तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिन: तत्त्वदर्शिन:।।
ज्ञान किसको मिले? जो श्रद्धाभाव से शरणागत हो और अपना आप समर्पित करके कहे कि ‘गुरुदेव! ज्ञान दीजिए!’ ‘उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं’ तो गुरु ही उपदेश दे। ‘ज्ञानिन: तत्त्वदर्शिन:’ तो ही तत्त्व का दर्शन तुमको होता है। पहली तो मर्यादा यह है। दूसरी मर्यादा यह है कि जब गुरुदेव के मुख से ज्ञान श्रवण करें और गुरुदेव कहें कि ‘अच्छा, अब मैंने यहां बात पूरी की।’ माने, सत्संग की पूर्णाहूति होने पर शिष्य यथाशक्ति श्री गुरु के चरणों में अपनी भेंट समर्पित करता है। किसी ने पूछा, ‘भेंट क्या हो?’ बोले, जो तुम्हारा सबसे कीमती है न, उसी को भेंट चढ़ा दो। अब, तुम हो ऐसे बेईमान। कीमती भेंट कैसे करोगे? जो शिष्य नहीं है, तो वह कैसे करेगा। मतलब, अब प्रसंग से है, तो मैं एक बात इसमें और कह देती हूं।
कई बार ऐसा हुआ कि शुरू-शुरू की बात है कि जब थोड़े से ही सौ-दो सौ आदमी होते थे सत्संग में, मंदिरों में जब मैं जाया करती थी, तो आखिरी दिन लोग अपनी श्रद्धा से या जो भी यथाशक्ति पास में होता, वह देकर प्रकट करते। अब, हर तरह का आदमी आता। माने हम बैठे हैं और वे अपनी भेंट चढ़ा रहे हैं। मुझे अजीब तब लगता, जब मैं यह देखती कि हीरे-जवाहरातों से, सोने के जेवरों से लदे हैं, पर जब चढ़ाने की बारी आती, तो वे ऐसा सड़ा-गला सा नोट, जो उनके किसी काम न आता, वह निकालते, वह सामने रखते और मत्था टेक देते। तो उस समय लगता कि ….।
अष्टावक्र के पास जब जनक गए और जनक ने कहा कि ‘मुझे ज्ञान दीजिए।’ तो अष्टावक्र कहते, ‘ठीक है, आ जाना सुबह।’ तो अब मर्यादा अनुसार पहले गुरु का पूजन करें, गुरु के चरणों में भेंट धरे। तो जनक आए, तिलक लगाया, फूलमाला अर्पण की, आरती की और हाथ जोड़ के गुरु को कहा, इस जगत के बदले मैं क्या दूं। मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा, आप ही कहिए। अष्टावक्र कहते, नहीं भेंट तो अपनी इच्छा से दी जाती है। मैं नहीं कह सकता। तुम दे दो, तुम्हें जो करना है सो करो।
तो भाव में आकर जनक जी ने कहा, अच्छा प्रभु! मैंने अपना तन, मन, धन सब आपको दिया। अष्टावक्र कहते, ठीक है, हमने लिया।
