syamantak mani kee chori
syamantak mani kee chori

Hindi Katha: द्वापर युग की बात है, महाराज ‘ यदु’ की वंश परम्परा में ‘निघ्न’ नाम के एक महान प्रतापी राजा हुए, जिनके सत्राजित और प्रसेन नाम के दो पुत्र हुए। राजा सत्राजित द्वारिका में सुखपूर्वक रहते थे। सत्राजित भगवान् सूर्य के परम भक्त थे।

एक बार सत्राजित ने भगवान् सूर्यदेव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप करने का निर्णय किया और राज- सुखों का त्याग करके वन की ओर प्रस्थान कर गए। अनेक वर्षों तक कठोर तप करने के बाद सत्राजित की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान् सूर्यदेव ने उन्हें अपने लोक के दर्शन कराए और उन्हें ‘स्यमंतक’ नाम की अपनी प्रिय सूर्य मणि उपहार में प्रदान की। राजा सत्राजित ने स्यमंतक मणि को अपने गले में धारण कर लिया। मणि धारण करते ही राजा सत्राजित सूर्य की भाँति तेजपूर्ण हो गए।

तपस्या पूर्ण होने के बाद राजा सत्राजित द्वारिका लौट आए। जब सत्राजित राजमहल के द्वार पर पहुँचे तो तेजयुक्त राजा सत्राजित को देखते ही द्वारपालों के मन में भगवान् सूर्यनारायण होने का भ्रम उत्पन्न हो गया। उन्होंने शीघ्र ही सभा में विराजमान भगवान् श्रीकृष्ण को इसकी सूचना दी। तब तक सत्राजित भी सभा में पहुँच चुके थे।

श्रीकृष्ण ने मुस्कराते हुए कहा “ये भगवान् सूर्यनारायण नहीं, सत्राजित हैं, जिन्होंने सूर्यदेव की स्यमंतक मणि धारण कर रखी है। उनके शरीर से जो तेजपूर्ण दिव्य प्रकाश निकल रहा है, वह इस मणि के प्रभाव के कारण ही है। सूर्य मणि होने के कारण इसे धारण करने वाला सूर्य के समान ही तेजवान हो जाता है। ” इतना कहने के बाद श्रीकृष्ण ने आगे बढ़कर सत्राजित का अभिवादन किया।

सत्राजित ने विधि-विधान से पूजा-पाठ करके उस मणि को अपने भवन में स्थापित कर दिया। वह मणि प्रतिदिन अपने भार से आठ गुना अधिक स्वर्ण प्रदान करती थी। उसके प्रभाव से राज्य में निर्धनता, बीमारी, भय, कष्ट आदि समस्त विकारों का नाश हो गया और चारों ओर सुख, वैभवता और धन-सम्पन्नता की वर्षा होने लगी।

एक बार सत्राजित के भाई प्रसेन ने स्यमंतक मणि अपने गले में धारण की और घोड़े पर सवार होकर शिकार खेलने वन की ओर निकल पड़े। एक सिंह ने मणि के तेज से आकर्षित होकर प्रसेन को उनके घोड़े सहित मार दिया और मणि पर अधिकार कर लिया। उस मणि पर ऋक्षराज जाम्बवंत की दृष्टि पड़ी। जाम्बवंत ने सिंह को मारकर मणि छीन ली और वह मणि अपने पुत्र को खेलने के लिए दे दी।

प्रसेन जब बहुत दिनों तक घर नहीं लौटे तो सत्राजित को बहुत दुःख हुआ । भगवान् श्रीकृष्ण ने भी एक बार सत्राजित की स्यमंतक मणि की प्रशंसा की थी, इसलिए द्वारिका में यह बात फैल गई कि स्यमंतक मणि पाने के लिए उन्होंने ही प्रसेन को मार डाला है। यह बात भगवान् श्रीकृष्ण के कानों में भी पड़ी। तब अपने ऊपर लगे कलंक को मिटाने के लिए उन्होंने कुछ द्वारिकावासियों को अपने साथ लिया और प्रसेन को खोजते खोजते वन में आ निकले।

वहाँ उन्होंने पहले प्रसेन को और फिर एक शेर को एक गुफा के निकट मृत देखा। श्रीकृष्ण ने अन्य लोगों को वहीं ठहरने के लिए कहा और स्वयं उस गुफा में चले गए। गुफा में ऋक्षराज का पुत्र मणि से खेल रहा था। श्रीकृष्ण ने मणि छीनने का प्रयास किया तो जाम्बवंत वहाँ आ गया। दोनों में युद्ध आरम्भ हो गया। सत्ताईस दिनों तक दिन-रात युद्ध होता रहा ।

उधर गुफा के बाहर प्रतीक्षा करते द्वारिकावासी बारह दिनों तक वहाँ रुके, फिर डरकर द्वारिका लौट गए। श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव को जब यह बात ज्ञात हुई तो वे अपने पुत्र के लिए अत्यंत शोक में डूब गए। वे विलाप करने लगे कि अब उनका कल्याण कैसे होगा?

इसी समय देवर्षि नारद वहाँ आ पहुँचे। नारद जी ने उनसे दुःखी होने का कारण पूछा। वसुदेव जी ने उन्हें सारी बात बताई और श्रीकृष्ण की कुशलता से वापसी का उपाय पूछा। तब नारद उन्हें देवी अम्बिका की आराधना और देवी भागवत कथा श्रवण का परामर्श देते हुए बोले – “हे राजन ! आप व्यर्थ की चिंता का त्याग करके, माता अम्बिका से पुत्र – प्राप्ति की प्रार्थना करें। माता अपने पुत्र का कभी भी अहित नहीं चाहतीं। वे आपको मनोवांछित फल अवश्य प्रदान करेंगी।

नारद जी की बात सुनकर वसुदेव बोले – “हे देवर्षि ! देवी भागवत कथा श्रेष्ठ अमृत- – वाचन आपके अतिरिक्त और कोई नहीं कर सकता। अतः आप ही इस कथा का वाचन करके हमें देवी- कृपा का भागी बनाएँ। “

वसुदेव जी के आग्रह पर नारदजी स्वयं ही उन्हें देवी भागवत की कथा सुनाने लगे। नवें दिन कथा-प्रसंग समाप्त हुआ तो वसुदेव जी ने कथा – वाचक नारदजी और कथा पुस्तक की श्रद्धापूर्वक यथोचित पूजा की । उस समय श्रीकृष्ण का जाम्बवंत के साथ गुफा में युद्ध चल रहा था। श्रीकृष्ण के मुष्टि प्रहार से जाम्बवंत घायल हो गया। तभी माता अम्बिका के प्रभाव से उसकी चेतना जागृत हुई और वह श्रीकृष्ण के चरणों में झुककर क्षमा माँगने लगा भगवन् ! मैं आपको पहचान गया। आप भगवान् श्रीराम हैं। आपके क्रोध से समुद्र काँप उठा था, लंका का राजा रावण सपरिवार काल का ग्रास बन गया था। अब आप श्रीकृष्ण के रूप में पधारे हैं। मेरे अपराध क्षमा करें, प्रभु। मैं आपका सेवक हूँ। उचित आज्ञा देने की कृपा करें।

” भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा ‘ऋक्षराज ! हम मणि लेने गुफा में आए हैं। ऋक्षराज जाम्बवंत ने आदरपूर्वक भगवान् श्रीकृष्ण की स्तुति की। अपनी पुत्री जाम्बवती का उनके साथ विवाह कर दिया और मणि भी सौंप दी। श्रीकृष्ण ने जाम्बवती को पत्नी के रूप में स्वीकार किया, मणि गले में धारण की और द्वारिका की ओर चल पड़े। उसी दिन द्वारिका में देवी भागवत की कथा समाप्त हुई। वसुदेव जी ने ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा दी। ब्राह्मण आशीर्वाद दे रहे थे कि उसी समय भगवान् श्रीकृष्ण मणि धारण किए हुए पत्नी सहित वहाँ आ पहुँचे। इस प्रकार, देवी भागवत कथा के श्रवण से वसुदेव जी ने श्रीकृष्ण को न केवल पुनः प्राप्त किया, बल्कि उनके माथे पर लगे कलंक से भी उन्हें मुक्त कर दिया।