हनुमान

भगवान श्रीराम के परम भक्त और सभी कष्टों को हरने वाले अपार सिद्धियों से परिपूर्ण Hanuman जी अपने भक्तों की हर मनोकामना को पूर्ण करते हैं। अष्टसिद्धि नव निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता।। श्री हनुमान चालीसा की इस चौपाई में तुलसीदास हनुमान को अष्टसिद्धियों के दाता बताते हैं। आइए जानते हैं, वो ऐसी कौन सी अष्ट सिद्धियां है, जो हनुमान जी के पास हैं। इस चौपाई में किए गए वर्णन के आधार पर उन्हें ये अष्ट सिद्धियां और किसी से नहीं बल्कि माता सीता के आर्शीवाद से ही प्राप्त हुई हैं।

अणिमा: इस सिद्धि के हिसाब से शरीर को बेहद छोटा किया जा सकता है और इसका जिक्र कई बार पुराणों में हमें मिलता है। जब शक्तिशाली श्री हनुमान ने अपने भक्तों को संकटों से बाहर निकालने के लिए अपने शरीर के आकार को बदला। 

महिमा: इस सिद्धि में अपने शारीरिक आकार को बढ़ाया जा सकता है। अपने भक्तों के दुखों को हरने के लिए उन्होंने कई बार इस सिद्धि का भी प्रयोग किया। इस सिद्धि की खासियत ये है कि इस सिद्धि को प्राप्त करने वाला साधक इतना क्षमतावान हो जाता है कि अगर वो चाहे तो अपनी सिद्धि के ज़रिए प्रकृति का भी विस्तार कर सकता है।

लघिमा: ये वो सिद्धि कहलाती है, जिसमें शरीर का न केवल आकार बदलकर छोटा हो जाता है बल्कि हल्का भी हो जाता है। इस सिद्धि की प्राप्ति के बाद साधक इस पूरी सृष्टि में विद्यमान किसी भी वस्तु को अपने समीप ला सकता है और खुद भी किसी वस्तु के पास जा सकता है। इसके अलावा साधक किसी भी वस्तु में अपनी इच्छानुसार बदलाव भी करने की क्षमता रखता है।

गरिमा:  इस सिद्धि को हासिल करने के बाद कोई भी साधक अपने शरीर को बढ़ाने की क्षमता रखता है। इसके हिसाब से व्यक्ति अपने वजन को इस हद तक बढ़ा सकता है। ठीक वैसे ही जैसे भीम जैसा महाशक्तिशाली और बलवान योद्धा Hanuman जी की पूछ को हिलाने में नाकामयाब साबित हुआ था। अध्यात्म के नज़रिए से देखें तो इस सिद्धि के जरिए आप खुद को अंहकार से भी दूर रख सकते हैं।

प्राप्ति:  इसके नाम में ही इस सिद्धि का भावार्थ निहित है। इसको हासिल करने के बाद कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छाशक्ति से अपने मन मुताबिक चीजों को पाने में सफल साबित होती हैं। इस शक्ति के ज़रिए आप असंभव को भी संभव बना सकती हैं।

प्राकाम्य:  इस सिद्धि का मकसद लक्ष्य की सफलता है। इसको पाने के बाद व्यक्ति लक्ष्य प्राप्ति में सफल होता है और ये शक्ति मनोकामना पूर्ति में भी सहायक सिद्ध होती हैं। साधक चाहे तो आसमान में परिंदों की तरह उड़ सकता है और चाहे तो नीर पर चल भी सकता है।

वशित्व: यानि अपना जीवन और मृत्यु वश में करने की सिद्धि को कहते हैं। इस सिद्धि की प्राप्ति के बाद साधक किसी भी वस्तु को आसानी से अपने वश में कर सकता है।

ईशित्व:  यानि किसी भी चीज को अपने वश में करना अर्थात इस सिद्धि की प्राप्ति के बाद इंसान किसी भी जगह और किसी भी वस्तु पर अपना अधिकार स्थापित कर सकता है।

हनुमान जी को इन सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो चुकी थी और वो अपने भक्तों की रक्षा और अपने कर्तव्य की पूर्ति के लिए इन सिद्धियों का प्रयोग भी करते थे। संकटमोचन विभिन्न चमत्कारों और अपने कार्योंं से सभी विपत्तियों को दूर कर देते थे। माता सीता ने हनुमान जी से प्रसन्न होकर उन्हें आठ सिद्धियों का ये वरदान दिया था। ऐसी मान्यता है कि यदि कोई भी हनुमान भक्त सच्चे मन और पूरी लगन से उनकी भक्ति में लीन हो जाता है, तो वे भी इन आठ सिद्धियों को हासिल कर सकता है। 

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