सारे नगर में महाशय यशोदानंद का बयान हो रहा था। नगर ही में नहीं, समस्त प्रान्त में उनकी कीर्ति गायी जाती थी, समाचार पत्रों में टिप्पणियाँ हो रही थीं, मित्रों के प्रशंसापूर्ण पत्रों का ताँता लगा हुआ था। समाज-सेवा इसको कहते हैं। उन्नत विचार के लोग ऐसा ही करते हैं। महाशय जी ने शिक्षित समुदाय […]
Category: मुंशी प्रेमचंद की कहानियां
मुंशी प्रेमचंद्र की कहानियां : मुंशी प्रेमचंद्र हिंदी साहित्य के ऐसे सितारे हैं, जिसकी चमक कभी कम नहीं होगी। उनकी कहानियों का मुख्य पात्र सामान्य व्यक्ति होता है। समाज में व्याप्त बुराईयों पर चोट करती हुई उनकी कहानी समाज में मित्रता, प्रेम सहयोग की भावना को बढ़ाती है। उनकी कहानी में ग्रामीण परिवेश प्रमुखता रूप से होती है। गृहलक्ष्मी की वेबसाइट पर आप मुंशी प्रेमचंद की सभी उपन्यास यहां पढ़ सकते हैं।
मैकू – मुंशी प्रेमचंद
कादिर और मैकू ताड़ी-खाने के सामने पहुंचे तो वहां कांग्रेस के वालंटियर झंडा लिए खड़े नजर आए। दरवाजे के इधर-उधर हजारों दर्शक खड़े थे। शाम का वक्त था। इस वक्त गली में पियक्कड़ों के सिवा और कोई न आता था। भले आदमी इधर से निकलते झिझकते। पियक्कड़ों की छोटी-छोटी टोलियां आती-जाती रहती थी। दो-चार वेश्याएं […]
जुलूस – मुंशी प्रेमचंद
पूर्ण स्वराज्य का जुलूस निकल रहा था। कुछ युवक, कुछ बूढ़े, कुछ बालक झंडियाँ और झंडे लिये वंदेमातरम् गाते हुए माल के सामने से निकले। दोनों तरफ दर्शकों की दीवारें खड़ी थीं, मानो उन्हें इस लक्ष्य से कोई सरोकार नहीं हैं, मानो यह कोई तमाशा है और उनका काम केवल खड़े-खड़े देखना है। शंभूनाथ ने […]
शराब की दुकान – मुंशी प्रेमचंद
कांग्रेस-कमेटी में यह सवाल पेश था – शराब और ताड़ी की दुकानों पर कौन धरना देते जाये? कमेटी के पच्चीस मैंबर सिर झुकाए बैठे थे पर किसी के मुंह से बात न निकलती थी। मामला बड़ा नाजुक था। पुलिस के हाथों गिरफ्तार हो जाना तो ज्यादा मुश्किल बात न थी। पुलिस के कर्मचारी अपनी जिम्मेदारियों […]
पत्नी से पति – मुंशी प्रेमचंद
मिस्टर सेठ को सभी हिंदुस्तानी चीजों से नफरत थी और उनकी सुंदर पत्नी गोदावरी को सभी विदेशी चीजों से चिढ़। मगर धैर्य और विलय भारत की देवियों का आभूषण है। गोदावरी दिल पर हजार जब्र करके पति की लाई हुई विदेशी चीजों का व्यवहार करती थी, हालांकि भीतर-ही-भीतर उसका हृदय अपनी परवशता पर रोता था। […]
जेल – मुंशी प्रेमचंद
मृदुला मजिस्ट्रेट के इजलास से जनाने जेल में वापस आयी, तो उसका मुख प्रसन्न था। बरी हो जाने की गुलाबी आशा उसके कपोलों पर चमक रही थी। उसे देखते ही राजनीतिक कैदियों के एक गिरोह ने घेर लिया और पूछने लगी, कितने दिन की हुई। मृदुला ने विजय-गर्व से कहा – ‘मैंने तो साफ-साफ कह […]
दुराशा – मुंशी प्रेमचंद
(प्रहसन) पात्र दयाशंकर -कार्यालय के एक साधारण लेखक आनंदमोहन -कालेज का एक विद्यार्थी तथा दयाशंकर का मित्र ज्योतिस्वरूप -दयाशंकर का एक सुदूर-सम्बन्धी सेवती -दयाशंकर की पत्नी (होली का दिन) (समय-9 बजे रात्रि आनंदमोहन तथा दयाशंकर वार्तालाप करते जा रहे हैं।) आ.-हम लोगों को देर तो न हुई। अभी तो नौ बजे होंगे ! द.-नहीं अभी […]
राज्य-भक्ति – मुंशी प्रेमचंद
संध्या का समय था। लखनऊ के बादशाह नासिरुद्दीन अपने मुसाहबों और दरबारियों के साथ बाग की सैर कर रहे थे। उनके सिर पर रत्नजटित मुकुट की जगह अँग्रेजी टोपी थी। वस्त्र भी अँग्रेजी ही थे। मुसाहबों में पाँच अँग्रेज थे। उनमें से एक के कन्धे पर सिर रख कर बादशाह चल रहे थे। तीन-चार हिंदुस्तानी […]
आप-बीती – मुंशी प्रेमचंद
प्रायः अधिकांश साहित्य-सेवियों के जीवन में एक ऐसा समय आता है जब पाठकगण उनके पास श्रद्धा-पूर्ण पत्र भेजने लगते हैं। कोई उनकी रचना-शैली की प्रशंसा करता है कोई उनके सद्विचारों पर मुग्ध हो जाता है। लेखक को भी कुछ दिनों से यह सौभाग्य प्राप्त है। ऐसे पत्रों को पढ़ कर उसका हृदय कितना गद्गद हो […]
पछतावा – मुंशी प्रेमचंद
पंडित दुर्गानाथ जब कालेज से निकले तो उन्हें जीवन-निर्वाह की चिंता उपस्थित हुई। वे दयालु और धार्मिक थे। इच्छा थी कि ऐसा काम करना चाहिए जिससे अपना जीवन भी साधारणतः सुखपूर्वक व्यतीत हो और दूसरों के साथ भलाई और सदाचरण का भी अवसर मिले। वे सोचने लगे-यदि किसी कार्यालय में क्लर्क बन जाऊँ तो अपना […]
