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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

एक ही टेबलेट की तुरंत जरूरत रही थी सरस को। बुखार भी सहा जा सकता है, पर सिरदर्द नहीं। साथ में भूख भी लगती हो तो नर्क देखने की जरूरत नहीं होती। सरस एक निवाला रोटी चाहती थी। उसे और कुछ निगलने का मन नहीं था। मुँह में कड़वाहट के कारण थूक फेनिल की तरह निकल रहा था। सुगंध और स्वाद चली गयी थी।

सिर बिलकल भारी और इतना घम रहा था कि पसीने से वह थर-थर हो गयी। बुझ-बुझकर जलने वाले स्टोव से ज्यादा उसका बदन तप रहा था जिसमें चावल पकने में कोई शक नहीं था। दोनों आँखें सजल होने से भीगी कम्बल की तरह भारी पड़ी। सब्जी काटने तक झुक नहीं पा रही थी। इमली का घोल नहीं बना पा रही थी। स्टोव को पम्प करने में भी असमर्थ रही। उसके हाथ-पाँव कांपते रहे।

चावल पकाना सरस के लिए शादी में भोजन तैयार करने जैसे लगा। उसे ठीक से बरतन को ऊपर-नीचे करने में भी तकलीफ होती थी। थोड़ा-सा झुकने मात्र से नाक और आँखों से पानी गिरना शुरू हो जाता है।

सुबह तो ऐसा नहीं था।

भोर में उठकर इटली बनाकर, सिल-बट्टे पर चटनी पीसकर छौंका लगाकर टिफिन बॉक्स तैयार कर, गरमागरम चाय बनाकर, मुरूगेसन को नहाने के लिए गरम पानी का इंतजाम कर, उसे सुबह की शिफ्ट में कारखाने भिजवाकर, बरतन माँजकर, कपड़ा धोकर, घरबार झाडू देकर, बच्चे को उठाकर उसे तैयार कर, रिक्शावाले न आने पर गणेशन को आधी दूर गोद में और आधी दूर पैदल चलाकर स्कूल में छोड़कर लौटते वक्त तक उसे बुखार नहीं था।

स्कूल से लौटते वक्त बीच में रिक्शावाला आया और कहा, टायर पंक्चर हो गया, बड़ी परेशानी हो गई, शाम को मैं लेकर आ जाऊँगा, आप चिंता न करना। तब मुस्कुराकर सिर हिलाते वक्त भी बुखार का कोई लक्षण नहीं था। अचानक ही जाल की तरह बुखार फैल गया। नहाने के बाद शुरू हुई यह कँपन अब तक बढ़ती जा रही है। चाय पीने का मन हुआ तो दूध नहीं बचा था। सुबह का यह पाव भर दूध और कितना रूप लेगा? दूध तो अब कल सुबह ही नसीब होगा।

सरस को खूब भूख लग रही थी लेकिन कुछ खाने का मन नहीं था। भूख के कारण पेट में चूहे दौड़ रहे थे। सिरदर्द तो कठफोड़वे की तरह टोक-टोक कर रहा था। आँखें खुल नहीं पाई। सिर इतना भारी हो गया था कि जैसे दस मुंडी वाला रावण चढ़कर बैठ गया हो। शरीर की गर्मी कम करने के लिए कंबल ओढ़कर कोने में सोते रहने का मन चाहा। लेकिन वह ऐसा नहीं कर पायी।

“सबह की शिफ्ट से लौटे इंसान को गर्म खाना परोसने वाला कोई नहीं रहा।

ऐसा क्या काम करती हो?”

नौकरी से लौटे मुरूगेसन ऐसे दिखता है कि मानो हिमालय में चढ़ाई करके आया हो। अगर उसे बुखार हो तो चलना-फिरना कम कर लेते हैं, आँखें बंदकर कंबल ओढ़कर सोते रहते हैं।

“थीका रसम् बनाओ और चना दाल की चटनी पीसो, स्वाद मर ही गया है”

“थोड़ा अमृतांजन लगा दो, पैर दबा दो” ऐसे एक-एक आदेश देते रहेंगे।

आदेशों की पूर्ति करना अपना भाग्य समझनेवाले स्त्रीजात खुद आदेश देने की स्थिति से वंचित हैं। ऐसी ही परंपरा के सरस को ऐसा लगा कि अपनी भूख के लिए स्वयं भोजन तैयार करने से बेहतर है कि भूखा ही रह जाये।

लेकिन पेट में उठी आवाज को शांत करने के लिए ब्रेड के टुकड़े की सख्त जरूरत पड़ी। ब्रेड़ को बच्चे चाव से खाते हैं। अतः बचे हुए तीन ब्रेड के टुकड़ों को गणेश के लिए प्लास्टिक के डिब्बे में डालकर भेज दिया। अब घर में उसके खाने के योग्य कुछ नहीं रहा।

दाल उफनने की वजह से स्टोव बुझ गया।

“हे भगवान, यह क्या हो गया है?”

झुककर स्टोव की नॉब खोलकर चारों ओर से सफाई कर ठीक किया और स्टोव पिन से छेद ठीक करने के बाद केरोसिन डालकर फिर से जलाया। हाथ-मुँह धोकर फिर से दाल का बरतन चढ़ा दिया। इतने में सिरदर्द और जकाम ज्यादा परेशान कर दिया. आँखें खल नहीं पाई. सरस को ऐसा लगा कि उसका प्राण ही निकल गये।

आपातकाल में सहायता के लिए उसके अड़ोस-पड़ोस में कोई नहीं रहा। भाड़ा कम होने की वजह से घर शहर से कई किलोमीटर दूर पर था। बहस करना हो या तो किसी से अपना दर्द व्यक्त करना हो तो एक किलोमीटर जाना होगा। यहाँ तो अपने आप में बात करना है, अकेले में जीवन बिताना है जो नर्क सदृश जीवन है।

वह आया।

लाल आँखें, फूला हुआ नाक, बिखरा बाल और मोटी चादर में लिपटे सरस को देखकर चिढ़ गया था।

“क्या हुआ, क्या नाटक है यह?”

“बुखार है”

“हमेशा यह तो आ जाती है”

“क्या खाना-वाना कुछ पकाया कि नहीं”

“पकायी हूँ”

“फिर थाली डालो, जल्दी जाना है”

चिढ़-चिढ़ता रहा, लुंगी पहना, हाथ-मुँह धोकर थाली के सामने बैठा और सरस को प्यार छोड़, आँखें उठाकर देखे बिना जल्दी-जल्दी खाना खाने लगा।

“खड़े होकर खाना परोसने की बजाय बार-बार जाकर सोने जाती हो, यह सब मेरा नसीब है, मैंने शादी क्यों की, पता नहीं, खाना खुद परोसकर खाना पड़ रहा है”

एक ही साथ में वह सरस को गाली भी देता रहा और खाना भी खाता रहा। हाथ साफ किया और पतलून पहन लिया।

खड़े होने में और बैठने में असमर्थ सरस को आँख उठाकर देखा भी नहीं, “बुखार ठीक हो जाएगा”, शरीर स्पर्श कर ऐसा प्यार से बोला नहीं, “सिरदर्द भी है क्या”, ऐसा पूछकर माथे को दबाया नहीं, “आ जा, गोदी में सो जाओ मरहम लगा देता हूँ”, ऐसा कुछ कहा भी नहीं।

“मैं निकल रहा हूँ”

“कहीं बाहर जा रहे हैं क्या?”

“कैसा दिख रहा हूँ?”

“टेबलेट खरीद दीजिए, माथा फोड़ रहा है”

“दुकान तो काफी दूर है”

“पाँच मिनट में हो आ सकते हैं, गाड़ी तो है न”

“हाँ, हाँ, तुम्हारे बाप ने टाटा सुमो दे रखा है, जो हवा में उड़ेगा, मोपेड का किक मार-मार कर पैर दुख रहा है, और तेजी से दौड़ती भी नहीं, पैदल व्यक्ति इससे आगे निकल जाता है”

थप-थप करके बाहों पर पावडर लगाया।

ब्रेड खाने को मन कर रहा है। सुबह से कुछ खायी नहीं।

“एक पहर न खाने से जान नहीं चला जाएगा। दूसरों के घरों में पति का ख्याल इतना करते हैं कि उन्हें और कुछ परेशानियाँ नहीं रहती। पर मुझे सारी परेशानियों के लिए खुद छाती पीटना पड़ता है”

झुककर आईना देखकर कंघी लगाया।

फिल्म रिलीज होकर महीना हो गया। आज ही मुझे टिकट मिला है, वह भी सुपर स्टार का। दुकान हो आऊंगा तो देर हो जाएगी, पहले से देर हो चुकी है, अभी दौड़ना पड़ेगा, दुपहर का शो शुरू कर देगा।

चप्पल पहना, मोपड में किक मारकर तेजी से निकल गया ।

सरस की तबीअत और भी खराब होती जा रही थी, बदन कांपने लगा। सिरदर्द, मुँह में कड़वाहट, आँखों में आँसू न जाने और कितने दर्द सह रही थी। इन दोँ की पराकाष्ठा में वह कब सो गई थी, उसका पता ही नहीं था।

साढ़े तीन बजे गणेश स्कूल से लौटकर आया और दरवाजा खटखटाया, उसे जल्दी था पेशाब करने का। उसे सरस ने सिखाया कि हर कहीं आम जगहों में गंदा नहीं करना है।

माँ जल्दी दरवाजा खोलो न, मुझे पेशाब जाना है।

आवाज सुनकर हड़बड़ाकर उठी सरस। आकाश और धरती एक लगी उसे, आँखें खुल नहीं पाई, उल्टी आने के जैसे लगा और आँखों में बिजली के जैसा दर्द होने लगा।

सरस का फूला चेहरा देखकर बच्चा डर गया। थैली फेंक दी, पेशाब जाना भूलकर माँ से लिपट गया।

“गर्मी है, बुखार है, माँ”

“हाँ बेटा”

“तो फिर यह लो”

प्लास्टिक का डिब्बा खोलकर कहा, “ब्रेड खाओ माँ, बुखार के लिए यही देती हो न मुझे”

गणेश ने सूखे ब्रेड तोड़कर माँ को खिलाये।

“माँ, खाओ, बुखार ठीक हो जाएगा”

प्यार से माँ के चेहरे पर अपनी कोमल उँगलियों को फेरा, गर्मी का ध्यान न देकर माँ के गाल में चुम्बन दिया।

“चुम्बन से बुखार चला जाएगा न, कहती हो न ऐसे”

सरस को टेबलेट मिल गई। टेबलेट गोल, चपटा एवं कडुवा होना जरूरी नहीं है। मीठे शब्द और चुम्बन के रूप में भी टेबलेट हो सकती है। सरस वह टेबलेट निगल चुकी थी।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’