मां से हम बिना डर के कुछ भी मांग सकते हैं। मां के हृदय में संतान के प्रति वात्सल्य होता है, करुणा होती है। वह भूल क्षमा करने वाली होती है। अत: ऋषियों ने उस श्री देवता की, मां को रूप में आराधना की। श्री देवता को मां का रूप कैसे मिला? शतपथ में इस संबंध में एक रूपक है। प्रजापति तप कर रहे थे। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उनके हृदय से श्री देवता नारी रूप लेकर उनके सामने प्रकट हुए। अर्थात् वैदिक काल से प्रजापति के काल तक आते-आते श्री देवता ने देवी का रूप धारण कर लिया। श्री देवता से श्री देवी का रूप धारण करने वाले इस देवता का आज हम लक्ष्मी रूप में पूजा, साधना व आराधना करते हैं। वैदिक ऋषियों ने भूतधात्री, सर्वसहा, आदि जननी, महालक्ष्मी, करुणामयी, आत्यंतिका प्रेम वाली, दुख-दारिद्रय व दैत्य का नाश करने वाली, जीवन बनाने वाली, जीवन खिलाने वाली, जीवन को आकार देने वाली आदि शक्ति को लक्ष्मी अथवा श्री कहकर उनकी अपार महिमा गाई गई है। लक्ष्मी को केवल मां कहकर पुकारने से हम उनके बालक नहीं बन जाएंगे। बालक बनने के आदर्श श्री सूक्त में चित्रित हैं।

गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमैका भवानि, विवादे विषादे प्रवासे प्रमादे।
जले चाल नले पर्वते शत्रुमध्ये, अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि।
गतिस्त्वं…
अर्थात् विवाद में विषाद में प्रमाद में, जल में, अग्नि में, पर्वत पर, शत्रु के बीच में, वन में, शरण में आने पर हे मां! सदा मेरी रक्षा करना, तू ही मेरी एकमात्र गति है। हमारे आसपास लक्ष्मी सदैव ही विद्यमान हैं किंतु हम अपनी भूल, तामझाम, असंयमित जीवनचर्या, रागद्वेष, प्रलोभन आदि दुर्गुणों के कारण उन्हें प्राप्त करने के बावजूद खो देते हैं।
तंत्र-मंत्र, संस्कार, संस्कृति आदि भारत की अमूल्य धरोहर हैं। मंत्र से यदि विषधर भुजंग को वश में किया जा सकता है तो देवता, गंधर्व, यक्ष और अपरा शक्तियों को क्यों नहीं प्राप्त किया जा सकता है। इसका मुख्य कारण यही है कि हम उस वस्तु के धरातल व रास्ते से अनभिज्ञ हैं।
प्राचीन काल में भी श्री की अनभिज्ञता संबंधी एक दृष्टांत आता है। महर्षि दुर्वासा की एक छोटी सी भूल ने श्री को शापित करने की धृष्टता कर डाली थी जिससे लक्ष्मी अर्थात् श्री कुछ समय के लिए खो गई थीं।

महत्व 

लक्ष्मी प्राप्ति जीवन का एक आवश्यक लक्ष्य है। लक्ष्मी की आठ  सिद्धियों आठ दिशाओं में होती हैं। संसार श्री हरि से प्रेम करता है गूढ़ विज्ञान मां और लक्ष्मी जी हरिप्रिया हैं। लक्ष्मी कभी स्थिर नहीं रहतीं। कबीर ने कहा भी है,

कमला थिरु न रहीम कहि, यह जानत सब कोय।

पुरुष पुरातन की वधू, क्यों न चंचला होय॥

लक्ष्मी बनी रहे इसके लिए हम श्रीयंत्र की साधना व पूजा करते हैं। तंत्र के प्रसिद्ध ग्रंथ यामल में लिखा है चक्र त्रिपुर सुन्दर्या ब्रह्माण्डाकारी  भीश्वरि, अर्थात् ईश्वरी त्रिपुर सुंदरी का आधार ब्रह्माडाकार ही उत्पत्ति का विकास चक्र हुआ, जिसका हमारे ऋषियों ने समाज के हित के लिए सरलीकरण किया। सभी दैवीय एवं आसुरी शक्तियां मंत्रों के अधीन कर दीं।
श्री सूक्त मां लक्ष्मी की प्रसन्नता की स्तुति है। लक्ष्मी का एक नाम श्री भी है। श्री अत्यंत प्राचीन है। वैदिक काल में शोभा, सुंदरता, सजावट के अर्थ में श्री शब्द का प्रयोग होता था। श्री एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण शब्द है। पुरुष के नाम के पूर्व श्री शब्द इसलिए लगाया जाता है कि वह श्री से, लक्ष्मी से संपन्न हो अन्यथा वह श्री विहीन होगा, लक्ष्मी विहीन होगा। यही वैदिक श्री देवता था। उस काल में मूर्ति नहीं होती थी। वह केवल भावात्मक देवता था। धीरे-धीरे इसे मूर्ति का रूप दिया जाने लगा।

कैसे करें श्री यंत्र का निर्माण?
चार कंठ पांच शिव युवती के मेल से नौ रेखाएं बनती हैं, जिसे मूल प्रकृति कहते हैं। इन रेखाओं को एक दूसरे मिलाने पर 43 कोण बनते हैं। चार श्री कंठ, मध्य में चतुर्भुज वाले चार कोण, चौरस यंत्र वाला शक्ति मंत्र, पार्वती, माहेश्वरी, रुद्राणी, सती, उमा। उसके ऊपर प्रथम वलय कुंडलावाकार बनाकर उस पर 9 दल निर्मित करें। उसमें भगवान शंकर की नौ शक्तियां अर्थात् शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कालरात्रि महागौरी और सिद्धिदात्री आदि मूल नौ प्रकृतियां रखें। पुन: द्वितीय वलय कुंडलाकार बनाकर उस पर अष्टदल वाला कोण बनाएं। अनंग कुसुमा, अनंग मेखला, अनंग मंदना, अनंग मानाकुश, अनंग रेखा, अनंग वेगनी, अनंग क्रशा, अनंग भातिनि, आदि की स्थापना कर तीसरा वलय कुंडलाकर बनाकर 16 (षोडशदल) बनाएं। उसमें श्री लक्ष्मी, कमला, पद्मा, पद्मिनी, कमलालया, रमा, वृषाकयी, धान्या, पृथ्वी, यज्ञा, इंदिरा, ऊषा, माया, गिरा, राधा आदि 16 देवियों की स्थापना करें। अब रेखाकृत चार भंर्गुर निर्मित करें। इस प्रकार 43 कोण वाले महालक्ष्मी के आसन वाले श्रीयंत्र का निर्माण होता है।
बिंदु शिवरूप है। देवी का प्रथम आसन 1, 4, 5, 9, 16, 43 दल का कोण बन जाता है। तीनों क और दो ह ये काम शैव भाग हैं। शेष अक्षर ई, ई, ल, स, ल शक्ति के भाग हैं। योनि हृीं शुरू और अंत का हृीं शक्ति वाचक है। अंतिम हृीं शैव का भाग है। शैव काम  के चार चक्र दक्षिणवर्ती, शक्ति के पांच चक्र वामवर्ती, कुल नौ चक्र वामवर्ती इस प्रकार शैव शक्ति सहित महालक्ष्मी श्रीयंत्र का निर्माण करें। अब रक्त चंदन के अंगुष्ठ भाग मात्र दो हाथी, जो पुष्य नक्षत्र में निर्मित हों, महालक्ष्मी रूपी श्रीयन्त्र के पास रखकर प्राण प्रतिष्ठा करें। प्राण प्रतिष्ठा का मंत्र निम्नानुसार है’
अस्य लक्ष्मी चक्रस्य श्री भगवान महादेव, ऋषि दुर्वासा
छंद:, आद्याशक्ति त्रिमूत मध्ये, क्लीं कीलक: श्री कामकला प्राण प्राण प्रतिष्ठा जपे विनियोग:।

 

इस प्रकार श्रीयंत्र की प्राण प्रतिष्ठा करें।
श्रीयंत्र से संबंधित कथा एक पौराणिक कथा के अनुसार एक बार लक्ष्मी जी अप्रसन्न होकर बैकुंठ धाम चली गईं। इससे पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार की समस्याएं उत्पन्न होने लगीं। समस्त मानव जाति लक्ष्मी के अभाव में दीनहीन व दुखी होकर इधर-उधर फिरने लगी। तब वशिष्ठ मुनि ने लक्ष्मी को वापस लाने का निश्चय किया और तत्काल बैकुंठ धाम जाकर लक्ष्मी से मिले। लक्ष्मी जी अप्रसन्न थीं और किसी भी स्थिति में पृथ्वी पर आने को तैयार नहीं थीं। तब वशिष्ठ जी वहीं बैठकर आदि अनादि और अनंत भगवान श्री विष्णु जी की आराधना करने लगे। तब श्री विष्णु जी प्रसन्न होकर प्रकट हुए तब विशिष्ठ जी ने उनसे कहा, प्रभु, श्री लक्ष्मी के अभाव में हम सब पृथ्वीवासी पीडि़त हैं। आश्रम उजड़ गए, वणिक वर्ग दुखी है, सारे व्यवसाय तहस-नहस हो गए हैं। सबके मुख मुरझा गए हैं। आशा निराशा में बदल गई तथा जीवन के प्रति मोह समाप्त हो गया है। तब श्री विष्णु जी वशिष्ठ जी को लेकर लक्ष्मी जी के पास गए और उन्हें मनाने लगे, परंतु वे भी लक्ष्मी जी को मनाने में सफल नहीं हो सके। रूठी लक्ष्मी ने दृढ़तापूर्वक कहा कि मैं किसी भी स्थिति में पृथ्वी पर जाने को तैयार नहीं हूं। उदास मन के साथ वशिष्ठ जी पुन: पृथ्वी लोक में लौट आए और अपने प्रयास व लक्ष्मी जी के निर्णय से सबको अवगत करा दिया।
सभी अत्यंत दुखी हुए। कुछ सोचकर देवगुरु बृहस्पति जी ने कहा कि अब तो मात्र एक ही उपाय है और वह है श्रीयंत्र की साधना। यदि श्रीयंत्र को स्थापित कर, प्राण-प्रतिष्ठा करके पूजा की जाए तो लक्ष्मी जी को अवश्य ही आना पड़ेगा। गुरु बृहस्पति की बात से ऋषि व महॢषयों में आशा का संचार हुआ। उन्होंने बृहस्पति जी के निर्देशन में श्रीयंत्र का निर्माण किया और उसकी सिद्धि एवं प्राण-प्रतिष्ठा कर दीपावली से दो दिन पूर्व अर्थात् धनतेरस को स्थापित कर उसका षोडशोपचार से पूजन किया। पूजा समाप्त होते-होते ही लक्ष्मी जी वहां उपस्थित हो गईं। लक्ष्मी ने कहा कि मैं किसी भी स्थिति में यहां आने को तैयार नहीं थी, परन्तु आपने जो प्रयोग किया, उसके प्रभाव से मुझे आना ही पड़ा। श्रीयंत्र तो मेरा आधार है, इसमें मेरी आत्मा वास करती है। दरअसल, यह सही भी है, इसीलिए श्रीयंत्र को सभी यंत्रों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। श्रीयंत्र से संबंधित पूजा स्थल यद्यपि यह संपूर्ण विश्व ही भगवती त्रिपुर सुंदरी का निवास है फिर भी स्थूल दृष्टि से उनके कुछ प्रमुख स्थानों का विवरण यहां प्रस्तुत है।
श्री विंध्यवासिनी क्षेत्र में अष्टभुजा के मंदिर के पास भैरव कुंड नामक स्थान है। यहां एक खंडहर में विशादकार श्रीयंत्र रखा हुआ है। एक अन्य श्रीयंत्र फर्रुखाबाद जनपद के तिरवा नामक स्थान पर है। वहां एक विशाल मंदिर है, जिसे माता अन्नपूर्णा का मंदिर कहा जाता है। लेकिन वास्तव में वह त्रिपुरा का मंदिर है। यहां एक ऊंचे से चबूतरे पर संगमरमर पत्थर पर बहुत बड़ा श्रीयंत्र बना हुआ है और उसके केंद्र बिंदु पर पाशाकुंश एंव धनुर्बाण से युक्त भगवती की बहुत ही सुंदर चतुर्भुजी प्रतिमा है। इस मंदिर का निर्माण राजा तिरवा ने लगभग सवा सौ वर्ष पूर्व किसी तांत्रिक महात्मा के निर्देशानुसार कराया था। यह स्थान 51 शक्तिपीठों में से एक है। इसी प्रकार महराष्ट्र में मोखी नगर में भगवती का विशाल मंदिर है, जहां बहुत ही सुंदर श्रीयंत्र बना हुआ है। इस मंदिर को कामेश्वराश्रम के नाम से जाना जाता है। इसी प्रकार जबलपुर के पास परम पूज्य गुरुदेव जगद गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वदी ने भी सुरम्य वनाच्छादित प्रदेश में परमहंसी गंगा आश्रम की स्थापना की थी जहां मंदिर की ऊंचाई लगभग 218 फुट हैं और उसके गर्भ गृह में भगवती राजराजेश्वरी त्रिपुरसुंदरी की पांच फुट ऊंची दिव्य एवं मनोहर प्रतिमा है। यह मंदिर दक्षिण भारतीय वास्तुकला की अनुपम कृति है, जो मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर जिले के झोटेश्वर नामक स्थान पर है। इनके अतिरिक्त कुछ अन्य सुरम्य स्थलों पर भी भगवती त्रिपुरसुंदरी के पीठ स्थापित हैं, जिनमें वाराणसी मे केदारघाट पर श्रीविद्या मठ, पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में कोन्नगर स्थान पर राजराजेश्वरी सेवा मठ, मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में मोहनगढ़ में राजराजेश्वरी मंदिर, कोलकाता के श्रीरामपुर में श्रीमाता कामकामेश्वरी मंदिर और जनपद मेरठ के सम्राट पैलेस स्थान पर भगवती राजराजेश्वरी मंदिर प्रमुख हैं।