कैलासी ने सगर्व दीनता से उत्तर दिया – हां, यहां क्या करूं, जिन्दगी का कोई ठिकाना नहीं। मालूम नहीं, कब आंखें बंद हो जाएं, परमात्मा के यहां मुंह दिखाने का भी तो कोई उपाय होना चाहिए। रुद्र बाबू अच्छी तरह हैं?
इन्द्रमणि – अब तो जा रही हो। रुद्र का हाल पूछकर क्या करोगी? उसे आशीर्वाद देती रहना।
कैलासी की छाती धड़कने लगी। घबराकर बोली – उनका जी अच्छा नहीं है क्या? इन्द्रमणि – वह तो उसी दिन से बीमार है, जिस दिन तुम वहां से निकली। दो हफ्ते तक उसने अन्ना-अन्ना की रट लगाई। अब एक हफ्ते से खांसी और बुखार में पड़ा है। सारी दवाइयां करके हार गया, कुछ फायदा न हुआ। मैंने सोचा था कि चलकर तुम्हारी अनुनय-विनय करके लिवा लाऊंगा। क्या जाने तुम्हें देखकर उसकी तबीयत संभल जाये। पर तुम्हारे घर पर आया तो मालूम हुआ कि तुम यात्रा करने जा रही हो। अब किस मुंह से चलने को कहूं। तुम्हारे साथ सलूक ही कौन-सा अच्छा किया था जो इतना साहस करूं। फिर पुण्य-कार्य में विघ्न डालने का भी डर है। जाओ, उसका ईश्वर मालिक है! आयु शेष है तो बच ही जाएगा, अन्यथा ईश्वरी गति में किसी का क्या वश।
कैलाशी की आंखों के सामने अंधेरा छा गया। सामने की चीजें तैरती हुई मालूम होने लगी। हृदय भावी अशुभ की आशंका से दहल गया। हृदय से निकल पड़ा – ‘या ईश्वर! मेरे रुद्र का बाल बांका न हो।’ प्रेम से गला भर आया। विचार किया, मैं कैसी कठोर हृदय हूं। प्यारा बच्चा रो-रोकर हलकान हो गया, और मैं उसे देखने तक नहीं गयी। सुखदा का स्वभाव अच्छा नहीं, न सही, किन्तु रुद्र ने मेरा क्या बिगाड़ा था कि मैंने मां का बदला बेटे से लिया। ईश्वर मेरा अपराध क्षमा करो। प्यारा रुद्र मेरे लिए हुड़क रहा है। इस ख्याल से कैलासी का कलेजा मसोस उठ, और आंखों से आंसू बह निकले। मुझे क्या मालूम था कि उसे मुझसे इतना प्रेम है। नहीं मालूम, बच्चे की क्या दशा है। भयातुर हो बोली – दूध तो पीते हैं न?
इन्द्रमणि – तुम दूध पीने को कहती हो, उसने दो दिन से आंखें तक नहीं खोली।
कैलासी – या मेरे परमात्मा! अरे कुली! कुली । बेटा, आकर मेरा सामान गाड़ी से उतार दे। अब मुझे तीरथ जाना नहीं सूझता। हां, बेटा, जल्दी कर, बाबूजी देखो, कोई इक्का तो ठीक कर लो।
इक्का रवाना हुआ। सामने सड़क पर बग्घियां खड़ी थी। घोड़ा धीरे-धीरे चल रहा था। कैलासी बार-बार झुंझलाती और इक्केवान से कहती थी, बेटा जल्दी कर। मैं तुझे कुछ ज्यादा दे दूंगी। रास्ते में मुसाफिरों की भीड़ देखकर उसे क्रोध आता था। उसका जी चाहता था कि घोड़े के पर लग जाते, जब इन्द्रमणि का मकान करीब आ गया तो कैलासी का हृदय उछलने लगा। बार-बार हृदय से रुद्र के लिए शुभ आशीर्वाद निकलने लगा। ईश्वर करे सब कुशल मंगल हो। इक्का इन्द्रमणि की गली की ओर मुड़ा। अकस्मात कैलासी के कान में रोने की ध्वनि पड़ी। कलेजा मुंह को आ गया। सिर में चक्कर आ गया। मालूम हुआ की नदी में डूबी जाती हूं। जी चाहा कि इक्के पर से कूद पड़ू। पर थोड़ी ही देर में मालूम हुआ कि कोई स्त्री मैके से विदा हो रही है, संतोष हुआ। अन्त में इन्द्रमणि का मकान आ पहुंचा। कैलासी ने डरते-डरते दरवाजे की तरफ देखा। जैसे कोई घर से भागा हुआ अनाथ लड़का शाम को भूखा-प्यासा घर आये, दरवाजे की ओर सटकी हुई आंखों से देखे कि कोई बैठा तो नहीं है। दरवाजे पर सन्नाटा छाया हुआ था। महाराज बैठा सुरती मल रहा था। कैलासी को जरा ढाढस हुआ। घर में बैठी तो नई दाई पुलटिस पका रही थी। हृदय में बल का संचार हुआ। सुखदा के कमरे में गयी तो उसका हृदय गर्मी के मध्याह्न काल के सदृश कांप रहा था। सुखदा रुद्र को गोद में लिये दरवाजे की ओर एकटक ताक रही थी। शोक और करुणा की मूर्ति बनी थी।
कैलासी ने सुखदा से कुछ नहीं पूछा। रुद्र को उसकी गोद से ले लिया और उसकी तरफ सजल नयनों से देखकर कहा – बेटा रुद्र, आंखें खोलो।
रुद्र ने आंखें खोली, क्षण भर दाई को चुपचाप देखता रहा, तब यकायक दाई के गले से लिपटकर बोला – अन्ना आयी! अन्ना आयी!!
रुद्र का पीला मुरझाया हुआ चेहरा खिल उठा, जैसे बुझते हुए दीपक में तेल पड़ जाये। ऐसा मालूम हुआ, मानो वह कुछ बढ़ गया है।
एक सप्ताह बीत गया। प्रातःकाल का समय था। रुद्र आंगन में खेल रहा था। इन्द्रमणि ने बाहर से आकर उसे गोद में उठा लिया, और प्यार से बोले – तुम्हारी अन्ना को मारकर भगा दें?
रुद्र ने मुंह बनाकर कहा – नहीं, रोएगी।
कैलासी बोली – क्यों बेटा, तुमने तो मुझे बद्रीनाथ नहीं जाने दिया। मेरी यात्रा का पुण्य-फल कौन देगा?
इन्द्रमणि ने मुस्कराकर कहा – तुम्हें उससे कहीं अधिक पुण्य हो गया। यह तीर्थ महातीर्थ है।
