चाहे साल की शुरुआत का जश्न हो या उसके कुछ दिन बाद वैलेंटाइंस डे पर दिल में भरे प्यार के ख़ुमार के साथ सड़कों पर उमड़ती नौजवानों की भीड़। पार्क, मॉल, रेस्टोरेंट्स, जहां देखो, हर जगह आज यही नज़र आते हैं, लेकिन क्या इसे भीड़ कहना सही होगा? नहीं, शायद नहीं। इसकी वजह ये है कि ‘भीड़’ शब्द ने अपना पर्याय ‘तमाशबीन’ को बना लिया है, जो हर मौके पर सिर्फ़ तमाशा देखने के लिए इक्ट्ठा हो जाते हैं और फिर जैसे ही बात जि़म्मेदारी लेने की आती है, तितर-बितर हो जाते हैं।

इस बनी-बनाई श़क्ल से कुछ अलग सा है इस यंग ब्रिगेड का चेहरा। बात-बात पर जोश में आते, बहस करते, क़हक़हे लगाते, मौज-मस्ती में लापरवाह से दिखते और अक्सर पारंपरिक तौर-तरीके की धज्जियां उड़ाते, प्यार और गुस्से का खुलेआम इज़हार करते इन यंगस्टर्स के बारे में एक आम धारणा ये बनी हुई है कि ये लापरवाह हैं। इनमें अनुशासन या परंपराओं के प्रति सम्मान का कोई भाव नहीं है। इनका सारा सच सिर्फ मौज-मस्ती है। ये जि़म्मेदारियों के प्रति गंभीर नहीं होते। जहां तक भावनाओं की बात है तो ये इनमें पल-पल बदलती हैं।

प्यार, फ़र्ज जैसे शब्द इनके लिए मायने ही नहीं रखते। ये बाज़ार के लिए सजते हैं और बाज़ार इनके लिए वगैरह-वगैरह। दरअसल ये तस्वीर का अधूरा पहलू है। आज के युवा काफी प्रैक्टिकल हैं। वे किसी भी बात का बोझ लेकर नहीं चलना चाहते। भले ही उनका मिज़ाज मस्ती से भरा लगता हो हर समय, लेकिन जब जि़म्मेदारियों को गंभीरता से निभाने की बात आती है तो वे उसमें भी पीछे नहीं हैं। इन्हीं युवाओं के दम पर ही तो हमारे देश को ‘युवाओं का देश’ कहा जाता है। अक्सर इनसे बात करो तो साफ झलकता है कि किसी भी बात को लेकर ये या तो कमिटमेंट करने को तैयार नहीं होते और अगर कोई कमिटमेंट करते हैं तो उसे पूरा करने के लिए गंभीरतापूर्वक प्रयास  भी करते हैं।

जो बात इन्हें अलग करती है, वह ये कि चाहे घर-परिवार हो, सामाजिक दायित्व हो, नौकरी, शादी, किसी भी विषय को ये गंभीरता से लेने के बावजूद उसे जीने-मरने का सवाल नहीं बना लेते। अब वैलेंटाइंस डे को ही ले लीजिए। इस बार टीना तो अगली बार मीना टाइप मामला लगता है न? इनके पास उसकी वजह है। जि़ंदगी सभी को सिर्फ़ एक बार मिलती है और जीने देने के लिए होती है। उन रिश्ते-नातों का क्या अर्थ, जिनमें सिवाय दुख-तनाव के कुछ रह ही न गया हो।

रोते-धोते किसी भी रिश्ते को ये सिर्फ़ इसलिए नहीं निभाएंगे कि उसे सात जन्मों का बंधन माना जाता है। इनमें साफगोई भी बहुत है। चाहे अपना प्यार जताना हो या गुस्सा, ये जगह नहीं, जज़्बात देखते हैं। वैलेंटाइन डे पर घुटनों के बल झुके अपने प्यार का इज़हार करते ये युवा आज अपनी नॉलेज, डेडिकेशन, वर्क डिसिप्लेन, एक्सपेरिमेंटल नेचर जैसी खूबियों के चलते ही पूरी दुनिया में हमारे देश को एक नई पहचान दे रहे हैं। ये दिन-रात डूबकर मस्ती भी करते हैं और दिन-रात डूबकर वर्क कमिटमेंट भी पूरा करते हैं। बने-बनाए तौर-तरीकों के फॉलोअर ये नहीं हैं, लेकिन दुनिया बदलने का दम-खम और काबिलियत रखते हैं।

ये परंपरा के नाम पर कुछ भी थोपे जाने के घोर विरोधी हैं, लेकिन अपने परिवार के बुज़ुर्गों को मोबाइल के नए ऐप सिखाते, कंप्यूटर पर मनचाही चीज़ सर्च करना सिखाते भी इन्हें आराम से देखा जा सकता है। अगर कहें कि ये आज में कल को देखते हैं, कल में आज को नहीं तो गलत नहीं होगा, क्योंकि नया नज़ारा देखने के लिए पहले नज़रिया नया बनाना होगा। सो हम भी कह सकते हैं, थ्री चेयर्स फॉर यंग इंडिया।