सेठ चुन्नीलाल ने गम्भीरता से कहा, खां साहब! बात तो वही है, जो तुम कहते हो। लेकिन किया क्या जाये? नेकनीयत से तो काम नहीं चलता। यह दुनिया तो छल-कपट की है।
मिस्टर गोपालदास बी.ए. पास थे। वे गर्व के साथ बोले, इन्हें जब इस तरह रहना था तो नौकरी करने की क्या जरूरत थी? यह कौन नहीं जानता कि नीयत को साफ रखना अच्छी बात है। मगर यह भी तो देखना चाहिए कि इसका दूसरों पर क्या असर पड़ता है। हमको तो ऐसा आदमी चाहिए जो खुद खाये और हमें भी खिलाये। खुद हलुआ खाये, हमें रूखी रोटियां ही खिलाये। वह अगर एक रुपया कमीशन लेगा तो उसकी जगह पांच का फायदा कर देगा। इन महाशय के यहां क्या है? इसलिए आप जो चाहे कहें, मेरी तो कभी इनसे निभ नहीं सकती।
शाहबाज खां बोले, हां, नेक और पाक-साफ रहना जरूर अच्छी नजर है, मगर ऐसी नेकी की क्या जो दूसरी की जान ही ले ले।
बूढ़े हरिदास की बातों की जिन लोगों ने पुष्टि की थी वे सब गोपालदास की हां-में हां मिलाने लगे। निर्बल आत्माओं में सच्चाई का प्रकाश जुगनू की चमक है।
सरदार साहब के एक पुत्री थी। उसका विवाह मेरठ के एक वकील के लड़के से ठहरा था। लड़का होनहार था। जाति-कुल का ऊंचा था। सरदार साहब ने कई महीने की दौड़-भूप में इस विवाह को तय किया था और सब बातें तो तय हो चुकी थी, केवल दहेज का निर्माण नहीं हुआ था। आज वकील साहब का एक पत्र आया। उसने इस बात का भी निश्चय कर दिया, मगर विश्वास, आशा और वचन के बिलकुल प्रतिकूल। पहले वकील साहब ने एक जिले के इंजीनियर के साथ किसी प्रकार का ठहराव व्यर्थ समझा। बड़ी सस्ती उदारता प्रकट की। इस लज्जित और घृणित व्यवहार पर खूब आंसू बहाये। मगर जब ज्यादा पूछताछ करने पर सरदार साहब के धन-वैभव का भेद खुल गया तब दहेज का कराना आवश्यक हो गया। सरदार साहब ने आशंकित हाथों से पत्र खोला, पांच हजार से कम पर विवाह नहीं हो सकता। वकील साहब को बहुत खेद और लज्जा थी कि इस विषय में स्पष्ट होने पर मजबूर किये गये। मगर वे अपने खानदान के कई बूढ़े खुर्राट, विचारहीन, स्वार्थांध महात्माओं के हाथों बहुत तंग थे। उनका कोई वश न था। इंजीनियर साहब ने एक लम्बी सांस खींची। सारी आशाएं मिट्टी में मिल गयी। क्या सोचते थे, क्या हो गया। विकल होकर कमरे में टहलने लगे।
उन्होंने जरा देर पीछे पत्र को उठ लिया और अंदर चले गये। विचारा कि यह पत्र रामा को सुनायें, मगर फिर ख्याल आया कि यहां सहानुभूति की कोई आशा नहीं। क्यों अपनी निर्बलता दिखाऊं? क्यों मूर्ख बनूं, वह बिन बातों के बात न करेगी। यह सोच कर वे आंगन से लौट गये।
सरदार साहब स्वभाव के बड़े दयालु थे और कोमल हृदय आपत्तियों में स्थिर नहीं रह सका। वे दुःख और ग्लानि से भरे हुए सोच रहे थे कि मैंने ऐसे कौन से बुरे काम किये हैं जिनका मुझे यह फल मिल रहा है। बरसों की दौड़-भूप के बाद जो कार्य सिद्ध हुआ था वह क्षण मात्र में नष्ट हो गया। अब वह मेरी सामर्थ्य से बाहर है। मैं उसे नहीं सम्हाल सकता, चारों ओर अंधकार है। कहीं आशा का प्रकाश नहीं। कोई मेरा सहायक नहीं। उनके नेत्र सजल हो गये।
सामने मेज़ पर ठेकेदारों के बिल रखे हुए थे। वे कई सप्ताहों से यों ही पड़े थे। सरदार ने उन्हें खोलकर भी न देखा था। आज इस आत्मिक ग्लानि और नैराश्य की अवस्था में उन्होंने इन बिलों को सतृष्ण आंखों से देखा। जरा से इशारे पर ये सारी कठिनाइयां दूर हो सकती हैं। चपरासी और क्लर्क केवल मेरी सम्पत्ति के सहारे सब कुछ कर लेंगे। मुझे जबान हिलाने की भी जरूरत नहीं। न मुझे लज्जित ही होना पड़ेगा। इन विचारों का इतना प्राबल्य हुआ कि वे वास्तव में बिलों को उठाकर गौर से देखने और हिसाब लगाने लगे कि उनमें कितनी निकासी हो सकती है।
मगर शीघ्र ही आत्मा ने उन्हें जगा दिया – आह! मैं किस भ्रम में पड़ा हुआ हूं? क्या उस आत्मिक पवित्रता को, जो मेरी जनम-भर की कमाई है, केवल थोड़े से धन पर अर्पण कर दूं? जो मैं अपने सहकारियों के सामने गर्व से सिर उठाये चलता था, जिससे मोटरकार वाले भ्रातृगण आंखें नहीं मिला सकते थे, वही मैं आज अपने उस सारे गौरव और मान को, अपनी सम्पूर्ण आत्मिक सम्पत्ति को दस-पांच हजार रुपयों पर त्याग दूं। ऐसा कदापि नहीं हो सकता।
अब इस कुविचार को परास्त करने के लिए, जिसने क्षणमात्र के लिए उन पर विजय पा ली थी, वे सुनसान कमरे में जोर से ठठाकर हंसे। चाहे यह हंसी उन बिलों ने, कमरे की दीवारों ने न सुनी हो, मगर उनकी आत्मा ने अवश्य सुनी। उस आत्मा को एक कठिन परीक्षा में पार पाने पर परम आनंद हुआ।
सरदार साहब ने उन बिलों को उठकर मेज़ के नीचे डाल दिया। फिर उन्हें पैरों से कुचला। तब इस विषय पर मुस्कुराते हुए वे अन्दर गये।
बड़े इंजीनियर साहब नियत समय पर शाहजहांपुर आये। उसके साथ सरदार साहब का दुर्भाग्य भी आया। जिले के सारे काम अधूरे पड़े हुए थे। उनके खानसामा ने कहा, हुजूर! काम कैसे पूरा हो? सरदार साहब ठेकेदारों को बहुत तंग करते हैं। हेडक्लर्क ने दफ्तर के हिसाब को भ्रम और भूलों से भरा हुआ पाया। उन्हें सरदार साहब की तरफ से न कोई दावत दी गयी न कोई भेंट। तो क्या वे सरदार साहब के नातेदार थे जो गलतियां न निकालते? जिले के ठेकेदारों ने एक बहुमूल्य डाली सजायी और उसे बड़े इंजीनियर साहब की सेवा में लाकर हाजिर हुए। वे बोले, हुजूर! चाहे गुलामों को गोली मार दें, मगर सरदार साहब का अन्याय अब नहीं सहा जाता। कहने को तो कमीशन नहीं लेते मगर सब पूछिए तो जान ले लेते हैं।
चीफ इंजीनियर साहब ने मुआइना की किताब में लिखा, ‘सरदार शिवसिंह बहुत ईमानदार आदमी हैं। उनका चरित्र उज्ज्वल है, मगर वे इतने बड़े जिले के कार्य का भार नहीं सम्भाल सकते।’
परिणाम यह हुआ कि वे एक छोटे से जिले में भेज दिये गये और उनका दरजा भी घटा दिया गया।
सरदार साहब के मित्रों और स्नेहियों ने बड़े समारोह से एक जलसा किया। उनमें उनकी धर्मनिष्ठा और स्वतंत्रता की प्रशंसा की। सभापति ने सजल नेत्र होकर कम्पित स्वर में कहा, सरदार साहब के वियोग का दुःख हमारे दिल में सदा खटकता रहेगा। यह घाव कभी न भरेगा। मगर ‘फैयरवैल डिनर’ में यह बात सिद्ध हो गयी कि स्वादिष्ट पदार्थों के सामने वियोग का दुःख दुस्सह नहीं।
यात्रा के सामान तैयार थे। सरदार साहब जलसे से आये तो रामा ने उन्हें बहुत उदास और मलिनमुख देखा। उसने बार-बार कहा था कि बड़े इंजीनियर के खानसामा को इनाम दो, हेड क्लर्क की दावत करो, मगर सरदार साहब ने उसकी बात न मानी थी। इसलिए जब उसने सुना कि उनका दरजा घटा और बदली भी हुई तब उसने बड़ी निर्दयता से अपने व्यंग्य-बाण चलाये। मगर इस वक्त उन्हें उदास देखकर उससे न रहा गया। बोली, क्यों इतने उदास हो? सरदार साहब ने उत्तर दिया, क्या करूं, हंसू? राजा ने गम्भीर स्वर से कहा, हंसना ही चाहिए। रोये तो वह जिसने कौड़ियों पर अपनी आत्मा भ्रष्ट की हो, जिसने रुपयों पर अपना धर्म बेचा हो। वह बुराई का दंड नहीं है। यह भलाई और सज्जनता का दंड है, इसे सानंद झेलना चाहिए। यह कहकर उसने पति की ओर देखा तो नेत्रों में सच्चा अनुराग भरा हुआ दिखाई दिया। सरदार साहब ने भी उसकी ओर स्नेहपूर्ण दृष्टि से देखा। उनकी हृदयेश्वरी का मुखारविंद सच्चे आमोद से विकसित था। उसे गले लगा कर वे बोले, रामा! मुझे तुम्हारी ही सहानुभूति की जरूरत थी, अब मैं इस दंड को सहर्ष सहूंगा।
