कंचन अपनी चप्पल को घिसटते हुए स्कूल से वापस घर की तारीफ लौट रही थी और उस बड़े से मेले का दृश्य भी देखती जा रही थी जो पिछले दस दिनों से उस बड़े से मैदान में लगा हुआ था। कंचन के सहपाठी आगे निकल चुके थे। मगर वह अपनी आॅंखें बड़ी करके उस बैनर पर तारीख और समय देख रही थी। अभी मेला दो दिन और था। समय भी दोपहर बारह से रात्रि के बारह बजे तक। साथ ही उसकी नजर बरबस उन अमीर लोगों की तरफ भी टिक जाती थी जो मेले के निकासी द्वार से अपनी अपनी गाड़ियाें की तरफ चले जा रहे थे। सभी के हाथों में बड़े बड़े बैग थे।
कंचन की नजर कभी कभार उनकी बातों को भी झाॅंकना चाहती। कान सब कुछ सुन लेना चाहते तथा बातें कर रहे होगें। क्या कहते होंगे। वह सोच ही रही थी कि एक समूह हंसता खिलखिलाता उसी के पास से उस प्रवेश द्वार की तरफ जाता दिखाई दिया। उसमें महिलाएं थी। वे सब जोरों से बतिया रहीं थी कि वह मेले में फलां फलां ज्वैलरी सस्ती है। फलां फलां क्रीम बढ़िया है वगैरह, वगैरह । कंचन अब और उनकी बात सुन नहीं सकती थी क्योंकि वे सबकी सब आगे जाकर गेट से होती हुई मेले के भीतर जा चुकीं थी।
कंचन को एकाएक अहसास हुआ कि वह शायद काफी देर से यहीं खड़ी है क्योंकि सबसे देर से आने वाली कुछ सहपाठिनें भी आगे जा चुकी थी। कंचन ने मन ही मन अफसोस किया। काश! इससे भी सस्ता कोई मेला होता जहाॅं उसके मजदूर माता-पिता दस रूपये में उसको भी पूरा मेला ही दिखा लाते। यही सोचते वह अपनी झोंपड़ी तक पहुंच भी गयी। साथ ही अपने दिवास्वप्न से वापस भी लौट आयी।
