परिवर्तन का दर्पण
आज यदि निर्भया जीवित होती तो पूरे 28 वर्ष की हो जाती। निर्भया की मां आशा देवी ज्योति सिंह रुंधे गले कांपते हाथों से माइक पकड़ते हुए बोली, ‘लोग कहते हैं सही कपड़े पहनो, रात में बाहर न घूमो लेकिन छोटी बच्चियां, जो रात को अकेले बाहर नहीं जाती, उनके साथ भी तो गलत काम हो ही रहा है। 16 दिसंबर की घटना से समूचे देश में एक आक्रोश उभरा था, नारे लगे थे, मोमबत्ती जलाकर देशभर में प्रदर्शन किए गए थे। अपराधी पकड़े भी गए थे, लेकिन समाज की मानसिकता में कुछ खास परिवर्तन नहीं आया। किसी भी दिन का अखबार पलट कर देखिए, आपको कम से कम दो-तीन घटनाएं तो बलात्कार की, नृशंस हत्या की, एसिड अटैक की पढऩे को मिल ही जाएंगी। ज्योति या रति, मुन्नी हो या मीनाक्षी, नाम ही अलग हैं, नियति नहीं। निर्भया की श्रद्धांजली सभा में ही मुझे मिली अनीता जी जिनके बेटे ने पीहू के साथ विवाह करना निश्चय किया थां। परिवार सहमत था, तिथि भी निश्चित ही थी।
अकाउंटेंट पीहू, हर रोज की तरह उस रोज भी अपने रुटीन समय पर और उसी रास्ते ऑफिस से घर जा रही थी,अमूमन रुक कर जिस दुकान से रोजमर्रा के सामान लिया करती थी, उस रोज भी रुकी, शैंपू व कुरकुरे खरीदा, कुछ और भी लेना चाहती थी, नहीं था तो बोली दुकानदार से, कोई बात नही, मैं कल ले लूंगी और निश्चिंत घर की ओर चल पड़ी, उसे क्या पता था कि उसके घर से मात्र कुछ ही दूरी पर एक खाली ह्रश्वलॉट में मृत्यु उसकी प्रतीक्षा में बैठी है। घात में बैठे दो लड़कों ने जैसे ही गर्दन पकड़ कर उसे खींचा, तत्क्षण उसकी गर्दन की हड्डी चटक गई और प्राणपखेरू उड़ गए। इस पर भी निर्जीव शरीर के साथ बलात्कार किया, ये सब मृतका के अपने मौहल्ले में रात के आठ बजे। सुबह स्कूल के बच्चों ने पीहू की नग्न मृत देह चीटियों कीड़ों द्वारा खाई हुई, देखी। जब अनिता जी वहां पहुंची तो सैकड़ों लोगों की भीड़ तो जमा थी किंतु अधिकांश थे तमाशबीन। अपराधी पकड़े गए। एक अपराधी पहले ही 13 वर्ष की एक लड़की से बलात्कार का आरोपी है और जमानत पर बाहर है। दूसरा जुवेनाइल है। निर्भया केस में भी मुख्य आरोपी जुवेनाइल था, दो महीने पहले ही रिहा हुआ।पिछले वर्ष ही मीनाक्षी नाम की एक लड़की को उसी के मौहल्ले में दो लड़कों ने चाकू मार डाला।
चलती ट्रेन से रीतिका को इसलिए फेंक दिया गया कि उसने छेडख़ानी का विरोध किया था, अधिकांश यात्री सोते रहे या सोने का नाटक करते रहे। यहां 6 वर्ष की अबोध बेटी से अपने पिता दुष्कर्म करते हैं और मां उसे चुप रहने को कहती है। शहर में पढऩे आई बहन से उसके भाई बलात्कार करते हैं। ये है हमारे समाज की वास्तविकता। मर्द एक लुटती युवती को अनदेखा कर दुबक जाते हैं कि कौन बेवजह फसाद में पड़े। पड़ोसी सोचते हैं कि कौन पुलिस-अदालत के चक्कर में वक्त जाया करे और महिलाएं सामाजिक दबाव के चलते या फिर आॢथक मानसिक निर्भरता के कारण सह जाती हैं ये विष दंश। कैसी विडंबना है कि पिछले वर्ष ही गुडग़ांव की बहुराष्ट्रीय कंपनी की एक्सक्यूटिव उबर कांड के शिवकुमार का शिकार बनी। हंगामा हुआ, टीवी चैनलों पर बहस छिड़ी और संसद में चर्चा हुई पर महिला सुरक्षा पर नहीं बल्कि इस बात पर कि सभी कैब पर रोक कैसे लगाएं।
अरुण जेटली कह जाते हैं कि मध्य वर्ग अपना ख्याल खुद रखे। मनोहरलाल खट्टर कहते हैं कि बलात्कार के लिए लड़कियां खुद ही जिम्मेदार हैं। पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित कहती हैं कि लड़कियों को 9 बजे के बाद बाहर नहीं रहना चाहिए, वे भूल जाती हैं कि लड़कों को क्यों बाहर रहना चाहिए? आखिर बलात्कारी तो पुरुष ही होता है। आखिर बलात्कार बंद कैसे होंगे? असली कारण है सजा का भय न होना। क्यों न हमारे देश में भी ऐसी ही सजा का प्रावधान हो कि अपराधी अपराध करने से पहले सौ बार सोचे जैसे चोरी की सजा हाथ काट देना हो, वैसे ही बलात्कार की सजा लिंग काट देना क्यों न निर्धारित कर दी जाए। न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी। पहले गांव कस्बों में कहा जाता था- ‘बेटियां सांझी होती हैं सबकी होती हैं। और आज वास्तव में उचित समय है बात एक बार फिर से दोहराने का ताकि आगे आने वाली पीढ़ी को ये न कहना पड़े- ना… वो कोई मेरी बेटी थोड़े ही न थी।
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