटे कष्ट झेल सकते हैं, तो फिर भला मैं क्यों पीछे हटूँगी? मैं सत्याग्रह में जरूर भाग लूँगी।”
और सचमुच कस्तूरबा हँसते-हँसते जेल गईं। दक्षिण अफ्रीका में उस समय जेलों की जो हालत थी, उसकी आज हम कल्पना तक नहीं कर सकते। वहाँ कैदियों के साथ एकदम पशुओं जैसा व्यवहार होता था। कस्तूरबा जेल से छूटकर आईं, तो उनका शरीर हड्डियों का ढाँचा भर रह गया था। लेकिन जेल में मिली तकलीफों ने उन्हें डराया नहीं, उनके साहस को कई गुना बढ़ा दिया था।
महात्मा गाँधी भारत लौटे, तो बा उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलीं और स्वाधीनता संग्राम में उन्होंने कई बार आगे बढ़कर मोर्चा सँभाला। उन्होंने अपने जीवन की हर साँस देश की आजादी के लिए अर्पित की। आगाखाँ महल में अंग्रेजों की नजरबंदी में ही उनका निधन हुआ। पर दृढ़ता की मिसाल बनी बा ने एक बार जो संकल्प कर लिया, जीवन भर उससे पीछे कदम नहीं हटाया।
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