दोस्तों कहते हैं कि एक स्त्री तभी पूर्ण मानी जाती है जब वह मां बनती है। पर आज की आधुनिक जीवनशैली में बुहत से ऐसे कपल भी हैं, जो डबल इनकम नो किडस की चाहत रखते हैं। पश्चिमी देश से आया डबल इनकम नो किडस सिंड्रोम आज तेजी से फैल रहा है। यह ट्रेंड उन वर्किंग कपल्स में ज्यादा देखने को मिल रहा है, जो अपने करियर के साथ किसी भी तरह का समझौता नहीं करना चाहते। ज्यादा से ज्यादा भौतिक सुख-सुविधाओं के कारण वो माता-पिता बनने के सुखद अहसास से पीछे हटते जा रहे हैं। अपना करियर और अपनी जिंदगी को खुशहाल बनाने के लिए वो परिवार वृद्धि को नजरअंदाज कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि कपल्स सिर्फ करियर के चलते ऐसा करते हैं बल्कि कुछ कपल्स ऐसे भी हैं जो कई दूसरे कारणों से ऐसा निर्णय लेते हैं। जैसे मेरी जान-पहचान के एक मित्र हैं, जिन्होंने बच्चे इसलिए नहीं पैदा किए क्योंकि उनका मानना है कि महंगाई की इस मार में वे बच्चे को अच्छी परवरिश नहीं दे सकते थे। इसीलिए उन्होंने बच्चे पैदा न करने का निर्णय लिया। सिर्फ इतना ही नहीं, कई ऐसी महिलाएं हैं, जिन्हें अपनी फिगर और सुंदरता की चिंता रहती है और वो बच्चे के कारण अपने शरीर को बेडौल नहीं करना चाहती। कई तो इस चक्कर मे भी बच्चे पैदा नहीं करती कि बच्चे को देखने के लिए घर में कोई नहीं है।
आज की हाई प्रोफाइल लाइफस्टाइल में कोई भी युवा कपल्स अब अपनी कामयाबी व उन्मुक्तता में किसी भी रोड़े को स्वीकार नहीं करना चाहते। फिर चाहे वह उनकी संतान ही क्यों न हो। उनकी नजर में संतान सुख कोई मायने नहीं रखता। वो संतान के झंझट और जिम्मेदारियों के चक्र में उलझकर अपने सुनहरे सपनों का गला नहीं घोंटना चाहते और न ही आजाद जिंदगी छोड़कर ऐसी जिंदगी में बंधना चाहते हैं, जिसमें उन्हें परेशानियों से दो-चार होना पड़े। वह परिवार व समाज के बंधन में आकर विवाह तो कर लेते हैं पर बच्चे करने व न करने का फैसला उनका अपना होता है। घरवाले अगर उन पर दबाव डालें तो वह यह कहकर उन्हें चुप करा देते हैं कि ये उनका आपसी सहमति से लिया गया निर्णय है, जिसमें वे किसी के हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं कर सकते।
दोस्तों, आप इस लेख को पढ़कर सोच रहे होंगे कि मैं इन निर्णय के विरुद्ध हूं पर ऐसा बिल्कुल नहीं। ये तो हर किसी का व्यक्तिगत फैसला होता है, जिसमें मैं किसी भी तरह की टिप्पणी नहीं करना चाहती हूं। मैं बस इतना कहना चाहती हूं कि मानव जाति के लिए बच्चों से बड़ा और शाश्वत सुख कोई और नहीं है। अपने जिगर के टुकड़े को अपने हाथ में थामने से बड़ी कोई खुशी नहीं है। ऐसे कपल्स शुरुआत में बच्चों के महत्व को पहचान नहीं पाते और जब पहचानते है तो काफी समय निकल चुका होता है। क्योंकि जैसे-जैसे समय गुजरता है उनमें अकेलेपन की भावना बढ़ती जाती है। एकांकीपन उन्हें ऐसे कगार पर पहुंचा देता है जहां उन्हें महसूस होता है कि उन्होंने एक ऐसी गलती की है, जिसका खामियाजा ता-उम्र उन्हें ही भुगतना है।
डबल इनकम नो किड्स की चाहत रखने वाले कपल्स से मैं बस इतना कहूंगी कि करियर और सफलता कभी भी प्राप्त हो सकती हैं। लग्जरी लाइफ जीने की चाहत रखने के कारण वे संसार के सबसे बड़े सुख मातृत्व सुख को अनदेखा कर देते हैं, जो उनकी भूल है। वो यह भूल जाते हैं कि मातृत्व सुख एक समय सीमा के ही दौरान प्राप्त किया जा सकता है। उम्र गुजर जाने के बाद आप चाहें भी तो कुछ नहीं कर सकते। वैसे भी हमारे यहां कहा जाता है कि बच्चे ईश्वर का वरदान होते हैं, जो खुशनसीब लोगों को ही प्राप्त होते हैं। पर इस राह पर चलने वाले दंपति शायद उन लोगों के दर्द व पीड़ा को महसूस नहीं कर सकते हैं, जो किसी कारण से संतान सुख से वंचित रहते हैं।
अपने घर-आंगन में नन्हें की किलकारी की चाह उनसे अधिक किसी और को नहीं होती है। इस चाह को पूरा करने के लिए वह किसी भी हद तक गुजर जाते हैं। बच्चे का मोह उनके लिए सर्वोपरी होता है। पर फिर भी अगर कोई दंपत्ति डबल इनकम नो किडस का फैसला लेना चाहता हैं तो ये उनका अपना फैसला है, पर मैं ऐसे लोगों से निवेदन करूंगी कि अगर उनके दिल में बच्चे की चाहत कभी उमड़ आए तो वो बच्चे को गोद भी ले सकते हैं, क्योंकि हमारे देश में ऐसे बहुत से बच्चे हैं, जो ममता के आंचल से कोसों दूर हैं। दोस्तों ये मेरी अपनी राय है कि बच्चा पैदा करने से अच्छा कि हम किसी ऐसे बच्चे को गोद लें, जो माता-पिता के प्यार से वंचित है। अगर हम आप मिलकर यह फैसला लें तो हर एक बच्चे को घर व माता-पिता मिल सकेंगे।
