zakhmi rooh
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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

नोट-बंदी के सबब अवाम की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही थीं। शहर के सारिफीन (ग्राहक) बैंकों में जमा अपने एकाउंट से मतलूबा (वांछित) रकम निकालने के लिए जितने परेशान थे, उससे कहीं ज्यादा दिक्कत देहात में रहने वाले ना-ख्वाँदा अफराद (अशिक्षित लोगों) के सामने थी। राम दयाल का ताल्लुक भी गाँव से था। पुश्तैनी धंधा खेती-किसानी रिहाइश के लिए तीन कमरों और कुशादा सेहन पर मुश्तमिल घर था। गाँव में एक प्राइमरी स्कूल था। दर्जा पाँच तक की तालीम हासिल करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए शहर जाना था। शहर गाँव से चार किलोमीटर के फासले पर था। दादा ने लाडले पोते को अपनी नजरों से दूर करना गवारा नहीं किया। नतीजा ये हुआ कि पढ़ाई बीच में ही रुक गई।

राम दयाल आगे पढना चाहता था. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। गाँव में रहकर वो करता भी क्या? कुछ दिनों के बाद उसने भी बाप के साथ खेतों पर जाकर खेती-बाड़ी में हाथ बँटाना शुरू कर दिया। दस बीघा काश्त की जमीन थी। ट्रैक्टर नहीं होने की वजह से सब काम बैलों की मदद से करना पड़ता था। रफ्ता-रफ्ता खेतों में हल चलाने, पाटा देने, बीज बोने, पौधे निकलने पर सिंचाई करने, खर-पतवार निकालने, तैयार फसल काटने और गहाने वगैरह की तमामतर जिम्मेदारी राम दयाल के कंधों पर आ गई।

राम दयाल को जराअत (खेती-बाड़ी) से जुड़े दस बरस का अरसा गुजर चुका था। इसी दौरान ब्याह हो गया। ऊपरवाले की इनायत से घर के आँगन में एक के बाद एक कई फूल खिल गए। दो बेटे और तीन बेटियों की किलकारी और चहल-पहल से सूनी बगिया में बहार आ गई। वक्त जिस तेज चाल से आगे बढ़ रहा था. उससे कहीं तेज रफ्तार से बच्चे बडे हो रहे थे।

राम दयाल अपने फर्ज से लापरवाह नहीं था। उसकी नजरों के सामने एक-एक कर बच्चे जवान होते गए और वो अपनी जिम्मेदारी से सुबुकदोश (निवृत) होता गया। बच्चों के हाथ पीले करने का बोझ उतरने से वो काफी मुतमइन (संतुष्ट) था। राधा, सुलोचना और गीता अपनी-अपनी ससुराल में अहल-ए-खाना (घर-परिवार) के साथ आराम-ओ-सकन की जिंदगी बसर कर रही थीं। हालाँकि बेटे राजेश और नरेश भी हँसी-खुशी गृहस्थ जीवन गुजार रहे थे, लेकिन बच्चे होने के बावजूद दोनों माँ-बाप के साथ ही रहते थे। पूरा परिवार बंद मुट्ठी की तरह था। माँ-बाप के साथ खानदान में रहने का मजा ही कुछ और होता है। ये बात दोनों भाई अच्छी तरह जानते थे। तीनों बाप-बेटे आपसी सलाह-व-मश्वरे से मिलकर खेती-बाड़ी के काम को अंजाम दे रहे थे। खवातीन (महिलाएँ) घर का काम-काज मिल-जुलकर कर लेने में खशी महसस करती थीं।

राम दयाल अपनी उम्र का पछत्तरवाँ बसंत देख चुका था। हालाँकि गाँव में इस उम्र के और भी कई लोग मौजूद थे, लेकिन वो खेती-बाड़ी और रोजमर्रा के उमूमी (लोगों से मिलना-जुलना) काम-काज से कोसों दूर थे। राम दयाल अपनी उम्र के लोगों से कछ अलग था। बचपन और जवानी में इस्तेमाल किए घर के खालिस दूध-दही और देसी घी का असर चेहरे और बदन पर साफ दिखाई पड़ता था। यही वजह थी कि वो पीराना-साली (वृद्धावस्था) में भी काम-काज से जी नहीं चुराता था। थकान तो उसके पास फटकती नहीं थी। खेती में सिर खपानेवाले मेहनती बाप की तगो-दौ (अथक प्रयास) देखकर दोनों बेटे भी खेती-किसानी के काम से कभी मुँह नहीं मोड़ते थे।

राम दयाल काफी समझदार और संजीदा था। वो अपने खेतों में पैदा की जानेवाली गेहूँ, धान और गन्ने की फसल को तीन हिस्सों में तकसीम करता था। एक तिहाई हिस्से को अगली फसल के बीज, खाद और पानी के लिए मुखतस (अलग रखना) कर देता था। एक तिहाई अनाज को फरोख्त कर उससे हासिल होने वाली रकम को कस्बे की बैंक में जमा कर देता था, ताकि जरूरत के वक्त उसका आसानी से इस्तेमाल किया जा सके। बाकी बची एक-तिहाई पैदावार की रकम से अपने घर-परिवार का खर्च चलाता था। खाने-पीने और पहनने-ओढ़ने में ज्यादा कंजूसी नहीं करता था, लेकिन फुजूलखर्च भी नहीं था। बचत के हर मुमकिन तरीके को फौकियत (प्राथमिकता) दी जाती थी। किफायत-शआरी (मितव्ययिता) का बेहतरीन नतीजा भी उसके सामने मौजूद था।

राम दयाल के पास हर वक्त दूसरे किसानों के मुकाबले ज्यादा रुपए जमा रहते थे। कई बार गाँव के लोग अपनी छोटी-मोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए उसके घर का रुख करते थे। भलामानस किसी भी जरूरतमंद को मायूस नहीं करता था। सवाली का ताल्लुक किसी भी जात-ओ-मजहब से हो, वो बगैर किसी तफावुत (विभेद) के हर एक की हत्तलइम्कान (यथासंभव) मदद करना अपना फर्ज-ए-अव्वलीन (पहला कर्तव्य) समझता था।

दरअसल, राम दयाल में ये सारी खूबियाँ अपने बचपन के दोस्त फजलर्रहमान से आई थीं। फजलर्रहमान का ताल्लक तालीम याफ्ता (शिक्षित), मुतमव्विल (धनाढ्य) और जमींदार घराने से था। राम दयाल, फजलुर्रहमान से बहुत मुतास्सिर (प्रभावित) था। वो अकसर फजलुर्रहमान के यहाँ आया-जाया करता था। फजलुर्रहमान का घर मस्जिद के करीब था। ये मस्जिद दीनदार लोगों के लिए मरकज (केंद्र) की हैसियत रखती थी। वो नेक-खू (दयालु) और दीनदार इंसान था। उसका ज्यादातर वक्त मस्जिद में गुजरता था। वो मस्जिद की सफाई तो करता ही था, वक्त होने पर अजान भी देता था। अलबत्ता जमात की तकबीर कहने के लिए अपने आस-पास के नमाजियों को इशारा करता था।

फजलुर्रहमान साल भर में चिल्ला (चालीस दिनों की इबादत) तो बराबर लगाता ही था, कभी-कभी चार महीने का वक्त भी फारिग (पूर्ण) कर लेता था। इतना ही नहीं, महीने के आखिर में तीन दिन जमात के साथ भी वक्त लगाता था। सुबह-ओ-शाम की तस्बीहात (माला जपना) के अलावा कम से कम ढाई घंटे का वक्त फारिग कर मुहल्लेवालों को दीनी उमूर (कार्यों) से जोड़ने का काम भी करता था। हफ्तवारी इजतिमा (साप्ताहिक धार्मिक सभा) के दिन मस्जिद में कियाम (निवास) रहता। रात का ज्यादातर हिस्सा इबादत-ओ-रियाजत (इबादत में व्यस्त) में गुजरता। फज्र की नमाज के बाद अपनी जगह बैठकर जिक्र में मशगूल रहता और सूरज तुलूअ (उदय) होने के बीस मिनट बाद इशराक की नमाज अदाकर घर तशरीफ ले जाता। दीनदारियों का असर घर में भी साफ दिखाई देता था। मर्द-ओ-खवातीन सौम-ओ-सलात (रोजा-नमाज) के पाबंद थे। ऐसा कभी नहीं हुआ कि कोई सवाली फजलुर्रहमान के दरवाजे पर आया हो और उसे खाली हाथ लौटना पड़ा हो। राम दयाल में सखावत की खूबी फजलुर्रहमान से ही आई थी। इसी मुनासिबत की बिना पर गाँववाले राम दयाल को फजलुर्रहमान सानी (के समान) तक कह देते थे।

राम दयाल ने देर से बोई जाने वाली गेहूँ की फसल के लिए अलग रखी रकम ये समझकर जरूरतमंद किसानों को उधार दे दी थी कि जिस रोज उसे जरूरत पड़ेगी, कस्बे में जाकर अपने बैंक एकाउंट से मजीद रुपए निकाल लेगा और उन रुपयों का इस्तेमाल बीज, खाद-व-पानी वगैरह में करते हुए बरवक्त (उचित समय पर) गेहूँ की बुवाई कर लेगा।

वजीर-ए-आजम के जरिए अचानक किए गए ऐलानिया ने तन्हा राम दयाल ही नहीं, बल्कि आम लोगों की परेशानी में इजाफा कर दिया था। सरकार के जरिए स्याह रकूम (काला धन) से मुल्क को पाक-ओ-साफ करने के नाम पर अचानक हजार और पाँच सौ रुपए के नोट बंद कर दिए गए। रिजर्व बैंक के जरिए दो हजार और पाँच सौ रुपए के नए नोट जारी किए गए। बैंकों में पुरानी करेंसी जमा करने की तारीख तय करते हुए फैसला लिया गया कि आम सारिफीन अपने बैंक खाते से एक हफ्ता में ज्यादा से ज्यादा चौबीस हजार रुपए निकाल सकते हैं, जबकि करंट एकाउंट वाले अफराद (व्यक्ति) पचास हजार रुपए तक निकालने के मजाज (अधिकृत) होंगे। बाजार में पुराने नोटों का चलन बंद होने और बैंकों के सामने कतारों में खड़े सारिफीन को दो हजार से ज्यादा रुपए नहीं मिलने से अवाम की दिक्कतें लगातार बढ़ रही थीं।

डेढ़ महीना का अरसा गुजरने के बाद भी बैंकों में भीड़ कम होने का नाम नहीं ले रही थी। कई-कई दिन तक कैश नहीं आने से सारिफीन हलकान (पस्त) थे। दिसंबर के आखिरी दिनों की कड़कड़ाती ठंड और कहर आलूद (कहर बरपाने वाले) मौसम में गाँववालों के सामने सबसे बड़ी दिक्कत बैंक खुलने से कब्ल (पहले ही) कस्बे तक पहुँचने की थी। अगर देहाती सारिफीन किसी तरह बैंक तक पहुँचने में कामयाब भी रहते, तो वहाँ पहले ही से लोगों का जम्मे-गफीर (अत्यधिक भीड़) और लंबी कतारें देखकर मायूस-ओ-गमजदा हो जाते। कई बार ऐसा हुआ कि घंटों कतार में खड़े रहने के बाद जब किसी तरह सारिफ काउंटर तक पहुँचते तो कैश खत्म होने का ऐलान हो जाता और बैंक का गेट बंद कर दिया जाता।

पिछले पाँच दिनों से बैंक के दरवाजे पर लटका ‘नो कैश’ का बोर्ड सारिफीन को मुँह चिढ़ा रहा था। पीर (सोमवार) के रोज भी बैंक शाख को बाँटने के लिए कैश नहीं मिला। दस बजे बैंक खोलने आए अमले (स्टाफ) के जरिए ‘नो कैश’ की बिना पर (के कारण) पेमेंट नहीं होने की इत्तिला से सारिफीन के सब्र का पैमाना लबरेज हो गया। सर्दी की मार झेलते हुए सुबह पाँच बजे से कतारों में खड़ी खवातीन ने एहतिजाज (विरोध) करते हुए बैंक मुलाजमीन (कर्मियों) को गेट का ताला नहीं खोलने दिया। खबर मिलते ही पुलिस मौके पर पहुँच गई और सारिफीन को समझाने की कोशिश की।

लोगों का कहना था कि ये कैसा इन्साफ है कि हमें बैंक में पड़ा अपना ही रुपया निकालने के लिए पापड़ बेलने पड़ रहे हैं। हड्डी तक ठंडक का एहसास कराने वाली सर्दी में पाँच घंटे कतार में खड़े रहने के बाद बैंक मैनेजर के जरिए ‘कैश नहीं, तो पेमेंट नहीं’ का टका-सा जवाब सुनने को मिलता है। अवाम के पास रुपए नहीं हैं। वक्त पर इलाज ना होने से मरीज दम तोड़ रहे हैं। शादी के लिए रुपयों का बंदोबस्त नहीं होने से ना सिर्फ रिश्ते टूट रहे हैं, बल्कि लड़की या उसके माँ-बाप खुदकुशी करने तक पर मजबूर हो रहे हैं। धन काला करने वालों की सजा गरीबों को क्यों दी जा रही है? मजदूर व किसान अपनी रोजी-रोटी छोड़कर कतारों में खड़े हैं। ऐसा लगता है कि अवाम के पास कतारों में लगने के अलावा कोई दूसरा काम नहीं बचा है। हिज्ब-ए-मुखालिफ जमातों (विपक्ष) के जरिए उठाई जाने वाली आवाज और उनके जरिए किए जा रहे एहतिजाज नक्क्कार खाने में तूती की आवाज साबित हो रहे हैं।

इसी दौरान खवातीन को पीछे हटाते हुए पुलिस और खवातीन में नोक-झोंक हो गई। नौजवानों ने एहतिजाज किया तो पुलिस ने डंडे बरसाने शुरू कर दिए। लाठी चार्ज की मुखालिफत में सारिफीन मुश्तइल (आक्रोशित) हो गए। उन्होंने दरोगा और सिपाहियों को मुअत्तल (निलंबित) करने और फौरी तौर पर (अविलंब) पेमेंट देने के मुतालिबा (माँग) के साथ नेशनल हाईवे पर जाम लगा दिया। हालात पर काबू पाने में पुलिस के पसीने छूट गए। इसी दरमियान सारिफीन की भीड़ में कुछ शरारती अफराद घुस आए। वो इश्तिआल अंगेज (भड़काने वाले) साबित हुए। उन्होंने अपनी तकारीर से लोगों के जज्बात को खूब भड़काया। मुआमला काबू से बाहर होते देख पुलिस ने दोबारा लाठी चार्ज कर दिया। अफरा-तफरी और भगदड़ के बीच बूढ़ा राम दयाल जमीन पर गिर गया। पुलिस की मार से जान बचाकर भाग रहे लोग नीचे पड़े किसान के ऊपर पैर रखकर गुजरते रहे। पैरों तले कुचले जाने से उसकी मौके पर ही मौत हो गई।

पुलिस ने राम दयाल की लाश घसीटकर बैंक के सामने रख दी। उसके बेटों को इत्तिला देकर गाँव से शहर बुलाया गया। राजेश और नरेश बूढ़े बाप की लाश देखकर उससे चिपटकर रोने लगे। पुलिस ने उन्हें सब्र की तलकीन (नसीहत) करते हुए लाश का पोस्टमार्टम कराने या फिर पंचनामा भरकर लाश घर ले जाकर आखिरी रसूम (रस्में) अदा करने की सलाह देते हुए इस बाबत जल्दी फैसला लेने को कहा। बाप की लाश से चिपटकर रो रहे बेटों की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें और क्या ना करें?

बैंक एकाउंट राम दयाल के नाम था। उसने कई बार बेटों से कहा था कि वो उसके बैंक खाते में अपना नाम शामिल करा लें, ताकि वक्त जरूरत वो खुद बैंक जाकर वहाँ से रुपए निकाल लाया करें। लेकिन बेटों ने बैंक में रकम डालने और निकालने का काम बाप के ही जिम्मे रहने दिया। यही वजह थी कि नोटबंदी से पैदा हई मुश्किलात में फसल बोने के लिए बैंक आना उसकी मजबूरी बन गई थी। गुजिश्ता पाँच दिनों से रोजाना नई उम्मीद के साथ बैंक आ रहे राम दयाल ने सोचा भी नहीं होगा कि गाँव से शहर का मुख्तसर-सा सफर, उसकी जिंदगी का आखिरी सफर बन जाएगा। कुदरत को कुछ और ही मंजूर था। अब उसे रुपए निकालने के लिए कभी बैंक आने की नौबत ही नहीं आएगी।

पुलिस ने राजेश और नरेश की आँखों से बहते आँसुओं पर ध्यान देने के बजाय उनसे लाश के बारे में लिए गए फैसले की बाबत मालूम किया। उन्होंने दरोगा से कहा, “हमारे पास लाश ले जाने और क्रिया-करम के लिए रुपए नहीं हैं। बैंक की किताब पिता जी के नाम है। सारी रकम उसी में जमा है। हमारी परेशानी को देखते हुए आप जैसा मुनासिब समझें वैसा कर लें।”

दरोगा ने पंचनामा भरकर लाश घर ले जाने की सलाह दी। बेटे खामोश रहे। बेटों की खामोशी को उनकी मंजूरी तसव्वुर कर कागजी कार्रवाई मुकम्मल की गई। अपने काम से फरागत पाकर (निवृत होकर) पुलिस ने लाश ले जाकर अंतिम संस्कार करने की इजाजत दे दी।

राजेश और नरेश ने एक बार फिर पुलिस को अपनी मजबूरी से आगाह किया और दोनों हाथ जोड़ते हुए एम्बुलेंस मुहैय्या कराने की दरख्वास्त की। सख्त मिजाज खाकी पर उनके हाथ जोड़ने का कोई असर नहीं पड़ा। पुलिस ने अपना पीछा छुड़ाने के लिए एम्बुलेंस दस्तयाब (उपलब्ध) नहीं होने का हीला (बहाना) किया। अचानक दरोगा की निगाह कुछ फासले पर सड़क के किनारे खड़ी बैलगाड़ी पर पड़ी। दरोगा ने दोनों भाईयों को इशारा करते हुए उनसे बैलगाड़ी घसीटकर ले आने को कहा।

पहले तो राजेश व नरेश ठिठककर रह गए, लेकिन दरोगा के हुक्म पर अमल करते हुए दोनों भाई बैलगाड़ी ले आए। सिपाहियों ने राम दयाल के बेजान जिस्म को बैलगाड़ी पर डाल दिया। पुलिस ने बैलगाड़ी ले जाने को कहा। बेटों ने तआवुन (सहयोग) की उम्मीद में इधर-उधर देखा। शायद किसी के बल मिल जाएँ या फिर कोई शख्स उनकी मदद करने के लिए आगे आ जाए। उन्हें दूर तक मदद की कोई किरण दिखाई नहीं दी। बेहिस पुलिस जान छुड़ाने की फिक्र में थी। वो नेशनल हाईवे के किनारे वाके (स्थित) बैंक के सामने से जल्दी से जल्दी लाश हटवाने की कोशिश में थी।

दरोगा ने माथे पर बल डालते हुए कहा, “देर किस बात की है? क्या सोच रहे हो? किसान के खानदान से हो। खेती-किसानी तुम्हारा काम है। रोजाना गाड़ी का जुआ उठाकर बैलों के कंधों पर रखते होंगे। कभी-कभी खेत के अंदर बगैर बैलों के गाड़ी खींचने की नौबत भी आती होगी। फिर इंतजार किस बात का है? गाड़ी खींचकर घर ले जाओ!”

राजेश और नरेश पलिस की मंशा को अच्छी तरह समझ चके थे। उनके सामने खुद बैल बनकर बाप की लाश पड़ी गाड़ी को अपने कंधों पर खींच ले जाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था। उन्होंने गाड़ी के जुए को हाथों से उठाकर अपने कंधों पर रख लिया। चार किलो मीटर का फासला तय करने में बेटे पसीना-पसीना हो गए, लेकिन इससे किसी को कोई सरोकार नहीं था।

गाँववाले राम दयाल की मौत से जितने गमजदा थे, उससे कहीं ज्यादा बेटों के जरिए इस तरह लाश की गाड़ी खींचकर लाने से हैरतजदा थे। राजेश और नरेश की आँखों में आँसुओं का सैलाब उमड़ आया था। बाप की नागहानी (आकस्मिक) मौत और लाश को बैलगाड़ी में डालकर खुद ही बैलों की तरह खींचकर लाने के दर्द ने उनकी रूह तक को तड़पाकर रख दिया था।

लोगों ने महसूस किया कि दूसरों का दुख-दर्द बाँटने वाला राम दयाल ही नहीं मरा, बल्कि इंसानियत मर चुकी है। एक ऐसा शख्स, जिसने अपने पास की जमा-पूँजी गाँव के कमजोर किसानों को दे दी और खुद अपने खाते से रुपए निकालने के लिए बैंक के चक्कर काटने पर मजबूर हो गया। एक इंसान, एक मुहसिन, एक दर्दमंद और एक गमगुसार के इंतिकाल कर जाने से गाँव का हर फर्द गमगीं था। सबसे ज्यादा सदमा बचपन के दोस्त फजलुर्रहमान को था।

फजलुर्रहमान, राम दयाल के सानेहाई इतिहाल (दुर्घटना में गुजर जाने) पर बहुत दुखी था। हालात से आगाही (अवगत होने) के बाद वो दोस्त की मौत के लिए अपने आपको कसूरवार मान रहा था। उसने आगे बढ़कर राजेश और नरेश को गले से लगाया। उनके सिर पर शफकत से हाथ फेरा और बोला, “मेरे बच्चों, हालाँकि तुम्हारे बाप की मौत को नोटबंदी के सबब खुद को कसूरवार महसूस कर रहा हूँ। कहने के लिए मैं राम दयाल का बचपन का दोस्त था, लेकिन क्या मैं दोस्ती का हक अदा कर पाया?”

लाश के पास खड़े तमाम अफराद हैरत में थे। वो समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर फजलुर्रहमान, राम दयाल की दर्दनाक मौत के लिए किस तरह जिम्मेदार है। फजलुर्रहमान राजेश और नरेश की जानिब देखा और फिर यूँ गोया हुए, “मेरे बच्चों, हो सके तो मुझे माफ कर देना। कोई तस्लीम करे या ना करे, लेकिन तुम्हारे बाप की मौत का कसूरवार फजलुर्रहमान ही है। खुदा इस कसूर के लिए मुझे माफ नहीं करेगा….कभी माफ नहीं करेगा…”

“नहीं चाचा! आप कसूरवार नहीं हैं! आप कसूरवार हो भी कैसे सकते हैं? उनका वक्त पूरा हो चुका था। उनकी मौत ऐसे ही लिखी थी, लोगों के पैरों तले कुचलकर मरना ही उनके मुकद्दर में लिखा था। उसे कोई मिटा नहीं सकता था। हममें से कोई भी नहीं! आप भी नहीं…!” इतना कहकर राजेश खामोश हो गया।

“तुम्हारी समझ में ये बात नहीं आएगी, राजेश! गाँववाले भी इसे समझने से कासिर (अक्षम) हैं।” फजलुर्रहमान ने कहा, “मेरी बात गौर से सुनिए। मैं मुसलमान हूँ। इस्लाम को मानने और उसके उसूलों पर अमल की कोशिश करने वाला। अल्लाह ताला ने हमारे नबी के लिए इस्लाम को पसंद किया। नबी ने जो दीन हम पर पेश किया, वो हमें भाई-चारा, रवादारी (सहिष्णुता), जरूरतमंदों की मदद और उनके साथ हुस्न-ओ-सुलूक का सबक देता है। ये दरस (शिक्षा) अहल-ए-खाना और रिश्तेदारों के लिए ही नहीं है, बल्कि ये बगैर तफरीक (फर्क के) मजहब-ओ-मिल्लत (धर्म-संप्रदाय) सभी लोगों के लिए है। घर के चारों तरफ रहनेवालों, मुहल्लेवालों, बस्तीवालों और दोस्त-ओ-अहबाब के साथ अच्छा बरताव, उनकी खबर-गीरी और बेहतर सुलूक इस्लाम की पहचान है। राम दयाल की मुझसे अकसर मुलाकात होती थी। उसने अपनी परेशानी का कभी जिक्र नहीं किया। करता भी कैसे? वो एक गयूर (स्वाभिमानी) शख्स था। यकीनन गैरत आड़े आई होगी या फिर उसने सोचा होगा कि सरकार की नोट-बंदी का असर एक दो-रोज में जाइल (समाप्त) हो जाएगा। आज नहीं तो कल बैंक से पेमेंट मिल जाएगा, पर ऐसा नहीं हुआ..! लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं था कि मैं भी लापरवाह हो जाऊँ। अगर उसने मुझसे इस बारे में कुछ नहीं कहा था, तो कम से कम मुझे ही उसके चेहरे पर लिखी इबारत को पढ़ लेना चाहिए था। सख्त हालात में, मैं उसे बैंक की कतार में लगने से रोक सकता था, लेकिन अफसोस सद-अफसोस मैं ऐसा नहीं कर पाया…! सच तो यही है कि मैं दोस्ती की कसौटी पर खरा नहीं उतर सका।”

बस्ती के लोग राम दयाल की मौत के लिए सीधे तौर पर सरकार की नोट-बंदी स्कीम को कसूरवार मान रहे थे। वो अकेला ही नोट-बंदी का शिकार नहीं था। इस फैसले ने गरीब, मजदूर, किसान, बीमार और शादी की तारीख तय हो जानेवाले घरानों से उनकी खुशियाँ छीन ली। पैसे-पैसे के लिए मुहताज हुए पचासों अफराद नागहानी मौत के सख्त-जान पंजों से खुद को आजाद कराने में नाकाम हो गए। फजलुर्रहमान की आँखों से लुढ़कते आँसुओं को देखकर गाँव के लोगों की आँखें भी नमनाक हो गईं। ऐसे आँसू, जिनका कोई मोल नहीं था। सच्चे मोती की तरह दमकते बेहद कीमती और अनमोल!

फजलुर्रहमान ने लोगों को मुखातिब करते हुए कहा, “भाईयों! मैं अपने दोस्त की आखिरी रसूमात (रस्में) तो अदा करूँगा ही, आज से राजेश और नरेश की निगहदाश्त (देख-रेख) का जिम्मा भी मेरा रहेगा। मैं आखिरी दम तक उनकी हर मुमकिन मदद करूँगा। हो सकता है मेरे इस अमल से रब-ए-करीम मेरा कसूर माफ फरमा दे और मुझे कल्बी सुकून हासिल हो जाये।”

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’