किसी भी दिन के अखबार पर नज़र डालें, बलात्कार की चार-छह खबरें तो देखने को मिल ही जाएंगी। कभी बैनर या दो-तीन कॉलम की तो कभी छोटी-छोटी सिंगल कॉलम खबरें। कभी बच्चों के साथ तो कभी बड़ी-बूढ़ी महिलाओं के साथ ही। कभी एकल बलात्कार तो कभी सामूहिक। कभी सड़क चलते तो कभी बस में, कभी चलती कार में तो कभी थाने में या फिर अपने ही ऑफिस में। कभी अड़ोस-पड़ोस के चाचा-भैया का दिल डोल जाता है तो कभी अपने ही सगे-संबंधी फिसल जाते हैं। यहां तक कि पुलिसकर्मियों का नाम भी इस सूची में शामिल है। कभी निर्भया मामला तो कभी उबर कांड और ऐसे सैकड़ों और कांड…। आखिर यह लिस्ट कभी-कहीं तो रुके।

दुनिया के इस सबसे युवा देश में आज बलात्कार महिलाओं के खिलाफ चौथा सबसे बड़ा अपराध बन चुका है। नेशनल क्राइम ब्यूरो की 2013 की रिपोर्ट बताती है कि साल दर साल दर्ज होने वाले इन करीब 98 फीसदी मामलों में बलात्कारी पीडि़त का जानने वाला था। ज्यादातर मामले जो प्रकाश में आते हैं वे सार्वजनिक जगहों पर अनजान लोगों द्वारा किए गए होते हैं जिस कारण इस सच्चाई पर ध्यान नहीं जाता।

रोज-रोज होने वाले ये कांड रोज-रोज ही हमारे देश की आधी आबादी के दिलों को भी झकझोर जाते हैं। घर से निकलने वाली लड़कियों की मांओं के दिल तब तक कांपते रहते हैं जब तक वह सही सलामत घर न लौट आएं। बलात्कार का ग्राफ चिंताजनक स्तर तक पहुंचने के बावजूद लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इसे रोकने के अनेक उपाय किये जाने पर भी कोई खास सुधार नज़र नहीं आ रहा है। हालांकि सरकार की ओर से कुछ हल्की सी कोशिश चल रही है। इनमें एक है मोबाइल एप- हिम्मत। केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए एक नई मोबाइल एप लॉन्च की है जिसकी मदद से स्मार्टफोन का इस्तेमाल कर कोई भी पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर सकता है। इस एप में एक ऐसा बटन भी है, जिससे 30 सेकंड का वीडियो या ऑडियो रिकॉर्ड किया जा सकता है।

पुलिस का कहना है कि इसकी मदद से फोनधारक इमरजेंसी में बहुत कम समय में पुलिस से संपर्क कर सकता है। इस एप को रजिस्टर करते वक्त इसके डेटाबेस में यूजर को पांच दोस्तों या सगे-संबंधियों के नंबर दर्ज करने के लिए कहा जाएगा। जब भी इस एप के नंबर पर इमरजेंसी कॉल की जाएगी, एक मेसेज अपने आप इन पांचों नंबरों पर चला जाएगा। यह एप महिलाओं की सुरक्षा की गारंटी तो नहीं है लेकिन ‘कुछ न होने से कुछ होना बेहतर की तरह कामचलाऊ तो है ही। यह और ऐसी अनेक एप्स सिर्फ मॉडर्न टेक्नॉलॉजी यानी पढ़ी-लिखी और महंगे फोन रखने वाली महिलाओं की ही मदद कर पाएंगी, वह भी तब जब वह महिला ऐसे गंभीर समय में फोन करने या वीडियो रिकॉर्ड करने की स्थिति में हो। लेकिन ऐसी स्थिति न होने पर या महिला के पास ऐसा फोन न होने के हालात में क्या होगा, इस बारे में किसी ने कुछ नहीं कहा है।

यह हमारे देश की विडंबना है कि जिनके ऊपर ऐसे जुर्म रोकने की जिम्मेदारी है उनमें बहुत से खुद ही इसमें शामिल होते हैं। यहां तक कि अपने घर में भी महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। ऐसे में अब समाज को ही सोचना होगा कि कैसे ऐसे भेडिय़ा रूपी मनुष्यों से अपनी-अपनी बेटी को बचाया जाए।

बलात्कार से बचने के एक उपाय के रूप में कई लोग सलाह देते हैं कि लड़कियों का बाहर निकलना बंद करवा दिया जाए या फिर उन्हें दबी-ढकी रखकर ही बाहर निकलने दिया जाए। लेकिन क्या बलात्कार की शिकार हर लड़की कम कपड़े पहने हुए होती है। क्या वे छोटी-छोटी नाबालिग बच्चियां जिन्हें उनके पड़ोसी की दरिंदगी झेलनी पड़ती है, अपने जिस्म की नुमाइश करने की वजह से शिकार बनती हैं। दरअसल गंदगी बलात्कारी की निगाह में होती है। वे हर लड़की को एक ही तरह से देखेगा, चाहे वह किसी भी रूप में हो, किन्हीं भी कपड़ों में हो, वे एक ही जैसा कृत्य करेंगे। यदि ऐसा न होता तो बच्चियों या बुजुर्ग महिलाओं के साथ ऐसा कुकृत्य नहीं किया जाता।

आज ज़रूरत है अपने-अपने बेटों को महिलाओं का सम्मान करना सिखाने की और लड़कियों को आत्मरक्षा की ट्रेनिंग देने की ताकि कभी भी वे किसी के सामने निर्बल न साबित हो। हमें बचपन से ही अपनी बेटियों को यह भी सिखाना होगा कि वे किसी के बहकावे में न आएं, अधिक भावुक न बनें और स्वयं को किसी भी तरह से इन भेडिय़ों से बचाएं। इससे कुछ हद तक हम इस अपराध पर काबू पा सकते हैं।