मिर्जा-बड़ी मुसीबत है। कहीं मेरी भी तलबी न हो।
मीर-कम्बख्त कल आने की कह गया है।
मिर्जा-आफत है, और क्या। कहीं मोरचे पर जाना पड़ता तो बेमौत मरे।
मीर-बस, यह एक तदबीर है कि घर पर मिलें ही नहीं कल से गोमती पर कहीं वीराने में नक्शा जमे। वहाँ किसे खबर होगी? हजरत आकर लौट जाएँगे।
मिर्जा-वल्लाह, आपको खूब सूझी! इसके सिवा कोई तदबीर नहीं है।
इधर मीर साहब की बेगम उस सवार से कह रही थी, तुमने खूब धत्ता बताई।
उसने जवाब दिया, ऐसे गावदियों को तो चुटकियों पर नचाता हूँ। इनकी सारी अक्ल और हिम्मत तो शतरंज ने चर ली। अब भूलकर भी घर न रहेंगे।
दूसरे दिन दोनों मित्र मुँह-अँधेरे निकल खड़े होते। बगल में एक छोटी-सी दरी दबाए, डिब्बे में गिलोरियाँ भरे, गोमती पार कर एक पुरानी वीरान मसजिद में चले जाते, जिसे शायद नवाब आसफउद्दौला ने बनवाया था। रास्ते में तंबाकू, चिलम और मददिया ले लेते और मसजिद में पहुँच, दरी बिछा, हुक्का भर, शतरंज खेलने बैठ जाते थे। फिर उन्हें दीन-दुनिया की फिक्र न रहती थी। ‘किश्त’, ‘शह’ आदि दो-एक शब्दों के सिवा मुँह से और कोई वाक्य नहीं निकलता था। कोई योगी भी समाधि में इतना एकाग्र न होता। दोपहर को जब भूख मालूम होती तो दोनों मित्र किसी नानबाई की दुकान पर जाकर खाना खा आते और एक चिलम हुक्का पीकर फिर संग्राम-क्षेत्र में डट जाते। कभी-कभी उन्हें भोजन का भी खयाल न रहता था।
इधर देश की राजनीति दशा भयंकर होती जा रही थी। कंपनी की फौजें लखनऊ की तरफ़ बढ़ी चली आती थीं। शहर में हलचल मची हुई थी। लोग बाल-बच्चों को ले-लेकर देहातों में भाग रहे थे। पर हमारे दोनों खिलाड़ियों को इसकी जरा भी फिक्र न थी। वे घर से आते तो गलियों में से होकर। डर था कि कहीं किसी बादशाही मुलाजिम की निगाह न पड़ जाए, नहीं तो बेगार में पकड़े जाएँ। हजारों रुपए सालाना की जागीर मुफ्त में ही हजम करना चाहते थे।
एक दिन दोनों मित्र मसजिद के खंडहर में बैठे हुए शतरंज खेल रहे थे। मिर्जा की बाजी कुछ कमजोर थी। मीर साहब उन्हें किश्त पर किश्त दे रही थे। इतने में कंपनी के सैनिक आते हुए दिखाई दिए। यह गोरों की फौज थी, जो लखनऊ पर अधिकार जमाने के लिए आ रही थी।
मीर साहब बोले, अँगरेजी फौज आ रही है खुदा खैर करे।
मिर्जा-आने दीजिए, किश्त बचाइए। लो यह किश्त!
मीर-जरा देखना चाहिए; यहीं आड़ में खड़े हो जाएँ।
मिर्जा-देख लीजिएगा, जल्दी क्या है, फिर किश्त!
मीर-तोपखाना भी है। कोई पाँच हजार आदमी होंगे। कैसे जवान हैं। लाल बंदरों से मुँह हैं। सूरत देखकर खौफ होता है।
मिर्जा-जनाब हीले न कीजिए। ये चकमे किसी और को दीजिएगा, यह किश्त!
मीर-आप भी अजीब आदमी हैं। यहाँ तो शहर पर आफत हुई है और आपको किश्त की सूझी है। कुछ इसकी खबर है कि शहर घिर गया तो घर कैसे चलेंगे?
मिर्जा-जब चलने का वक्त आएगा तो देखी जाएगी, यह किश्त, बस अबकी शह में मात है।
फौज निकल गई। दस बजे का समय था। फिर बाजी बिछ गई। मिर्जा बोले आज खाने की कैसी ठहरेगी?
मीर-अजी, आज तो रोजा है। क्या आपको भूख ज्यादा मालूम होती है?
मिर्जा-जी नहीं। शहर में जाने क्या हो रहा है?
मीर-शहर में कुछ न हो रहा होगा। लोग खाना खा-खाकर आराम से सो रहे होंगे। हुजूर नवाब भी ऐशगाह में होंगे।
दोनों सज्जन फिर जो खेलने बैठे तो तीन बज गए। अब की मिर्जा की बाजी कमजोर थी। चार का गजर बज रहा था कि फौज की वापसी की आहट मिली। नवाब वाजिदअली शाह पकड़ लिए गए थे और उन्हें किसी अज्ञात स्थान को लिए जा रही थी। शहर में न कोई हलचल थी, न मार-काट। एक बूँद भी खून नहीं गिरा था। आज तक किसी स्वाधीन देश के राजा की पराजय इतनी शांति से, इस तरह खून बहे बिना न हुई होगी। यह अहिंसा न थी, जिस पर देवगण प्रसन्न होते हैं। यह कायरपन था, जिस पर बड़े से बड़े कायर आँसू बहाते हैं। अवध के विशाल देश के नबाव बंदी बना चला जाता था और लखनऊ ऐश की नींद में मस्त था। यह राजनीतिक अध:पतन की चरम सीमा थी।
मिर्जा ने कहा, हुजूर नवाब को जालिमों ने कैद कर लिया है।
मीर-होगा, यह लीजिए शह।
मिर्जा-जनाब, जरा ठहरिए। इस वक्त इधर तबीयत नहीं लगती। बेचारे नवाब साहब इस वक्त खून के आँसू रो रहे होंगे।
मीर-रोया ही चाहें, यह ऐश वहाँ कहाँ नसीब होगा? यह किश्त।
मिर्जा-किसी के दिन बराबर नहीं जाते। कितनी दर्दनाक हालत है।
मीर-हाँ, सो तो है ही, यह लो फिर किश्त! बस अब की किश्त में मात है। बच नहीं सकते।
मिर्जा-खुदा की कसम, आप बड़े बेदर्द हैं।
इतना हादसा देखकर भी आपको दुख नहीं होता। हाय! गरीब वाजिद अली शाह मीर-पहले अपने बादशाह को तो बचाइए, फिर नवाब का मातम कीजिएगा। यह किश्त और मात। लगाना हाथ।
बादशाह को लिए हुए सेना सामने से निकल गई। उनके जाते ही मिर्जा ने फिर बाजी बिछा ली। हार की चोट बुरी होती है। मीर ने कहा, आइए! नवाब के मातम में एक मरसिया कह डालें। लेकिन मिर्जा की राज्यभक्ति अपनी हार के साथ लुप्त हो चुकी थी। वह हार का बदला चुकाने के लिए अधीर हो गए थे।
शाम हो गई। खंडहर में चमगादड़ों ने चीखना शुरू किया। अबाबीलें आ-आकर अपने घोसलों में चिपटीं। पर दोनों खिलाड़ी डटे हुए थे। मानो दोनों खून के प्यासे सूरमा आपस में लड़ रहे हों। मिर्जा जी तीन बाजियाँ लगातार हार चुके थे; इस चौथी बाजी का रंग भी अच्छा न था। वह बार-बार जीतने का दृढ़निश्चय कर संभलकर खेलते थे लेकिन एक न एक चाल बेढब आ पड़ती थी, जिससे बाजी खराब हो जाती थी। हर बार हार के साथ प्रतिकार की भावना और उग्र होती जाती थी। उधर मीर साहब मारे उमंग के गजलें गाते थे; चुटकियाँ लेते थे, मानो कोई गुप्त धन पा गए हों। मियाँ सुनसुनकर झुँझलाते और हार की झेंप मिटाने के लिए उनकी दाद देते थे। ज्यों-ज्यों बाजी कमजोर पड़ती थी, धैर्य हाथ से निकलता जाता था। यहाँ तक कि वह बात-बात पर झुँझलाने लगे। ‘जनाब, आप चाल न बदला कीजिए। यह क्या कि चाल चले और फिर उसे बदल दिया। जो कुछ चलना है एक बार चल दीजिए। यह आप मुहरे पर ही क्यों हाथ रखे रहते हैं। मुहरें छोड़ दीजिए। जब तक आपको चाल न सूझे, मुहर छुइए ही नहीं। आप एक-एक चाल आध-आध घंटे में चलते हैं। इसकी सनद नहीं। जिसे एक चाल चलने में पाँच मिनट से ज्यादा लगे उसकी मात समझी जाए। फिर आपने बात बदली? चुपके से मुहरा वहीं रख दीजिए।
मीर साहब का फरजी पिटता था, बोले मैंने चाल चली ही कब थी?
