इसका निर्माण कार्य 10 अक्टूबर, 1864 में प्रारंभ किया गया और 26 मई, 1865 के मंगलमयी प्रभात में भगवान ऋषभदेव (भगवान आदिनाथ) की प्रतिमा मंदिर की मध्य वेदी में स्थापित की गई। यह कार्य मूर्धन्य विद्वान पंडित सदासुखदास जी की देखरेख में हुआ।

इस मंदिर का नाम श्री सिद्धकूट चैत्यालय है। करौली के लाल पत्थर से निर्मित होने के कारण इसे लाल मंदिर तथा निर्माताओं के नाम से संबंधित होने से सेठ मूलचन्द सोनी की नसियां या सोनी मंदिर भी कहते हैं।

इस मंदिर में अयोध्या नगरी सुमेरु पर्वत आदि की जो रचना है वह सोने से मढ़ी हुई है। भवन में अत्यन्त आकर्षक चित्रकारी है जो जैन शास्त्रों में वर्णित लोक तथा संसार में जीव की अवस्था का दिग्दर्शन कराती है।

मुख्य मंदिर

मुख्य मंदिर के प्रांगण में तीन वेदियां हैं जिसमें तीर्थंकरों की प्रतिमाएं विराजमान हैं। मध्य वेदी में भगवान ऋषभदेव की विशाल प्रतिमा है। यह भगवान के समवशरण का दिग्दर्शन है। इस अवस्था में भगवान संसार के दुखी जीवों के लिए जन्म-मृत्यु के नाश करने वाले सच्चे धर्म का उपदेश देते हैं। इस भाग में केवल जैनियों को धार्मिक आराधना संपन्न करने की अनुमति है।

मानस्तम्भ

इस ऐतिहासिक मंदिर में प्रवेश करते ही अत्यन्त कलात्मक बयासी (82) फीट ऊंचे मानस्तम्भ के दर्शन होते हैं। रायबहादुर सेठ टीकमचन्द सोनी ने इसकी नींव लगाई तथा रायबहादुर सर सेठ भागचन्द सोनी ने इसका निर्माण पूर्ण किया। उन्होंने अपने सुपुत्रों प्रभाचन्द, निर्मलचन्द, व सुशीलचन्द सहित जून सन् 1953 में बड़े समारोह के साथ इसकी प्रतिष्ठा व प्रतिमा स्थापना की। दस दिन तक बड़ा उत्सव हुआ जिसमें सोनी परिवार के साथ अन्य हजारों भक्तों ने भाग लिया। सारे मंदिर की सजावट विद्युत दीपों द्वारा की गई।

सुमेरु पर्वत

सुमेरु पर्वत जम्बूद्वीप के मध्य में स्थित है। स्वर्णिम नगरी प्रतिमा स्थापन के 5 वर्ष बाद सेठ मूलचन्द सोनी की भावना हुई कि जैन शास्त्रों में वर्णित भगवान ऋषभदेव के पांच कल्याणकों का मूर्त रूप से दृश्यांकन किया जाए। इस अयोध्या नगरी सुमेरु पर्वत आदि की रचना का निर्माण कार्य जयपुर में हुआ और इसके बनने में 25 वर्ष लगे। समस्त रचना आचार्य जिनसेन द्वारा रचित आदि पुराण के आधार पर बनाई गई हैं तथा सोने के वर्कों से ढकी हुई है।

 

कार्य पूरा होने पर सन् 1895 में जयपुर में दस दिन तक विशाल मेला लगा और रचना का प्रदर्शन म्यूजियम हॉल में हुआ। तत्कालीन जयपुर नरेश महाराजा माधो सिंह जी इसमें स्वयं पधारे। इस रचना को मंदिर के पीछे निर्मित विशाल भवन में सन् 1895 में स्थापित किया गया। भवन के अंदर का भाग बहुत सुंदर रंगों, अनुपम चित्रकारी एवं कांच की कला से सज्जित है। यह रचना जनसाधारण के लिए खुली है।

पंचकल्याणक

माता के गर्भ में आने से छह माह पूर्व से ही तीर्थंकर की महिमा को देवगण प्रसारित करते हैं। इन्द्र की आज्ञा से भावी तीर्थंकर के पिता महाराज नाभिराज के महल में कुबेर ने रत्नों की वृष्टि की और माता के गर्भ में संसार के उद्धारक के आगमन की सूचना दी। देवों ने प्रथम स्वर्ग के इन्द्र सौधर्म की आज्ञा से अयोध्या नगरी की स्वर्णमयी रचना की। दिव्यात्मा के गर्भ में आने से पहले माता मरुदेवी ने रात्रि में 16 स्वप्न देखे, जिनके फलानुसार उनके गर्भ में भावी तीर्थंकर का अवतरण हुआ।

नीलांजना का नृत्य

इंद्र ने महाराज ऋषभदेव के दरबार में अप्सरा नीलांजना का नृत्य आयोजित किया नृत्य के बीच में नीलांजना की आयु पूर्ण हो गई जिसे देखकर ऋषभदेव को संसार की असारता का ज्ञान हुआ और उन्होंने संसार को त्यागने का निश्चय किया। अपने ज्येष्ठï पुत्र भरत को राज्य सौंपकर वे 4000 राजाओं सहित वन की ओर प्रस्थान कर गए। इंद्र व अन्य देवों ने ऋषभदेव को पालकी में बैठाकर गंगा यमुना और सरस्वती के संगम (प्रयाग) की ओर प्रस्थान किया। वहां अक्षयवट के नीचे ऋषभदेव सब वस्त्राभूषण त्याग कर दिगम्बर मुनि बन गए। वट वृक्ष के नीचे मुनि ऋषभदेव ने केशलौंच किया जो उनके संसार व शरीर से अत्यंत निस्पृहता का परिचायक है।

जन्म कल्याणक

तीर्थंकर ऋषभदेव के जन्म के समय इंद्रलोक के आसन कंपायमान हुए जिससे तीर्थंकर के जन्म की सूचना मिली। उस समय क्षणभर के लिए नरक के जीवों को भी शांति मिली। इंद्र व देवगण बड़े उत्साह से नगर की ओर चले और नगर की तीन प्रदक्षिणा देकर बालक ऋषभदेव को ऐरावत हाथी पर सुमेरु पर्वत ले गए। वहां पांडुकशिला पर बालक ऋषभदेव का अभिषेक 1008 विशाल कलशों द्वारा क्षीर सागर के जल से किया गया।

 

अयोध्या का रा

अभिषेक के बाद इंद्र बालक ऋषभदेव को उनके पिता को सौंपकर वापस चले गए तथा ऋषभदेव के साथ खेलने के लिए बालक देवताओं को छोड़ गए। ऋषभदेव युवा होकर अयोध्या का राज्य ग्रहण करते हैं तथा लंबे काल तक भोगोपभोग में मग्न हो जाते हैं।

ध्यानस्थ ऋषभदेव

एक वर्ष की तपस्या के बाद मुनि ऋषभदेव का प्रथम आहार हुआ। हस्तिनापुर के राजा श्रेयांस बड़े भाग्यशाली पुरुष थे जिन्होंने उनको वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन इक्षुरस का प्रथम आहार दिया। इसे हम आज भी अक्षय तृतीया पर्व के नाम से मनाते हैं।

ज्ञान की प्राप्ति

1000 वर्ष की तपस्या के उपरांत मुनि ऋषभदेव को कैलाश पर्वत पर केवलज्ञान की प्राप्ति हुई और उन्होंने धर्मोपदेश दिया। इंद्र ने इनके लिए एक सुंदर सभा की रचना की जिसे समवशरण कहते हैं। यहां देव, मनुष्य तथा तिर्यंच सभी तीर्थंकर का उपदेश सुनने के लिए एकत्रित हुए। जैन शास्त्रों के अनुसार केवल ज्ञान के उपरांत तीर्थंकरों का आकाश में गमन होता है। उनके विहार के समय इंद्र उनके चरणों के नीचे 225 स्वर्ण कमलों की रचना करते हैं।

मोक्ष कल्याणक

भगवान ऋषभदेव ने कैलाश पर्वत से निर्वाण प्राप्त किया। उनके पुत्र भरत (इस युग के प्रथम चक्रवर्ती) ने कैलाश पर्वत पर 72 स्वर्णिम मंदिरों का निर्माण कराया।

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