इस विलक्षण भारतीय वास्तुशास्त्र के नियमों का पालन करने से घर में स्वास्थय, खुशहाली एवं समृद्धि को पूर्णत: सुनिश्चित किया जा सकता है। एक इन्जीनियर आपके लिए सुन्दर तथा मजबूत भवन का निर्माण तो कर सकता है, परन्तु उसमें निवास करने वालों के सुख और समृद्धि की गारंटी नहीं दे सकता.। लेकिन भारतीय वास्तुशास्त्र आपको इसकी पूरी गारंटी देता है।

पूर्व दिशा में दोष 

  • यदि भवन में पूर्व दिशा का स्थान ऊंचा हो, तो व्यक्ति का सारा जीवन आर्थिक अभावों, परेशानियों में ही व्यतीत होता रहेगा और उसकी सन्तान अस्वस्थ, कमजोर स्मरणशक्ति वाली, पढ़ाई-लिखाई में जी चुराने तथा पेट और यकृत के रोगों से पीड़ित रहेगी।
  • यदि पूर्व दिशा में रिक्त स्थान न हो और बरामदे की ढलान पश्चिम दिशा की ओर हो, तो परिवार के मुखिया को आंखों की बीमारी, स्नायु अथवा हृदय रोग की स्मस्या का सामना करना पड़ता है।
  • घर के पूर्वी भाग में कूड़ा-कर्कट, गन्दगी एवं पत्थर, मिट्टी इत्यादि के ढेर हों, तो गृहस्वामिनी को गर्भहानि का सामना करना पड़ता है।
  • भवन के पश्चिम में नीचा या रिक्त स्थान हो, तो गृहस्वामी यकृत, गले, गाल ब्लैडर इत्यादि किसी बीमारी से परिवार को मंझधार में ही छोड़कर पीड़ित होकर अल्पावस्था में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।
  • यदि पूर्व की दिवार पश्चिम दिशा की दिवार से अधिक ऊंची हो, तो संतान हानि का सामना करना पड़ता है।
  • अगर पूर्व दिशा में शौचालय का निर्माण किया जाए, तो घर की बहू-बेटियां अवश्य अस्वस्थ रहेंगी।

बचाव के उपाय

  • पूर्व दिशा में पानी, पानी की टंकी, नल, हैंडपम्प इत्यादि लगवाना शुभ रहेगा।
  • पूर्व दिशा का प्रतिनिधि ग्रह सूर्य है, जो कि कालपुरुष के मुख का प्रतीक है। इसके लिए पूर्वी दिवार पर ‘सूर्य यन्त्र’ स्थापित करें और छत पर इस दिशा में लाल रंग का ध्वज(झंडा) लगायें।
  • पूर्वी भाग को नीचा और साफ-सुथरा व खाली रखने से घर के लोग स्वस्थ रहेंगे। धन और वंश की वृद्धि होगी तथा समाज में मान-प्रतिष्ठा बढ़ेगी।

पश्चिम दिशा में दोष 

पश्चिम दिशा का प्रतिनिधि ग्रह शनि है। यह स्थान कालपुरुष का पेट, गुप्तांग एवं प्रजनन अंग है।

  • यदि पश्चिम भाग के चबूतरे नीचे हों, तो परिवार में फेफड़े, मुख, छाती और चमड़ी इत्यादि के रोगों का सामना करना पड़ता है।
  • यदि भवन का पश्चिमी भाग नीचा होगा, तो (पुरुष) संतान की बीमारी पर धन का व्यय होता रहेगा।
  • यदि घर के पश्चिम भाग का जल या वर्षा का जल पश्चिम से बहकर, बाहर जाए तो परिवार के पुरुष सदस्यों को लम्बी बिमारियों का शिकार होना पड़ेगा।
  • यदि भवन का मुख्य द्वार पश्चिम दिशा की ओर हो, तो अकारण व्यर्थ में धन का अपव्यय होता रहेगा।
  • यदि पश्चिम दिशा की दिवार में दरारें आ जायें, तो गृहस्वामी के गुप्तांग में अवश्य कोई बीमारी होगी।
  • यदि पश्चिम दिशा में रसोईघर अथवा अन्य किसी प्रकार से अग्नि का स्थान हो, तो पारिवारिक सदस्यों को गर्मी, पित्त और फोड़े-ऌफुन्सी, मस्से इत्यादि की शिकायत रहेगी।

बचाव के उपाय

  • ऐसी स्थिति में पश्चिमी दीवार पर ‘वरुण यन्त्र’ स्थापित करें।
  • परिवार का मुखिया न्यूनतम 11 शनिवार लगातार उपवास रखें और गरीबों में काले चने वितरित करें।
  • पश्चिम की दीवार को थोड़ा ऊंचा रखें और इस दिशा में ढाल न रखें।
  • पश्चिम दिशा में अशोक का एक वृक्ष लगायें।

उत्तर दिशा में दोष 

उत्तर दिशा का प्रतिनिधि ग्रह बुध है और भारतीय वास्तुशास्त्र में इस दिशा को कालपुरुष का हृदय स्थल माना जाता है। जन्मकुंडली का चतुर्थ सुख भाव इसका कारक स्थान है।

  • यदि उत्तर दिशा ऊंची हो और उसमें चबूतरे बने हों, तो घर में गुर्दे का रोग, कान का रोग, रक्त संबंधी बिमारियां, थकावट, आलस, घुटने इत्यादि की बिमारियां बनी रहेंगी।
  • यदि उत्तर दिशा अधिक उन्नत हो, तो परिवार की स्त्रियों को रुग्णता का शिकार होना पड़ता है।

बचाव के उपाय

यदि उत्तर दिशा की ओर बरामदे की ढाल रखी जाये, तो पारिवारिक सदस्यों विशेषतय: स्त्रियों का स्वास्थय उत्तम रहेगा। रोग-बीमारी पर अनावश्यक व्यय से बचे रहेंगें और उस परिवार में किसी को भी अकाल मृत्यु का सामना नहीं करना पड़ेगा।

  • इस दिशा में दोष होने पर घर के पूजास्थल में ‘बुध यन्त्र’ स्थापित करें।
  • परिवार का मुखिया 21 बुधवार लगातार उपवास रखे।
  • भवन के प्रवेश द्वार पर संगीतमय घंटियां लगायें।
  • उत्तर दिशा की दिवार पर हल्का हरा (parrot Green) रंग करवायें।

दक्षिण दिशा में दोष 

दक्षिण दिशा का प्रतिनिधि ग्रह मंगल है, जो कि कालपुरुष के बायें सीने, फेफड़े और गुर्दे का प्रतिनिधित्व करता है। जन्मकुंडली का दशम भाव इस दिशा का कारक स्थान होता है।

  • यदि घर की दक्षिण दिशा में कुआं, दरार, कचरा, कूड़ादान, कोई पुराना सामान इत्यादि हो, तो गृहस्वामी को हृदय रोग, जोड़ों का दर्द, खून की कमी, पीलिया, आंखों की बीमारी, कोलेस्ट्रॉल बढ़ जाना अथवा हाजमें की खराबी अन्य विभिन्न प्रकार के रोगों का सामना करना पड़ता है।
  • दक्षिण दिशा में उत्तरी दिशा से कम ऊंचा चबूतरा बनाया गया हो, तो परिवार की स्त्रियों को घबराहट, बेचैनी, ब्लडप्रैशर, मूर्च्छाजन्य रोगों से पीड़ा का कष्ट भोगना पड़ता है।
  • यदि दक्षिणी भाग नीचा हो, ओर उत्तर में अधिक रिक्त स्थान हो, तो परिवार के वृद्धजन सदैव अस्वस्थ रहेंगे। उन्हें उच्च रक्तचाप, पाचनक्रिया की गड़बड़ी, खून की कमी, अचानक मृत्यु अथवा दुर्घटना का शिकार होना पड़ेगा। दक्षिण पिशाच का निवास है, इसलिए इस तरफ थोड़ी जगह खाली छोड़कर ही भवन का निर्माण करवाना चाहिए।
  • यदि किसी का घर दक्षिणमुखी हो ओर प्रवेश द्वार नैऋत्याभिमुख बनवा लिया जाए, तो ऐसा भवन दीर्घ व्याधियां एवं किसी पारिवारिक सदस्य को अकाल मृत्यु देने वाला होता है।

बचाव के उपाय

  • यदि दक्षिणी भाग ऊंचा हो, तो घर-परिवार के सभी सदस्य पूर्णत: स्वस्थ एवं संपन्नता प्राप्त करेंगे। इस दिशा में किसी प्रकार का वास्तुजन्य दोष होने की स्थिति में छत पर लाल रक्तिम रंग का एक ध्वज अवश्य लगायें।
  • घर के पूजनस्थल में ‘श्री हनुमंतयन्त्र’ स्थापित करें।
  • दक्षिणमुखी द्वार पर एक ताम्र धातु का ‘मंगलयन्त्र’ लगायें।
  • प्रवेशद्वार के अन्दर-बाहर दोनों तरफ दक्षिणावर्ती सूंड़ वाले गणपति जी की लघु प्रतिमा लगायें। 

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