सेवा के लिए प्रतिबद्धता ही संसार में हमारा सर्वप्रथम और प्रमुख ध्येय है। यदि तुम्हारे जीवन में भय या उलझन है, तो यह तुम्हारे प्रतिबद्धता के अभाव के कारण। यदि तुम्हारे जीवन में अस्त व्यस्तता है, तो संकल्प के अभाव के कारण। केवल यह विचार, ‘मैं यहां संसार में सेवा के लिए ही हूं’, ‘मैं’ को विलीन करता है, और जब ‘मैं’ मिट जाता है, परेशानियां खत्म हो जाती हैं। सेवा वह नहीं जिसे तुम सुविधा या सुख के लिए करते हो। जीवन का परम उद्देश्य है सेवारत होना।

संकल्परहित मन दु:खी रहता है। संकल्प से जुड़ा मन कठिनाइयां अनुभव कर सकता है परंतु अपने श्रम का फल पाएगा। जब तुम सेवा को जीवन का एकमात्र उद्देश्य बना लेते हो, तो यह भय को दूर करता है, मन को केंद्रित करता है और तुम्हें लक्ष्य देता है।

निर्धन हैं वे जो अपना पेट भरने के लिए लड़ते हैं। धनी अपना भोजन बांटकर खाते हैं। उनसे धनी हैं वे जो अपने अधिकारों को बांटते हैं। उनसे भी अधिक धनी वे व्यक्ति हैं जो अपना यश बांटते हैं। सबसे धनवान हैं वे जो स्वयं को बांटते हैं।

व्यक्ति की सम्पन्नता का परिचय उसके बांटने की क्षमता से होता है- उसने क्या संचय किया है, उसे देखकर नहीं।

सफलता का क्या अर्थ है? जब तुम्हें कुछ पाना नहीं, तो सफलता का प्रश्न ही नहीं उठता। यदि तुम केवल देने और सेवा के लिए आए हो, तो पाने के लिए कुछ है ही नहीं। सफलता श्रेष्ठता की कमी को इंगित करती है। सफलता यह दर्शाती है कि असफल होने की संभावनाएं भी हैं। जो सर्वश्रेष्ठ है, वहां असफलता का, हराने का प्रश्न ही नहीं।

सफलता का अर्थ है किसी सीमा को पार करना। सीमा को पार करने का अर्थ हुआ कि तुम्हारी यह कल्पना है कि कोई सीमा है। यदि तुम मानते हो कि कोई सीमा है, तो तुम अपने सामर्थ्य का बहुत कम मूल्यांकन कर रहे हो। यदि तुम्हारी कोई सीमा ही नहीं, तो फिर तुम्हारी सफलता कहां है? तुम यह नहीं कहते कि तुमने सफलतापूर्वक एक गिलास पानी पिया, क्योंकि यह तुम्हारे सामर्थ्य में है। परंतु जब तुम कुछ ऐसा काम करते हो जो तुम सोचते हो कि तुम्हारी सीमा के परे है, तब तुम उसे सफलता मानते हो।

जब तुम अपनी अनंतता को समझते हो, तब कोई भी कार्य प्राप्ति या उपलब्धि नहीं।

जो भी सफलता का दावा करता है, वह अपनी ही सीमाओं को दर्शाता है। यदि तुम स्वयं को बहुत सफल समझते हो, इसका अर्थ है तुम अपना मूल्यांकन कम कर रहे हो। तुम्हारी सभी उपलब्धियां तुमसे छोटी ही हैं। अपनी उपलब्धियों पर अभिमान करना स्वयं को छोटा करना है।

दूसरों की सेवा करते समय तुम्हें यह महसूस हो सकता है कि तुमने पर्याप्त नहीं किया, पर यह कभी नहीं महसूस होगा कि तुम असफल रहे। वही सच्ची सेवा है जब तुम यह महसूस करो कि तुमने पर्याप्त नहीं किया।

कार्य करना तुमको इतना नहीं थकाता जितना कि कर्ता-भाव। तुम्हारी सभी प्रतिभाएं  दूसरों के लिए हैं। यदि तुम सुरीला गाते हो, वह दूसरों के लिए है, यदि तुम स्वादिष्ट भोजन बनाते हो, तो दूसरों के लिए, अच्छी पुस्तक लिखते हो तो वह भी दूसरों के पढ़ने के लिए। यदि तुम अच्छे बढ़ई हो, तो यह इसलिए कि दूसरों के इस्तेमाल के लिए अच्छी चीजें बना सको। यदि तुम एक निपुण सर्जन हो, तो दूसरों को स्वस्थ्य करने के लिए। यदि तुम अच्छे शिक्षक हो – वह भी दूसरों के लिए। तुम्हारे सभी कार्य, सभी निपुणताएं, दूसरों के लिए हैं।

अपनी प्रतिभाओं, निपुणताओं का उपयोग करो अन्यथा वे तुम्हें पुन: नहीं दी जाएंगी। 

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