‪धर्म व्रत त्यौहार‬

 

सृष्टि का सबसे पावन शब्द है ‘मां’। मां का स्थान ही इस संसार में सर्वोपरि है। मां अपनी संतान के लिए नाना प्रकार के कष्ट उठाती है और अपनी संतान के मंगल के लिए सभी प्रयास करती है। मां का दर्जा न कभी किसी ने लिया है और न ही कोई ले सकता है। इसलिए मां के कदमों के नीचे जन्नत कही गई है। मां के इसी वात्सल्य भाव के कारण इसे ईश्वर तुल्य माना जाता है। शायद ईश्वर की उपासना भी मां के रूप में इसी वात्सल्य स्वरूप के कारण ही की जाती है। मां के इसी सार्थक पर्व का नाम अहोई अष्टमी है। अहोई का व्रत पुत्रवती स्त्रियां अपने बच्चों के सुख-सौभाग्य, दीर्घायु और कुलदीपक की उन्नति की कामना के लिए करती है। दीपावली के त्योहार की खुशियां अहोई आठो से ही शुरू हो जाती है। अहोई अष्टमी का पर्व माता द्वारा अपनी संतान को समर्पित है।

 

प्रचलित कथा

 

एक नगर में एक साहूकार रहता था। उसके सात पुत्र और एक पुत्री थी। साहूकार के सभी बेटे-बेटी विवाहित थे। एक दिन साहूकार के बेटों की बहुएं अपनी ननद के साथ मिट्टी खोदने गईं। मिट्टी खोदते समय साहूकार की बेटी से संयोगवश कुदाली स्याऊ (सेही) के बच्चे को लग गई, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। अनजाने में हुए इस पाप से बेटी को बहुत दुख हुआ। स्याऊ को जब ज्ञात हुआ कि इसने मेरे बच्चे को मार डाला है, तो उसने ननद की कोख बांधनी चाही। तब ननद ने अपनी भाभियों से आग्रह किया कि वे मेरी बजाए अपनी कोख बंधवा लें। इस पर छहों बड़ी भाभियों ने कोख बंधवाने से मना कर दिया, लेकिन सबसे छोटी बहू ने ननद के बदले अपनी कोख यह सोचकर बंधवा ली कि जेठानियों के बेटा-बेटी भी तो मेरे ही बच्चों के समान होंगे। यदि ननद की कोख बंध गई, तो इससे सास को भी दुख होगा। समय बीतता गया और छोटी बहू के जन्में सातों बेटे एक के बाद एक मरते चले गए। इससे दुखी होकर छोटी बहू ने कई पडि़तों को बुलाकर स्याऊ के शाप से मुक्ति पाने के उपाय पूछे।

इस पर पंडितों ने बताया कि तुम गऊ की पूजा करो। वह स्याऊ माता की बहन है। वह कहेगी तो स्याऊ तुम्हारी कोख खोल दे देगी। छोटी बहू प्रतिदिन गऊ की पूजा करने लगी। सेवा-पूजा से प्रसन्न होकर एक दिन गऊ माता ने कहा-‘तुझे मेरी सेवा करते बहुत दिन हो गए हैं, बता क्या चाहती है?’
तब साहूकर की बहू ने पूरी घटना गऊ को सुनाते हुए कहा-‘स्याऊ से मेरी कोख छुड़वा दे।’ गऊ ने कहा, ‘सवेरे अंधरे में आना।’ अगले दिन वह जल्दी ही गऊ उसे लेकर घने जंगल में स्याऊ माता के पास आई। स्याऊ ने गऊ को देखकर कहा, ‘आओं बहन बहुत दिनों में आई हो। यह तुम्हारे साथ कौन है?’
गऊ बोली-‘यह मेरी भक्त है और मेरी बहुत सेवा करती है।’ तब स्याऊ बोली-‘मुझे भी मेरे बच्चों की रखवाली के लिए किसी की आवश्यकता है।’ इस पर छोटी बहू ने स्याऊ के बच्चों की रखवाली करने की बात स्वीकार कर ली और वह वहीं रहने लगी। बहू उन सबकी खूब सेवा करती। यह देखकर एक दिन स्याऊ बोली-तुम इतनी उदास क्यों रहती हो? बहू की आंखों में आंसू आ गए। बहू को रोती देख स्याऊ ने कहा-‘मुझे बता क्या बात है, मैं तेरा संकट दूर करूंगी।’ इस पर बहू बोली-‘वचन दो।’ स्याऊ ने वचन दे दिया। तब उसने अपनी कोख बंधने वाली सारी घटना स्याऊ को बता दी। सुनकर स्याऊ ने कहा-‘तूने मुझे ठग लिया है, लेकिन कोई बात नहीं, मैं तेरी कोख खोलती हूं-आज से तेरी कोई भी संतान नहीं मरेगी।’ इसके बाद स्याऊ ने बहुत सारा धन देकर बहू को वहां से विदा किया। बहू ने घर आकर देखा तो उसके मरे हुए सातों बेटे जीवित हो गये। उस दिन अहोई अष्टमी थी। सभी के साथ-साथ उसने अहोई माता का व्रत रखा, कथा कही एवं पूजा की। अहोई माता त्रितापों का क्षय करने वाली देवी हैं। वो महालक्ष्मी जी का प्रतीक हैं।

 

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अहोई अष्टमी: संतान को समर्पित है ये व्रत, ये है पूजन विधि 3

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

व्रत पूजन विधि

इस दिन माताएं अपनी संतान की दीर्घायु एवं मंगल कामना के लिए सूर्योदय से पहले उठकर ‘स्नान व ध्यान करके आहार लेती हैं व सारा दिन निराहार व्रत करती हैं। सब प्रकार की कच्ची रसोई बनाई जाती है। संध्या को दीवार में आठ कोष्ठक की एक पुतली लिखी जाती है। उसी के समीप स्याऊ (सेही) के बच्चों की और सेई की आकृति बनाई जाती है। जमीन पर चौक पूजकर कलश की स्थापना की जाती है। रसोई का थाल लगाकर भोग के लिए तैयार रखा जाता है। कला पूजन के बाद अष्टमी (दीवार में लिखी हुई चित्रकारी) का विधिवत पूजन होता है। तब दूध भात का भोग लगाया जाता है। पहले घर की दीवार पर विभिन्न रंगों से अहोई माता बनाई जाती थी। अब समय बदला तो अहोई के कैलेंडर बाजार में बिकने लगे हैं। फिर रात्रि को संतान को साथ लेकर अहोई माता की पूजा अर्चना की जाती है तथा बच्चों को मिट्टी के बर्तन भर कर मिठाई दी जाती है जिसे झक्करियां कहते हैं ताकि उनके संतान का परिवार भरा पूरा रहे। घर के बच्चे दरवाजों की कुंडियां जोर-जोर से बजाते हैं और अहोई माता को पुकारते हैं। माताएं ये शब्द बार-बार दोहराती है, ‘हे होई, दे मेरा दुध पुत लै अपना टिकडा लोई।’ इस दिन गन्ने की भी पूजा की जाती है। मीठी मट्ठी और गुड से बनी मिठाई बाजार में तैयार मिलती है। पूजा के बाद ब्राह्मण को नेवैद्य देकर बच्चों को भी यही प्रसाद दिया जाता है। शाम को चंद्र दर्शन करके व तारे को अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है।

पूजन के लिए सामग्री

तेल से बने पदार्थ जैसे मट्ठी, सीरा, गुलगुले, पूड़े, चावल और मां की साबुत दाल, मूली के साथ ही गेहूं अथवा मक्की के सात दाने हाथ में लेकर, तेल का दिया जलाकर अहोई माता का पूजन करें। जल के पात्र को रखकर उस पर स्वास्तिक बनाएं। मिट्टी की हांडी व बर्तन में खाने वाला सामान डालकर पूजा करें।

अहोई पूजन

यदि किसी स्त्री के बेटा हुआ हो या बेटे का विवाह हुआ हो तो अहोई व्रत की समाप्ति का उत्सव करें। एक थाली में सात जगह चार पूड़ी और थोड़ा-थोड़ा सीरा रखें। इसके अलावा एक साड़ी या सूट, एक ब्लाउज व कुछ पैसे थाली में रखकर और थाली के चारों ओर हाथ फेरकर, अपनी सासु जी के पैर छूकर उन्हें दे दें।

(साभार -साधनापथ)

 

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