अबुलआस- तो आपका मतलब क्या है कि जैनब मेरा फिदिया हो?
जैद- बेशक, हमारा यही मतलब है।
अबुलआस- उससे तो कहीं बेहतर था कि आप मुझे कत्ल कर देते।
अबूबकर- हम रसूल के दामाद को कत्ल नहीं करेंगे, चाहे वह विधर्मी ही क्यों न हो। तुम्हारी यहाँ उतनी खातिर होगी, जितनी हम कर सकते हैं।
अबुलआस के सामने विषम समस्या थी। इधर यहाँ की मेहमानी में अपमान था, उधर जैनब के वियोग की दारुण वेदना थी। उन्होंने निश्चय किया कि यह वेदना सहूंगा, किन्तु अपमान न सहूँगा। प्रेम को आत्मा के गौरव पर बलिदान कर दूँगा। बोले- मुझे आपका फैसला मंजूर है। जैनब मेरी फिदिया होगी।
मदीने में रसूल की बेटी की जितनी इज्जत होनी चाहिए, उतनी होती थी। सुख था, ऐश्वर्य था, धर्म था, पर प्रेम न था। अबुलआस के वियोग में रोया करती। तीन वर्ष तीन युगों की भांति बीते। अबुलआस के दर्शन न हुए।
उधर अबुलआस पर उसकी बिरादरी का दबाव पड़ रहा था कि विवाह कर लो, पर जैनब की मधुर स्मृतियाँ ही उसके प्रणय-वंचित हृदय को तसकीन देने को काफी थी। वह उत्तरोत्तर उत्साह के साथ अपने व्यवसाय में तल्लीन हो गया। महीनों घर न आता। धनोपार्जन ही अब उसके जीवन का मुख्य आधार था। लोगों को आश्चर्य होता था कि अब वह धन के पीछे क्यों प्राण दे रहा है। निराशा और चिन्ता बहुधा शराब के नशे से शांत होती है, प्रेम उन्माद से। अबुलआस को धनोन्माद हो गया था। धन के आवरण में ढँका हुआ यह प्रेम-नैराश्य था, माया के परदे में छिपा हुआ प्रेम वैराग्य।
एक बार वह मक्का से माल लादकर ईराक की तरफ चला। काफ़िले में और भी कितने ही सौदागर थे। रक्षकों का एक दल भी साथ था। मुसलमानों के कई काफ़िले विधर्मियों के हाथों लुट चुके थे। उन्हें ज्यों ही इस काफ़िले की खबर मिली, जैद ने कुछ चुने हुए आदमियों के साथ उन पर धावा बोल दिया। काफिले के रक्षक लड़े और मारे गए। काफिले वाले भाग निकले। अतुल धन मुसलमानों के हाथ लगा। अबुलआस फिर कैद हो गए।
दूसरे दिन हजरत मुहम्मद के सामने अबुलआस की पेशी हुई। हजरत ने एक बार उसकी तरफ करुण दृष्टि डाली और सिर झुका लिया। सहाबियों ने कहा- या हजरत, अबुलआस के बारे में आप क्या फैसला करते हैं?
मुहम्मद- इसके बारे में फैसला करना तुम्हारा काम है। यह मेरा दामाद है। सम्भव है, मैं पक्षपात का दोषी हो जाऊँ।
यह कहकर वह मकान में चले गए। जैनब रोकर पैरों पर गिर पड़ी और बोली- अब्बाजान आपने औरों को तो आजाद कर दिया। अबुलआस क्या उन सबसे गया, बीता है?
हजरत- नहीं जैनब, न्याय के पद पर बैठने वाले आदमी को पक्षपात और द्वेष से मुक्त होना चाहिए। यद्यपि यह नीति मैंने ही बनाई है, तो भी अब उसका स्वामी नहीं, दास हूँ। मुझे अबुलआस से प्रेम है। मैं न्याय को प्रेम-कलंकित नहीं कर सकता।
सहाबी हजरत की इस नीत-भक्ति पर मुग्ध हो गए। अबुलआस को सब माल-असबाब के साथ मुक्त कर दिया गया।
अबुलआस पर हजरत की न्यायपरायणता का गहरा असर पड़ा। मक्के आकर उन्होंने अपना हिसाब-किताब साफ किया, लोगों का माल लौटाया, कर्ज अदा किया और घर-बार त्यागकर हजरत मुहम्मद की सेवा में पहुँच गए। जैनब की मुराद पूरी हुई।
