Posted inमुंशी प्रेमचंद की कहानियां, हिंदी कहानियाँ

स्वत्व रक्षा – मुंशी प्रेमचंद

मीर दिलावर अली के पास एक बड़ी रास का कुम्मैत घोड़ा था। कहते तो वह यही थे कि मैंने अपनी जिन्दगी की आधी कमाई इस पर खर्च की है, पर वास्तव में उन्होंने इसे पलटन में सस्ते दामों मोल लिया था। यों कहिए कि यह पलटन का निकाला हुआ घोड़ा था, शायद पलटन के अधिकारियों […]

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विध्वंस – मुंशी प्रेमचंद

जिला बनारस में बीरा नाम का एक गांव था। वहां एक विधवा वृद्धा, संतानहीन, गोंड़िन रहती थी, जिसका भुनगी नाम था। उसके पास एक धुर भी जमीन न थी और न रहने का घर ही था। उसके जीवन का सहारा केवल एक भाड़ था। गांव के लोग प्रायः एक बेला चबैना या सत्तू पर निर्वाह […]

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दफ्तरी – मुंशी प्रेमचंद

रफाकत हुसैन मेरे दफ्तर का दफ्तरी था। 10 रु मासिक वेतन पाता था। दो-तीन रुपये बाहर के फुटकर काम से मिल जाते थे। यही उसकी जीविका थी, पर वह अपनी दशा से संतुष्ट था। उसकी आंतरिक अवस्था तो ज्ञात नहीं, पर वह सदैव साफ-सुथरे कपड़े पहनता और प्रसन्नचित्त रहता। कर्ज इस श्रेणी के मनुष्यों का […]

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हार की जीत – मुंशी प्रेमचंद

केशव से मेरी पुरानी लाग-डांट थी। लेख और वाणी, हास्य और विनोद सभी क्षेत्रों में मुझसे कोसों आगे था। उसके गुणों की चन्द्र-ज्योति में मेरे दीपक का प्रकाश कभी प्रस्फुटित न हुआ। एक बार उसे नीचा दिखाना मेरे जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा थी। उस समय मैंने कभी स्वीकार नहीं किया। अपनी त्रुटियों को कौन […]

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विमाता – मुंशी प्रेमचंद

स्त्री की मृत्यु के तीन मास बाद पुनर्विवाह करना मृतात्मा के साथ ऐसा अन्याय और उसकी आत्मा पर ऐसा आघात है जो कदापि क्षम्य नहीं हो सकता। मैं यह न कहूंगा कि उस स्वर्गवासिनी की मुझसे अंतिम प्रेरणा थी और न मेरा शायद यह कथन ही मान्य समझा जाये कि हमारे छोटे बालक के लिए […]

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ब्रह्म का स्वाँग – मुंशी प्रेमचंद

स्त्री मैं वास्तव में अभागिन हूं नहीं तो क्या मुझे नित्य ऐसे-ऐसे घृणित दृश्य देखने पड़ते। शोक की बात यह है कि वे मुझे केवल देखने ही नहीं पड़ते, वरन दुर्भाग्य ने उन्हें मेरे जीवन का मुख्य भाग बना दिया है। मैं उस सुपात्र ब्राह्मण की कन्या हूं जिसकी व्यवस्था बड़े-बड़े गहन धार्मिक विषयों पर […]

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मूठ – मुंशी प्रेमचंद

डॉक्टर जयपाल ने प्रथम श्रेणी की सनद पायी थी, पर इसे भाग्य कहिए या व्यावसायिक सिद्धांतों का अज्ञान कि उन्हें अपने व्यवसाय में कभी उन्नत अवस्था न मिली। उनका घर संकरी गली में था, पर उनके जी में खुली जगह में घर लेने का कभी विचार तक न उठा। औषधालय की आलमारियां, शीशियां और डॉक्टरी […]

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पशु से मनुष्य – मुंशी प्रेमचंद

दुर्गा माली डॉक्टर मेहरा बार-एट-ला के यहां नौकर था। पांच रुपये मासिक वेतन पाता था। उसके घर में स्त्री और दो-तीन बच्चे थे। स्त्री पड़ोसियों के लिए गेहूं पीसा करती थी। दो बच्चे, जो समझदार थे, इधर-उधर से लकड़ियां, उपले चुन लाते थे, किन्तु इतना यत्न करने पर भी वे बहुत तकलीफ में रहते थे। […]

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ज्वालामुखी – मुंशी प्रेमचंद

डिग्री लेने के बाद मैं नित्य लाइब्रेरी जाया करता। पत्रों या किताबों का अवलोकन करने के लिए नहीं, किताबों को मैंने छूने की कसम खा ली थी। जिस दिन गजट में अपना नाम देखा उसी दिन मिल और कैंट को उठकर ताक पर रख दिया। मैं केवल अंग्रेजी पत्रों के वांटेड कॉलम को देखा करता। […]

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बलिदान – मुंशी प्रेमचंद

मनुष्य की आर्थिक अवस्था का सबसे ज्यादा असर उनके नाम पर पड़ता है। मौजे बेला के मंगरू ठाकुर जब से कांस्टेबल हो गए हैं, उनका नाम मंगल सिंह हो गया है। अब उन्हें कोई मंगरू कहने का साहस नहीं कर सकता। कल्लू अहीर ने जब से हलके के थानेदार साहब से मित्रता कर ली है […]

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